व्रत का माहात्म्य
शास्त्रों के अनुसार अपरा एकादशी का व्रत अत्यंत गंभीर पापों — जैसे हत्या, मिथ्या साक्षी, दूसरों को भ्रमित करना व छल — तक का नाश करता है। रणभूमि से भागने वाले योद्धा अथवा गुरु का अपमान करने वाले शिष्य के दोष का भी शमन इस व्रत से बताया गया है।
इसका पुण्य यज्ञ-अवसरों पर गज, अश्व, स्वर्ण, गौ व भूमि दान के तुल्य कहा गया है। इसे "पाप-रूपी वृक्षों को काटने वाली कुल्हाड़ी" तथा "अंधकार को दूर करने वाले सूर्य" के समान बताया गया है।
फल
इस व्रत के पालन से भक्त के हृदय में भगवान विष्णु के प्रति भक्ति उत्तरोत्तर बढ़ती है और अंत में उसे विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
कथा का श्रवण अथवा पाठ मात्र भी समस्त पापों का नाश करने वाला माना गया है।