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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री एकलिंगजी आरती

आरती · श्री शिव

पाठ

1

जय एकलिंग महादेवा, स्वामी जय एकलिंग देवा। मेवाड़ के अधिपति, करूँ मैं तव सेवा॥

2

चतुर्मुख रूप विराजे, श्याम-शिला अति प्यारी। कैलाशपुरी में शोभे, छवि अति न्यारी॥

3

जल-बेलपत्र अर्पित, भक्त करें पूजा। हर-हर महादेव कहकर, ध्यावें नहिं दूजा॥

4

रोग-शोक भय हरते, संकट सब टारो। शरण पड़े की रक्षा, प्रभु करो हमारी॥

5

एकलिंगजी की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। सुख-शान्ति वह पावे, मनवांछित फल पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे एकलिंग महादेव, आपकी जय हो! हे मेवाड़ के अधिपति, मैं आपकी सेवा करता हूँ।
  2. चतुर्मुख (चार मुख वाले) रूप में विराजमान, अति प्रिय श्याम-शिला स्वरूप; कैलाशपुरी में सुशोभित आपकी छवि अति अनुपम है।
  3. भक्त जल व बेलपत्र अर्पित कर पूजा करते हैं; "हर-हर महादेव" कहकर वे आप ही का ध्यान करते हैं, किसी अन्य का नहीं।
  4. आप रोग, शोक व भय हरते हैं; हमारे समस्त संकट दूर कीजिए; हे प्रभु, शरण में आए हम सबकी रक्षा कीजिए।
  5. जो भक्त श्रद्धा से एकलिंगजी की यह आरती गाता है, वह सुख-शांति तथा मनोवांछित फल प्राप्त करता है।

लाभ

  • मन को शांति व स्थिरता प्राप्त होती है।
  • भय, रोग व संकट से रक्षा होती है।
  • भक्ति व आध्यात्मिक उन्नति बढ़ती है।

कब करें पाठ

सोमवार व प्रदोष काल में · महाशिवरात्रि पर · प्रातः व संध्या पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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