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लिपि:
॥ श्री ॥
गणपति वैदिक मंत्र — गणानां त्वा
मंत्र · श्री गणेश
पाठ
1
ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे गणों के अधिपति, हम आपका आह्वान करते हैं। आप कवियों में भी कवि हैं, कीर्ति में सर्वोपरि हैं, ब्रह्मणों (मन्त्रों) में ज्येष्ठ राजा हैं। हे ब्रह्मणस्पति, हमारी पुकार सुनकर अपनी रक्षाओं सहित हमारे यज्ञ-स्थल पर विराजिए।
लाभ
- गणेश का सर्वाधिक प्राचीन उपलब्ध मंत्र होने से वैदिक परंपरा में सर्वोपरि माना जाता है।
- किसी भी मांगलिक कार्य, यज्ञ व पूजा के आरंभ में प्रथम मंत्र के रूप में पढ़ा जाता है।
- परंपरा में इसे बुद्धि, वाणी व विद्या से जोड़ा जाता है — "कवियों में कवि" का भाव।
- गणपति अथर्वशीर्ष व गणेश यज्ञ की पद्धति में इसका पाठ विहित है।
कब करें पाठ
किसी भी शुभ कार्य या पूजा के आरंभ में · बुधवार व चतुर्थी तिथि को · गणेश चतुर्थी पर · अध्ययन या नए कार्य के आरंभ पर
स्रोत
रचयिता: गृत्समद ऋषि (ऋग्वेद द्वितीय मण्डल). ऋग्वेद 2.23.1 — ब्रह्मणस्पति सूक्त, ऋषि गृत्समद · गणपति पूजन व गणपति अथर्वशीर्ष पाठ परंपरा · नोट: मूल ऋचा का सम्बोधन "ब्रह्मणस्पति" है; गणपति-उपासना से इसका जुड़ाव परवर्ती परंपरा का है
