गणपति वैदिक मंत्र — गणानां त्वा

gaṇapati vaidika mantra — gaṇānāṃ tvā

Ganapati Vedic Mantra (Rigveda 2.23.1)

समय
1 मिनट
जप संख्या
108
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
बुधवार, चतुर्थी व गणेश चतुर्थी
उद्देश्य:शुभ आरंभ (Auspicious Start)ज्ञान व विद्या (Knowledge)विघ्न नाश (Removal of Obstacles)
✓ संपूर्ण वैदिक मंत्र

गणपति वैदिक मंत्र “ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे…” ऋग्वेद 2.23.1 की ऋचा है और गणेश का सर्वाधिक प्राचीन उपलब्ध मंत्र माना जाता है। मूल ऋचा का सम्बोधन ब्रह्मणस्पति है, जिसे परंपरा ने गणपति उपासना का वैदिक आधार माना। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में इसका पाठ किया जाता है।

परिचय

विघ्नहर्ता श्री गणेश हर शुभ कार्य के प्रथम पूज्य देव हैं — बुद्धि, विवेक और समृद्धि के दाता।

स्रोत: ऋग्वेद, द्वितीय मण्डल, सूक्त 23, ऋचा 1 (ब्रह्मणस्पति सूक्त)

एक नज़र में

मंत्र / पाठगणपति वैदिक मंत्र — गणानां त्वा
IASTgaṇapati vaidika mantra — gaṇānāṃ tvā
प्रकारवैदिक मंत्र
देवताश्री गणेश
मूल स्रोतऋग्वेद, द्वितीय मण्डल, सूक्त 23, ऋचा 1 (ब्रह्मणस्पति सूक्त)
जप संख्या108
मालारुद्राक्ष या स्फटिक माला
शुभ दिनबुधवार, चतुर्थी व गणेश चतुर्थी
पाठ समय1 मिनट
कठिनाईमध्यम

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह ऋचा ऋग्वेद के द्वितीय मण्डल के 23वें सूक्त की पहली ऋचा है, और गणेश-उपासना का सबसे प्राचीन उपलब्ध आधार मानी जाती है। इसमें भगवान से प्रार्थना है कि वे "गणों के अधिपति", "कवियों में कवि" और "ब्रह्मणों में ज्येष्ठ" रूप में हमारी पुकार सुनकर यज्ञ-स्थल पर विराजें।

एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए। मूल ऋचा में जिनका आह्वान है वे "ब्रह्मणस्पति" हैं — मन्त्रों व ब्रह्म-वाणी के स्वामी। पौराणिक गजमुख गणेश का वर्णन वेद-संहिता में नहीं मिलता; वह स्वरूप पुराणों में विकसित हुआ। परंपरा ने आगे चलकर "गणपति" शब्द के आधार पर इसी ऋचा को गणेश-उपासना का वैदिक मूल माना, और आज यह गणेश-पूजन, गणपति अथर्वशीर्ष-पाठ तथा हर मांगलिक आरंभ में प्रथम मंत्र के रूप में पढ़ी जाती है।

इसी कारण यह मंत्र नाम-मंत्रों से भिन्न श्रेणी में आता है — यह "ॐ गं गणपतये नमः" जैसा बीज मंत्र नहीं, बल्कि पूरी वैदिक ऋचा है, जिसका छंद, ऋषि और देवता तीनों निर्दिष्ट हैं।

मंत्र

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ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्॥

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उच्चारण (Pronunciation)

ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्॥

oṃ gaṇānāṃ tvā gaṇapatiṃ havāmahe kaviṃ kavīnām upamaśravastamam | jyeṣṭharājaṃ brahmaṇāṃ brahmaṇaspata ā naḥ śṛṇvann ūtibhiḥ sīda sādanam ||

Om Gananam Tva Ganapatim Havamahe, Kavim Kavinam Upamashravastamam, Jyeshtharajam Brahmanam Brahmanaspata, Aa Nah Shrinvann Utibhih Sida Sadanam.

उच्चारण मार्गदर्शन: यह अनुष्टुप् नहीं, जगती छंद की ऋचा है — इसे लय के साथ, ठहरकर पढ़ें। "हवामहे" में "ह" स्पष्ट हो। "उपमश्रवस्तमम्" सबसे लंबा पद है, इसे "उ-प-म-श्र-व-स्त-मम्" में तोड़कर अभ्यास करें। "शृण्वन्नूतिभिः" में द्वित्व "न्न" और दीर्घ "ऊ" दोनों स्पष्ट होने चाहिए। वैदिक पाठ में स्वर (उदात्त-अनुदात्त) का विधान है; उसके बिना भी श्रद्धापूर्वक पाठ की परंपरा है।

शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

गणानांगणों के
त्वाआपका
गणपतिंगणों के अधिपति को
हवामहेहम आह्वान करते हैं
कविं कवीनाम्कवियों में भी कवि
उपमश्रवस्तमम्कीर्ति में सर्वोपरि
ज्येष्ठराजंज्येष्ठ राजा
ब्रह्मणस्पतहे ब्रह्मणस्पति (मन्त्रों के स्वामी)
शृण्वन्सुनते हुए
ऊतिभिःरक्षाओं सहित
सीद सादनम्आसन पर विराजिए

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे गणों के अधिपति, हम आपका आह्वान करते हैं। आप कवियों में भी कवि हैं, कीर्ति में सर्वोपरि हैं, ब्रह्मणों (मन्त्रों) में ज्येष्ठ राजा हैं। हे ब्रह्मणस्पति, हमारी पुकार सुनकर अपनी रक्षाओं सहित हमारे यज्ञ-स्थल पर विराजिए।

लाभ

  • गणेश का सर्वाधिक प्राचीन उपलब्ध मंत्र होने से वैदिक परंपरा में सर्वोपरि माना जाता है।
  • किसी भी मांगलिक कार्य, यज्ञ व पूजा के आरंभ में प्रथम मंत्र के रूप में पढ़ा जाता है।
  • परंपरा में इसे बुद्धि, वाणी व विद्या से जोड़ा जाता है — "कवियों में कवि" का भाव।
  • गणपति अथर्वशीर्ष व गणेश यज्ञ की पद्धति में इसका पाठ विहित है।

अनुशंसित जप संख्या

जप संख्या: प्रतिदिन 108 बार (एक माला)।

माला: रुद्राक्ष या स्फटिक माला

उत्तम समय: प्रातः, कार्य आरंभ से पूर्व

जप का उत्तम समय

किसी भी शुभ कार्य या पूजा के आरंभ मेंबुधवार व चतुर्थी तिथि कोगणेश चतुर्थी परअध्ययन या नए कार्य के आरंभ पर

जप विधि (चैंटिंग मेथड)

स्नान के बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें, गणेश-विग्रह के समक्ष दीपक जलाएँ और दूर्वा व मोदक अर्पित कर ऋचा का 11 या 108 बार पाठ करें। वैदिक ऋचा होने के कारण परंपरा में स्पष्ट व शुद्ध उच्चारण पर विशेष बल दिया जाता है; स्वर-सहित पाठ सीखना हो तो किसी वेदपाठी से सीखना उत्तम बताया जाता है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
मूल ग्रंथऋग्वेद 2.23.1
स्रोत परंपराऋग्वेद 2.23.1 — ब्रह्मणस्पति सूक्त, ऋषि गृत्समद · गणपति पूजन व गणपति अथर्वशीर्ष पाठ परंपरा · नोट: मूल ऋचा का सम्बोधन "ब्रह्मणस्पति" है; गणपति-उपासना से इसका जुड़ाव परवर्ती परंपरा का है
रचयितागृत्समद ऋषि (ऋग्वेद द्वितीय मण्डल)
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

श्री गणेश

Lord Ganesha

विघ्नहर्ता श्री गणेश हर शुभ कार्य के प्रथम पूज्य देव हैं — बुद्धि, विवेक और समृद्धि के दाता।

देवता वर्गविघ्न नाश · बुद्धि · शुभारंभ · समृद्धि
वाहनमूषक (चूहा)
संबंधित वारबुधवार
मुख्य मंत्रॐ गं गणपतये नमः
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