कथा का प्रसंग
दाल्भ्य ऋषि ने महर्षि पुलस्त्य से पूछा — "हे मुनिवर! मनुष्य जाने-अनजाने अनेक पाप कर बैठता है। कोई ऐसा सरल उपाय बताइए, जिससे वह इन पापों से मुक्त होकर सद्गति प्राप्त कर सके।"
महर्षि पुलस्त्य बोले — "हे दाल्भ्य! माघ मास के कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी ऐसा ही व्रत है। इस दिन तिल का छह प्रकार से प्रयोग करने वाला मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। इसी विषय में स्वयं भगवान विष्णु ने देवर्षि नारद को एक कथा सुनाई थी — वही मैं तुम्हें सुनाता हूँ।"
कठोर व्रत करने वाली ब्राह्मणी
देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु से षटतिला एकादशी का माहात्म्य पूछा। भगवान बोले — "हे नारद! मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह अत्यंत धर्मपरायण थी — कठोर व्रत रखती, उपवास करती, नियमपूर्वक मेरी पूजा करती और तीर्थ-व्रतों का पालन करती थी।"
"उसके व्रतों की कठोरता ऐसी थी कि उसका शरीर दुर्बल हो गया था। किंतु उसमें एक बड़ा दोष था — वह अत्यंत कृपण थी। उसने जीवन भर कभी किसी ब्राह्मण, साधु अथवा निर्धन को अन्न, वस्त्र अथवा धन का दान नहीं दिया। न कभी देवताओं को कुछ अर्पित किया।"
"मैंने सोचा — इस स्त्री ने व्रत व तप से अपनी देह तो शुद्ध कर ली, पर बिना दान के उसका पुण्य अधूरा है। उसे यह बोध कराना आवश्यक है।"
भगवान की परीक्षा और मिट्टी का ढेला
भगवान विष्णु ने कहा — "तब मैं एक भिक्षुक का रूप धारण कर उसके द्वार पर गया और भिक्षा माँगी। उसने मुझे देखा और पूछा — 'तुम कौन हो और क्यों आए हो?' मैंने कहा — 'मुझे भिक्षा चाहिए।'"
"वह भीतर गई और लौटकर मेरे भिक्षा-पात्र में मिट्टी का एक ढेला डाल दिया। न अन्न, न फल, न जल — केवल मिट्टी। मैं उसे लेकर लौट आया।"
"समय आने पर उस ब्राह्मणी की मृत्यु हुई। अपने व्रतों व तप के प्रभाव से उसे स्वर्ग में स्थान तो मिला और एक दिव्य भवन भी प्राप्त हुआ, जिसके आँगन में एक आम का वृक्ष था। किंतु जब उसने भवन में प्रवेश किया तो वह पूर्णतः रिक्त था — न अन्न, न धन, न कोई सामग्री। केवल खाली दीवारें।"
देव-कन्याओं का उपदेश
ब्राह्मणी व्याकुल होकर भगवान विष्णु के पास पहुँची और बोली — "हे प्रभु! मैंने जीवन भर कठोर व्रत व तप किया, फिर भी मेरा भवन रिक्त क्यों है?"
भगवान बोले — "हे देवी! तूने व्रत तो बहुत किए, किंतु कभी किसी को कुछ दिया नहीं। मैंने स्वयं भिक्षुक बनकर तेरे द्वार पर हाथ फैलाया था और तूने मुझे मिट्टी का ढेला दिया था। जो जीवन भर कुछ देता नहीं, उसे परलोक में भी कुछ नहीं मिलता। अब तू स्वर्ग की देव-कन्याओं के पास जा; वे तुझे षटतिला एकादशी के व्रत का विधान बताएँगी। किंतु उन्हें द्वार खोलने से पूर्व उस व्रत की विधि अवश्य पूछ लेना।"
ब्राह्मणी देव-कन्याओं के पास पहुँची और उनसे षटतिला एकादशी की विधि सुनी — तिल से स्नान, तिल का उबटन, तिल-जल से तर्पण, तिल का हवन, तिल-युक्त भोजन तथा तिल का दान।
व्रत और रिक्त भवन का भरना
ब्राह्मणी ने विधिपूर्वक षटतिला एकादशी का व्रत किया और सर्वप्रथम तिल का दान किया — वही कर्म जो वह जीवन भर नहीं कर सकी थी।
व्रत व दान के प्रभाव से उसका रिक्त दिव्य भवन धन, धान्य, वस्त्र व समस्त वैभव से भर गया। तब उसे बोध हुआ कि तप व दान — दोनों साथ चलें तभी धर्म पूर्ण होता है।
महर्षि पुलस्त्य ने दाल्भ्य मुनि से कहा — "हे मुनि! इसीलिए कहा गया है कि बिना दान के कोई धर्म-कार्य पूर्ण नहीं होता। षटतिला एकादशी का यह व्रत ब्रह्महत्या, चोरी व ईर्ष्या जैसे पापों तक का नाश करता है। जो जितने तिल दान करता है, उतने सहस्र वर्ष वह स्वर्ग में निवास करता है।"