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लिपि:
॥ श्री ॥
वरूथिनी एकादशी
व्रत कथा · श्री विष्णु
पाठ
व्रत कथा
व्रत का माहात्म्य
शास्त्रों में वर्णित है कि वरूथिनी एकादशी का व्रत समस्त पापों का नाश कर सौभाग्य प्रदान करता है। इसका पुण्य दस हज़ार वर्ष की तपस्या के तुल्य तथा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्वर्णदान के समान बताया गया है।
इस व्रत का फल कन्यादान व अन्नदान जैसे श्रेष्ठ दानों के समान माना गया है — इसलिए इसे गृहस्थों के लिए विशेष कल्याणकारी कहा जाता है।
राजाओं के उदाहरण
पुराणों में उल्लेख है कि राजा मान्धाता तथा राजा धुन्धुमार ने इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग व दिव्य गति प्राप्त की।
कथा का मूल संदेश है — "धैर्य ही सौभाग्य की नींव है; संयम व सजगता से मनुष्य का सुख व भाग्य बढ़ता है।" इसीलिए इस व्रत में दशमी से ही संयमपूर्ण आचरण, सात्विक आहार व हरि-स्मरण का विधान है।
लाभ
- समस्त पापों का नाश व सौभाग्य
- कन्यादान व अन्नदान तुल्य पुण्य
- इस लोक में सुख, अंत में मोक्ष
स्रोत
वरूथिनी एकादशी माहात्म्य (एकादशी माहात्म्य परंपरा) · राजा मान्धाता व धुन्धुमार के प्रसंग
