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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री द्वारकाधीश आरती

आरती · श्री कृष्ण

पाठ

1

जय द्वारकाधीश हरे, प्रभु जय द्वारकाधीशा। द्वारकापुरी विराजे, त्रिभुवन के ईशा॥

2

श्याम-वरण तन सुन्दर, पीताम्बर धारी। मुकुट-मोरपंख सोहे, छवि अति प्यारी॥

3

गोमती-तट विराजे, चार-धाम कहलाए। भक्त दर्शन को आते, मन-वांछित पाए॥

4

द्वारकानाथ दयालु, भक्तन सुख देते। भय-संकट सब हरते, जो तुमको सुमिरते॥

5

द्वारकाधीश की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। सुख-सम्पति वह पावे, हरि-कृपा पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे द्वारकाधीश हरि, आपकी जय हो! द्वारकापुरी में विराजमान आप तीनों लोकों के ईश्वर हैं।
  2. श्याम वर्ण का सुन्दर तन, पीताम्बर धारण किए; मुकुट व मोरपंख से सुशोभित — आपकी छवि अति प्यारी है।
  3. गोमती नदी के तट पर विराजमान, आप चार धामों में गिने जाते हैं; भक्त दर्शन को आते हैं और मनोवांछित फल पाते हैं।
  4. हे दयालु द्वारकानाथ, आप भक्तों को सुख देते हैं; जो आपका स्मरण करते हैं, उनके समस्त भय-संकट आप हर लेते हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से द्वारकाधीश की यह आरती गाता है, वह सुख-सम्पत्ति तथा हरि (कृष्ण) की कृपा प्राप्त करता है।

लाभ

  • भक्ति, सुख-शांति व मन की प्रसन्नता बढ़ती है।
  • भय व संकट दूर होकर रक्षा मिलती है।
  • मनोकामना पूर्ण होकर श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।

कब करें पाठ

जन्माष्टमी पर · एकादशी व नित्य संध्या में · गुरुवार को

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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