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लिपि:
॥ श्री ॥
षटतिला एकादशी
व्रत कथा · श्री विष्णु
पाठ
व्रत कथा
कंजूस ब्राह्मणी की कथा
एक ब्राह्मणी कठोर व्रत-उपवास तो करती थी, किंतु किसी को कभी कुछ दान नहीं देती थी। मृत्यु के पश्चात उसे स्वर्ग में स्थान तो मिला, पर उसका दिव्य निवास लगभग रिक्त व दरिद्र था — क्योंकि उसने जीवन भर दान नहीं किया था।
जब उसने इसका कारण पूछा, तो उसे षटतिला एकादशी के व्रत व तिल-दान का महत्व बताया गया।
तिल-दान का माहात्म्य
ब्राह्मणी ने विधिपूर्वक षटतिला एकादशी का व्रत किया और तिल का दान किया। इसके प्रभाव से उसका दिव्य निवास धन-धान्य व वैभव से भर गया।
ऋषि पुलस्त्य ने दाल्भ्य मुनि को यह कथा सुनाते हुए कहा — "बिना दान के कोई धर्म-कार्य पूर्ण नहीं होता।" यह व्रत ब्रह्महत्या, चोरी व ईर्ष्या जैसे पापों तक का नाश करता है।
लाभ
- गंभीर पापों (ब्रह्महत्या, चोरी, ईर्ष्या) का नाश
- तिल-दान से धन-धान्य व वैभव
- अनेक जन्मों के रोगों से मुक्ति; स्वर्ग-निवास
स्रोत
षटतिला एकादशी माहात्म्य — कंजूस ब्राह्मणी प्रसंग; ऋषि पुलस्त्य द्वारा दाल्भ्य को वर्णित · एकादशी माहात्म्य परंपरा
