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लिपि:
॥ श्री ॥
गणेश सहस्रनाम
सहस्रनाम · श्री गणेश
पाठ
॥ ध्यानम् ॥ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
प्रथम शतक (नाम 1–100)
- गणेश्वरः — गणों के ईश्वर
- गणक्रीडः — गणों के साथ क्रीड़ा करने वाले
- गणनाथः — गणों के नाथ
- गणाधिपः — गणों के अधिपति
- एकदन्तः — एक दाँत वाले
- वक्रतुण्डः — वक्र सूँड वाले
- गजवक्त्रः — गजमुख वाले
- महोदरः — विशाल उदर वाले
- लम्बोदरः — लंबे उदर वाले
- धूम्रवर्णः — धूम्र वर्ण वाले
- विकटः — विशाल/विकट रूप वाले
- विघ्ननाशकः — विघ्नों का नाश करने वाले
- सुमुखः — सुंदर मुख वाले
- दुर्मुखः — उग्र मुख वाले
- बुद्धः — ज्ञानस्वरूप
- विघ्नराजः — विघ्नों के राजा
- गजाननः — गजमुख वाले
- भीमः — भयंकर रूप वाले
- प्रमोदः — परम आनंद रूप
- आमोदः — आनंद-स्वरूप
- सुरानन्दः — देवताओं को आनंद देने वाले
- मदोत्कटः — मद से उत्कट
- हेरम्बः — दीनों के रक्षक हेरम्ब
- शम्बरः — शम्बर रूप
- शम्भुः — कल्याणकारी
- लम्बकर्णः — लंबे कान वाले
- महाबलः — महाबलशाली
- नन्दनः — आनंद देने वाले
- अलम्पटः — निर्लिप्त
- अभीरुः — निर्भय
- मेघनादः — मेघ-गर्जन सम नाद वाले
- गणञ्जयः — गणों में विजयी
- विनायकः — श्रेष्ठ नायक
- विरूपाक्षः — विशिष्ट नेत्रों वाले
- धीरशूरः — धीर व शूर
- वरप्रदः — वर देने वाले
- महागणपतिः — महान गणपति
- बुद्धिप्रियः — बुद्धि के प्रेमी
- क्षिप्रप्रसादनः — शीघ्र प्रसन्न होने वाले
- रुद्रप्रियः — रुद्र (शिव) के प्रिय
- गणाध्यक्षः — गणों के अध्यक्ष
- उमापुत्रः — उमा के पुत्र
- अघनाशनः — पापों का नाश करने वाले
- कुमारगुरुः — कुमार (कार्तिकेय) के गुरु
- ईशानपुत्रः — ईशान (शिव) के पुत्र
- मूषकवाहनः — मूषक वाहन वाले
- सिद्धिप्रियः — सिद्धि के प्रेमी
- सिद्धिपतिः — सिद्धि के पति
- सिद्धिः — सिद्धि-स्वरूप
- सिद्धिविनायकः — सिद्धि देने वाले विनायक
- अविघ्नः — विघ्न-रहित
- तुम्बरुः — तुम्बरु रूप
- सिंहवाहनः — सिंह वाहन वाले
- मोहिनीप्रियः — मोहिनी के प्रिय
- कटङ्कटः — कटंकट रूप
- राजपुत्रः — राजपुत्र रूप
- शालकः — शालक रूप
- सम्मितः — सम्यक् मित
- अमितः — अपरिमित
- कूष्माण्डसामसम्भूतिः — कूष्माण्ड-साम से प्रकट
- दुर्जयः — दुर्जेय
- धूर्जयः — धूर्जय रूप
- जयः — विजय-स्वरूप
- भूपतिः — पृथ्वी के पति
- भुवनपतिः — भुवनों के पति
- भूतानां पतिः — समस्त भूतों के पति
- अव्ययः — अविनाशी
- विश्वकर्ता — विश्व के रचयिता
- विश्वमुखः — विश्व के मुख रूप
- विश्वरूपः — विश्व-रूप
- निधिः — निधि-स्वरूप
- घृणिः — करुणामय तेज रूप
- कविः — कवि-स्वरूप
- कवीनामृषभः — कवियों में श्रेष्ठ
- ब्रह्मण्यः — ब्रह्म-हितैषी
- ब्रह्मणस्पतिः — ब्रह्म (वेद) के पति
- ज्येष्ठराजः — ज्येष्ठ राजा
- निधिपतिः — निधियों के पति
- निधिप्रियपतिप्रियः — निधि-प्रिय (कुबेर) के प्रिय
- हिरण्मयपुरान्तःस्थः — स्वर्णमय पुर में स्थित
- सूर्यमण्डलमध्यगः — सूर्य-मंडल के मध्य स्थित
- कराहतिविध्वस्तसिन्धुसलिलः — कर-प्रहार से सिंधु-जल विध्वस्त करने वाले
- पूषदन्तभित् — पूषा के दाँत तोड़ने वाले
- उमाङ्ककेलिकुतुकी — उमा की गोद में क्रीड़ा-रत
- मुक्तिदः — मुक्ति देने वाले
- कुलपालनः — कुल का पालन करने वाले
- किरीटी — मुकुटधारी
- कुण्डली — कुंडलधारी
- हारी — हारधारी
- वनमाली — वनमाला धारी
- मनोमयः — मनोमय
- वैमुख्यहतदैत्यश्रीः — विमुख होने पर दैत्यों की श्री हरने वाले
- पादाहतिजितक्षितिः — पाद-प्रहार से पृथ्वी जीतने वाले
- सद्योजातस्वर्णमुञ्जमेखली — स्वर्ण-मुञ्ज मेखला धारी
- दुर्निमित्तहृत् — अपशकुनों को हरने वाले
- दुःस्वप्नहृत् — दुःस्वप्नों को हरने वाले
- प्रसहनः — सहनशील/पराक्रमी
- गुणी — गुणवान
- नादप्रतिष्ठितः — नाद में प्रतिष्ठित
- सुरूपः — सुंदर रूप वाले
द्वितीय शतक (नाम 101–200)
- सर्वनेत्राधिवासः — समस्त नेत्रों में निवास करने वाले
- वीरासनाश्रयः — वीरासन के आश्रय
- पीताम्बरः — पीत वस्त्र वाले
- खण्डरदः — खंडित दाँत वाले
- खण्डेन्दुकृतशेखरः — खंडित चंद्र को शिखर पर धारण करने वाले
- चित्राङ्कश्यामदशनः — चित्र-चिह्नित श्याम दाँत वाले
- भालचन्द्रः — भाल पर चंद्र धारण करने वाले
- चतुर्भुजः — चार भुजाओं वाले
- योगाधिपः — योग के अधिपति
- तारकस्थः — तारक में स्थित
- पुरुषः — पुरुष-स्वरूप
- गजकर्णकः — गज के कान वाले
- गणाधिराजः — गणों के अधिराज
- विजयस्थिरः — विजय में स्थिर
- गजपतिर्ध्वजी — ध्वजधारी गजपति
- देवदेवः — देवों के देव
- स्मरप्राणदीपकः — काम के प्राण को प्रदीप्त करने वाले
- वायुकीलकः — वायु के कीलक
- विपश्चिद्वरदः — विद्वानों को वर देने वाले
- नादोन्नादभिन्नबलाहकः — उच्च नाद से मेघों को भेदने वाले
- वराहरदनः — वराह सम दाँत वाले
- मृत्युञ्जयः — मृत्यु को जीतने वाले
- व्याघ्राजिनाम्बरः — व्याघ्र-चर्म वस्त्र वाले
- इच्छाशक्तिधरः — इच्छा-शक्ति धारण करने वाले
- देवत्राता — देवताओं की रक्षा करने वाले
- दैत्यविमर्दनः — दैत्यों का मर्दन करने वाले
- शम्भुवक्त्रोद्भवः — शम्भु के मुख से प्रकट
- शम्भुकोपहा — शम्भु का कोप हरने वाले
- शम्भुहास्यभूः — शम्भु के हास्य से उत्पन्न
- शम्भुतेजस् — शम्भु के तेज रूप
- शिवाशोकहारी — पार्वती का शोक हरने वाले
- गौरीसुखावहः — गौरी को सुख देने वाले
- उमाङ्गमलजः — उमा के अंग-मल से उत्पन्न
- गौरीतेजोभूः — गौरी के तेज से उत्पन्न
- स्वर्धुनीभवः — आकाशगंगा से प्रकट
- यज्ञकायः — यज्ञ-स्वरूप काय वाले
- महानादः — महान नाद वाले
- गिरिवर्ष्मा — पर्वत सम विशाल देह वाले
- शुभाननः — शुभ मुख वाले
- सर्वात्मा — सबकी आत्मा
- सर्वदेवात्मा — समस्त देवों की आत्मा
- ब्रह्ममूर्धा — ब्रह्मा रूपी मस्तक वाले
- ककुप्श्रुतिः — दिशाएँ जिनके कान
- ब्रह्माण्डकुम्भः — ब्रह्मांड रूपी कुंभ (मस्तक) वाले
- चिद्व्योमभालः — चिदाकाश रूपी भाल वाले
- सत्यशिरोरुहः — सत्य रूपी केश वाले
- जगज्जन्मलयोन्मेषनिमेषः — जगत् की सृष्टि-लय जिनके उन्मेष-निमेष
- अग्न्यर्कसोमदृक् — अग्नि-सूर्य-चंद्र जिनके नेत्र
- गिरीन्द्रैकरदः — गिरिराज रूपी एक दाँत वाले
- धर्माधर्मोष्ठः — धर्म-अधर्म जिनके ओष्ठ
- सामबृंहितः — सामगान से वर्धित
- ग्रहर्क्षदशनः — ग्रह-नक्षत्र रूपी दाँत वाले
- वाणीजिह्वः — वाणी रूपी जिह्वा वाले
- वासवनासिकः — इंद्र रूपी नासिका वाले
- कुलाचलांसः — कुलाचल रूपी कंधों वाले
- सोमार्कघण्टः — चंद्र-सूर्य रूपी घंटे वाले
- रुद्रशिरोधरः — रुद्र रूपी ग्रीवा वाले
- नदीनदभुजः — नदी-नद रूपी भुजाओं वाले
- सर्पाङ्गुलीकः — सर्प रूपी अंगुलियों वाले
- तारकानखः — तारे जिनके नख
- भ्रूमध्यसंस्थितकरः — भ्रू-मध्य में स्थित कर वाले
- ब्रह्मविद्यामदोत्कटः — ब्रह्मविद्या के मद से उत्कट
- व्योमनाभः — आकाश रूपी नाभि वाले
- श्रीहृदयः — श्री (लक्ष्मी) जिनके हृदय में
- मेरुपृष्ठः — मेरु रूपी पृष्ठ वाले
- अर्णवोदरः — समुद्र रूपी उदर वाले
- कुक्षिस्थयक्षगन्धर्वरक्षःकिन्नरमानुषः — कुक्षि में यक्ष-गंधर्व-राक्षस-किन्नर-मनुष्य धारण करने वाले
- पृथ्विकटिः — पृथ्वी रूपी कटि वाले
- सृष्टिलिङ्गः — सृष्टि के लिंग (चिह्न) रूप
- शैलोरुः — पर्वत रूपी जंघा वाले
- दस्रजानुकः — अश्विनीकुमार रूपी जानु वाले
- पातालजङ्घः — पाताल रूपी जंघा वाले
- मुनिपात् — मुनि रूपी चरण वाले
- कालाङ्गुष्ठः — काल रूपी अंगुष्ठ वाले
- त्रयीतनुः — तीन वेद रूपी तनु वाले
- ज्योतिर्मण्डललाङ्गूलः — ज्योतिर्मंडल रूपी पुच्छ वाले
- हृदयालाननिश्चलः — हृदय रूपी स्तंभ में निश्चल
- हृत्पद्मकर्णिकाशालिवियत्केलिसरोवरः — हृदय-कमल की कर्णिका रूपी आकाश-क्रीड़ा सरोवर वाले
- सद्भक्तध्याननिगडः — सद्भक्तों के ध्यान में बँधे रहने वाले
- पूजावारिनिवारितः — पूजा-जल से प्रसन्न होने वाले
- प्रतापी — प्रतापशाली
- कश्यपसुतः — कश्यप के पुत्र (अवतार)
- गणपः — गणों के रक्षक
- विष्टपी — त्रिलोक के स्वामी
- बली — बलशाली
- यशस्वी — यशस्वी
- धार्मिकः — धर्मनिष्ठ
- स्वोजस् — स्व-तेज वाले
- प्रथमः — प्रथम (आदि)
- प्रथमेश्वरः — प्रथम ईश्वर
- चिन्तामणिद्वीपपतिः — चिंतामणि-द्वीप के पति
- कल्पद्रुमवनालयः — कल्पवृक्ष-वन में निवास करने वाले
- रत्नमण्डपमध्यस्थः — रत्न-मंडप के मध्य स्थित
- रत्नसिंहासनाश्रयः — रत्न-सिंहासन के आश्रय
- तीव्राशिरोद्धृतपदः — तीव्रा-शक्ति के शिर पर पद रखने वाले
- ज्वालिनीमौलिलालितः — ज्वालिनी-शक्ति के मौलि से लालित
- नन्दानन्दितपीठश्रीः — नंदा-शक्ति से आनंदित पीठ-श्री वाले
- भोगदाभूषितासनः — भोगदा-शक्ति से विभूषित आसन वाले
- सकामदायिनीपीठः — कामदायिनी-पीठ वाले
- स्फुरदुग्रासनाश्रयः — स्फुरित उग्रासन के आश्रय
तृतीय शतक (नाम 201–300)
- तेजोवतीशिरोरत्नः — तेजोवती-शक्ति के शिर-रत्न वाले
- सत्यानित्यावतंसितः — सत्या-नित्या शक्तियों से अलंकृत
- सविघ्ननाशिनीपीठः — विघ्ननाशिनी-पीठ वाले
- सर्वशक्त्यम्बुजाश्रयः — समस्त शक्ति-कमलों के आश्रय
- लिपिपद्मासनाधारः — लिपि-कमलासन के आधार
- वह्निधामत्रयाश्रयः — तीन अग्नि-धामों के आश्रय
- उन्नतप्रपदः — उन्नत प्रपद वाले
- गूढगुल्फः — गूढ़ गुल्फ वाले
- संवृतपार्ष्णिकः — संवृत एड़ी वाले
- पीनजङ्घः — पुष्ट जंघा वाले
- श्लिष्टजानुः — सुगठित जानु वाले
- स्थूलोरुः — स्थूल ऊरु वाले
- प्रोन्नमत्कटिः — उन्नत कटि वाले
- निम्ननाभिः — गहरी नाभि वाले
- स्थूलकुक्षिः — विशाल कुक्षि वाले
- पीनवक्षाः — पुष्ट वक्ष वाले
- बृहद्भुजः — विशाल भुजाओं वाले
- पीनस्कन्धः — पुष्ट स्कंध वाले
- कम्बुकण्ठः — शंख सम कंठ वाले
- लम्बोष्ठः — लंबे ओष्ठ वाले
- लम्बनासिकः — लंबी नासिका वाले
- भग्नवामरदः — खंडित वाम दाँत वाले
- तुङ्गसव्यदन्तः — उन्नत दक्षिण दाँत वाले
- महाहनुः — विशाल ठोड़ी वाले
- ह्रस्वनेत्रत्रयः — तीन छोटे नेत्रों वाले
- शूर्पकर्णः — सूप सम कान वाले
- निबिडमस्तकः — दृढ़ मस्तक वाले
- स्तबकाकारकुम्भाग्रः — स्तबक सम कुंभ-अग्र वाले
- रत्नमौलिः — रत्न-मुकुट वाले
- निरङ्कुशः — अंकुश-रहित (स्वतंत्र)
- सर्पहारकटीसूत्रः — सर्प-हार व कटि-सूत्र वाले
- सर्पयज्ञोपवीतवान् — सर्प-यज्ञोपवीत वाले
- सर्पकोटीरकटकः — सर्प-मुकुट व कंकण वाले
- सर्पग्रैवेयकाङ्गदः — सर्प-कंठहार व बाजूबंद वाले
- सर्पकक्ष्योदराबन्धः — सर्प-उदरबंध वाले
- सर्पराजोत्तरीयकः — नागराज रूपी उत्तरीय वाले
- रक्तः — रक्त वर्ण वाले
- रक्ताम्बरधरः — लाल वस्त्र वाले
- रक्तमाल्यविभूषणः — लाल माला से विभूषित
- रक्तेक्षणः — रक्त नेत्रों वाले
- रक्तकरः — लाल कर वाले
- रक्तताल्वोष्ठपल्लवः — लाल तालु-ओष्ठ रूपी पल्लव वाले
- श्वेतः — श्वेत वर्ण वाले
- श्वेताम्बरधरः — श्वेत वस्त्र वाले
- श्वेतमाल्यविभूषणः — श्वेत माला से विभूषित
- श्वेतातपत्ररुचिरः — श्वेत छत्र से सुशोभित
- श्वेतचामरवीजितः — श्वेत चामर से सेवित
- सर्वावयवसम्पूर्णसर्वलक्षणलक्षितः — समस्त अवयव व लक्षणों से युक्त
- सर्वाभरणशोभाढ्यः — समस्त आभूषणों से सुशोभित
- सर्वशोभासमन्वितः — समस्त शोभा से युक्त
- सर्वमङ्गलमाङ्गल्यः — समस्त मंगलों के मंगल
- सर्वकारणकारणः — समस्त कारणों के कारण
- सर्वदैककरः — सबको देने वाले एकमात्र हाथ वाले
- शार्ङ्गी — शार्ङ्ग धनुष धारी
- बीजापूरी — बिजौरा फल धारी
- गदाधरः — गदा धारी
- इक्षुचापधरः — इक्षु-धनुष धारी
- शूली — त्रिशूल धारी
- चक्रपाणिः — चक्र धारण करने वाले
- सरोजभृत् — कमल धारण करने वाले
- पाशी — पाश धारी
- धृतोत्पलः — नीलकमल धारण करने वाले
- शालीमञ्जरीभृत् — धान की मंजरी धारण करने वाले
- स्वदन्तभृत् — अपना दाँत धारण करने वाले
- कल्पवल्लीधरः — कल्पलता धारण करने वाले
- विश्वाभयदैककरः — विश्व को अभय देने वाले हाथ वाले
- वशी — जितेंद्रिय
- अक्षमालाधरः — जपमाला धारी
- ज्ञानमुद्रावान् — ज्ञानमुद्रा धारी
- मुद्गरायुधः — मुद्गर आयुध वाले
- पूर्णपात्री — पूर्ण पात्र धारी
- कम्बुधरः — शंख धारी
- विधृतालिसमुद्गकः — भौंरों सहित समुद्गक धारी
- मातुलिङ्गधरः — बिजौरा फल धारी
- चूतकलिकाभृत् — आम्र-मंजरी धारण करने वाले
- कुठारवान् — कुठार (फरसा) धारी
- पुष्करस्थस्वर्णघटीपूर्णरत्नाभिवर्षकः — सूँड की स्वर्ण-घटी से रत्न बरसाने वाले
- भारतीसुन्दरीनाथः — भारती (वाणी) सुंदरी के नाथ
- विनायकरतिप्रियः — विनायकी (शक्ति) की रति के प्रिय
- महालक्ष्मीप्रियतमः — महालक्ष्मी के प्रियतम
- सिद्धलक्ष्मीमनोरमः — सिद्धलक्ष्मी के मनोरम
- रमारमेशपूर्वाङ्गः — रमा-रमेश जिनके पूर्व अंग
- दक्षिणोमामहेश्वरः — दक्षिण में उमा-महेश्वर वाले
- महीवराहवामाङ्गः — वाम अंग में महीवराह वाले
- रतिकन्दर्पपश्चिमः — पश्चिम में रति-कंदर्प वाले
- आमोदप्रमोदजननः — आमोद-प्रमोद को जन्म देने वाले
- सप्रमोदप्रमोदनः — प्रमोद सहित आनंदित करने वाले
- समेधितसमृद्धिश्रीः — वर्धित समृद्धि-श्री वाले
- ऋद्धिसिद्धिप्रवर्तकः — ऋद्धि-सिद्धि के प्रवर्तक
- दत्तसौमुख्यसुमुखः — सौमुख्य प्रदान करने वाले सुमुख
- कान्तिकन्दलिताश्रयः — कांति से पल्लवित आश्रय वाले
- मदनावत्याश्रिताङ्घ्रिः — मदनावती द्वारा आश्रित चरण वाले
- कृत्तदौर्मुख्यदुर्मुखः — दौर्मुख्य का नाश करने वाले दुर्मुख
- विघ्नसम्पल्लवोपघ्नः — विघ्न-पल्लवों को रोकने वाले
- सेवोन्निद्रमदद्रवः — सेवा से जाग्रत मद बहाने वाले
- विघ्नकृन्निघ्नचरणः — विघ्नकर्ताओं को दबाने वाले चरण वाले
- द्राविणीशक्तिसत्कृतः — द्राविणी-शक्ति द्वारा सत्कृत
- तीव्राप्रसन्ननयनः — तीव्रा-शक्ति से प्रसन्न नयन वाले
- ज्वालिनीपालितैकदृक् — ज्वालिनी द्वारा पालित एक दृष्टि वाले
- मोहिनीमोहनः — मोहिनी को भी मोहित करने वाले
चतुर्थ शतक (नाम 301–400)
- भोगदायिनीकान्तिमण्डितः — भोगदायिनी की कांति से मंडित
- कामिनीकान्तवक्त्रश्रीः — कामिनी-कांत मुख-श्री वाले
- अधिष्ठितवसुन्धरः — पृथ्वी पर अधिष्ठित
- नमद्वसुमतीमौलिमहापद्मनिधिप्रभुः — नत पृथ्वी के मौलि-महापद्मनिधि के प्रभु
- सर्वसद्गुरुसंसेव्यः — समस्त सद्गुरुओं द्वारा सेव्य
- शोचिष्केशहृदाश्रयः — अग्नि-केश (शिव) के हृदय में आश्रित
- ईशानमूर्द्धा — ईशान रूपी मस्तक वाले
- देवेन्द्रशिखा — देवेंद्र रूपी शिखा वाले
- पवननन्दनः — पवन को आनंद देने वाले
- अग्रप्रत्यग्रनयनः — आगे-पीछे देखने वाले नेत्र वाले
- दिव्यास्त्र प्रयोगवित् — दिव्यास्त्रों के प्रयोग में निपुण
- ऐरावतादिसर्वाशावारणावरणप्रियः — ऐरावत आदि दिग्गजों के प्रिय
- वज्राद्यस्त्रपरिवारः — वज्र आदि अस्त्रों से युक्त
- गणचण्डसमाश्रयः — प्रचंड गणों के आश्रय
- जयाजयापरीवारः — जया-अजया से परिवृत
- विजयाविजयावहः — विजया सहित विजय देने वाले
- अजितार्चितपादाब्जः — अजित (विष्णु) द्वारा पूजित चरण-कमल वाले
- नित्यानित्यावतंसितः — नित्या-शक्ति से अलंकृत
- विलासिनीकृतोल्लासः — विलासिनी द्वारा उल्लसित
- शौण्डीसौन्दर्यमण्डितः — शौण्डी के सौंदर्य से मंडित
- अनन्तानन्तसुखदः — अनंत-अनंत सुख देने वाले
- सुमङ्गलसुमङ्गलः — मंगलों में परम मंगल
- इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिनिषेवितः — इच्छा-ज्ञान-क्रिया शक्तियों द्वारा सेवित
- सुभगासंश्रितपदः — सुभगा द्वारा आश्रित चरण वाले
- ललिताललिताश्रयः — ललिता-शक्ति के आश्रय
- कामिनीकामनः — कामिनी द्वारा वांछित
- काममालिनीकेलिलालितः — काममालिनी की क्रीड़ा से लालित
- सरस्वत्याश्रयः — सरस्वती के आश्रय
- गौरीनन्दनः — गौरी के पुत्र
- श्रीनिकेतनः — श्री (लक्ष्मी) के निवास
- गुरुगुप्तपदः — गुरु-गुप्त पद वाले
- वाचासिद्धः — वाणी में सिद्ध
- वागीश्वरीपतिः — वागीश्वरी के पति
- नलिनीकामुकः — नलिनी (कमलिनी) के कामुक
- वामारामः — वामा-शक्ति में रमण करने वाले
- ज्येष्ठामनोरमः — ज्येष्ठा-शक्ति के मनोरम
- रौद्रीमुद्रितपादाब्जः — रौद्री द्वारा अंकित चरण-कमल वाले
- हुंबीजः — 'हुं' बीज रूप
- तुङ्गशक्तिकः — उन्नत शक्ति वाले
- विश्वादिजननत्राणः — विश्व आदि की उत्पत्ति व रक्षा करने वाले
- स्वाहाशक्तिः — स्वाहा-शक्ति रूप
- सकीलकः — कीलक सहित
- अमृताब्धिकृतावासः — अमृत-सागर में निवास करने वाले
- मदघूर्णितलोचनः — मद से घूर्णित नेत्र वाले
- उच्छिष्टगणः — उच्छिष्ट-गण रूप
- उच्छिष्टगणेशः — उच्छिष्ट-गणेश रूप
- गणनायकः — गणों के नायक
- सार्वकालिकसंसिद्धिः — सर्वकालिक सिद्धि रूप
- नित्यशैवः — नित्य शिव-स्वरूप
- दिगम्बरः — दिशाएँ ही वस्त्र वाले
- अनपायः — अविनाशी
- अनन्तदृष्टिः — अनंत दृष्टि वाले
- अप्रमेयः — अप्रमेय
- अजरामरः — जरा-मरण रहित
- अनाविलः — निर्मल
- अप्रतिरथः — जिनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं
- अच्युतः — अच्युत (अविचल)
- अमृतः — अमृत-स्वरूप
- अक्षरः — अक्षर (अविनाशी)
- अप्रतर्क्यः — तर्क से परे
- अक्षयः — क्षय-रहित
- अजय्यः — अजेय
- अनाधारः — आधार-रहित
- अनामयः — रोग-रहित
- अमलः — निर्मल
- अमोघसिद्धिः — अमोघ सिद्धि वाले
- अद्वैतः — अद्वैत-स्वरूप
- अघोरः — अघोर (शांत)
- अप्रमिताननः — अपरिमित मुख वाले
- अनाकारः — आकार-रहित
- अब्धिभूम्यग्निबलघ्नः — जल-भूमि-अग्नि के बल का नाश करने वाले
- अव्यक्तलक्षणः — अव्यक्त लक्षणों वाले
- आधारपीठः — आधार-पीठ रूप
- आधारः — समस्त के आधार
- आधाराधेयवर्जितः — आधार-आधेय से रहित
- आखुकेतनः — मूषक-ध्वज वाले
- आशापूरकः — आशा पूर्ण करने वाले
- आखुमहारथः — मूषक रूपी महारथ वाले
- इक्षुसागरमध्यस्थः — इक्षु-सागर के मध्य स्थित
- इक्षुभक्षणलालसः — इक्षु-भक्षण के इच्छुक
- इक्षुचापातिरेकश्रीः — इक्षु-धनुष से अधिक श्री वाले
- इक्षुचापनिषेवितः — इक्षु-धनुष से सेवित
- इन्द्रगोपसमानश्रीः — इंद्रगोप (बीरबहूटी) सम श्री वाले
- इन्द्रनीलसमद्युतिः — इंद्रनील मणि सम कांति वाले
- इन्दीवरदलश्यामः — नीलकमल-दल सम श्याम
- इन्दुमण्डलनिर्मलः — चंद्र-मंडल सम निर्मल
- इध्मप्रियः — समिधा के प्रिय
- इडाभागः — इडा-नाड़ी के भाग रूप
- इराधामः — वाणी के धाम
- इन्दिराप्रियः — इंदिरा (लक्ष्मी) के प्रिय
- इक्ष्वाकुविघ्नविध्वंसी — इक्ष्वाकु के विघ्न का नाश करने वाले
- इतिकर्तव्यतेप्सितः — कर्तव्य-पूर्ति के लिए वांछित
- ईशानमौलिः — ईशान रूपी मौलि वाले
- ईशानः — ईश्वर
- ईशानसुतः — ईशान (शिव) के पुत्र
- ईतिहा — ईतियों (उपद्रवों) का नाश करने वाले
- ईषणात्रयकल्पान्तः — तीन एषणाओं के लिए कल्पांत रूप
- ईहामात्रविवर्जितः — समस्त चेष्टा से रहित
- उपेन्द्रः — उपेंद्र (विष्णु) रूप
- उडुभृन्मौलिः — चंद्र को मौलि पर धारण करने वाले
पंचम शतक (नाम 401–500)
- उण्डेरकबलिप्रियः — मोदक-बलि के प्रिय
- उन्नताननः — उन्नत मुख वाले
- उत्तुङ्गः — अति उच्च
- उदारत्रिदशाग्रणीः — उदार देवताओं में अग्रणी
- ऊर्जस्वान् — बल-संपन्न
- ऊष्मलमदः — प्रबल मद वाले
- ऊहापोहदुरासदः — तर्क-वितर्क से दुर्गम
- ऋग्यजुस्सामसम्भूतिः — ऋक्-यजुः-साम से प्रकट
- ऋद्धिसिद्धिप्रवर्तकः — ऋद्धि-सिद्धि के प्रवर्तक
- ऋजुचित्तैकसुलभः — सरल चित्त वालों को सुलभ
- ऋणत्रयविमोचकः — तीन ऋणों से मुक्त करने वाले
- स्वभक्तलुप्तविघ्नः — अपने भक्तों के विघ्न मिटाने वाले
- सुरद्विषांलुप्तशक्तिः — देव-शत्रुओं की शक्ति हरने वाले
- विमुखार्चनलुप्तश्रीः — विमुख पूजकों की श्री हरने वाले
- लूताविस्फोटनाशनः — मकड़ी-विष व फोड़ों का नाश करने वाले
- एकारपीठमध्यस्थः — 'एकार' पीठ के मध्य स्थित
- एकपादकृतासनः — एक पाद पर आसन करने वाले
- एजिताखिलदैत्यश्रीः — समस्त दैत्यों की श्री हिला देने वाले
- एधिताखिलसंश्रयः — समस्त आश्रितों को बढ़ाने वाले
- ऐश्वर्यनिधिः — ऐश्वर्य के निधि
- ऐश्वर्यम् — ऐश्वर्य-स्वरूप
- ऐहिकामुष्मिकप्रदः — इहलोक-परलोक का फल देने वाले
- ऐरम्मदसमोन्मेषः — ऐरम्मद (विद्युत) सम उन्मेष वाले
- ऐरावतनिभाननः — ऐरावत सम मुख वाले
- ओङ्कारवाच्यः — ॐकार से वाच्य
- ओङ्कारः — ॐकार-स्वरूप
- ओजस्वान् — ओजस्वी
- ओषधीपतिः — औषधियों के पति
- औदार्यनिधिः — उदारता के निधि
- औद्धत्यधुर्यः — उद्धतों के नायक
- औन्नत्यनिस्स्वनः — उन्नति-नाद वाले
- सुरनागानामङ्कुशः — देव-नागों के लिए अंकुश रूप
- सुरविद्विषामङ्कुशः — देव-शत्रुओं के लिए अंकुश रूप
- अःसमस्तविसर्गान्तपदेषुपरिकीर्तितः — समस्त विसर्गांत पदों में कीर्तित
- कमण्डलुधरः — कमंडलु धारी
- कल्पः — कल्प-स्वरूप
- कपर्दी — जटाजूट धारी
- कलभाननः — गज-शावक सम मुख वाले
- कर्मसाक्षी — कर्मों के साक्षी
- कर्मकर्ता — कर्मों के कर्ता
- कर्माकर्मफलप्रदः — कर्म-अकर्म का फल देने वाले
- कदम्बगोलकाकारः — कदंब-गोलक सम आकार वाले
- कूष्माण्डगणनायकः — कूष्माण्ड-गणों के नायक
- कारुण्यदेहः — करुणामय देह वाले
- कपिलः — कपिल वर्ण वाले
- कथकः — कथावाचक रूप
- कटिसूत्रभृत् — कटि-सूत्र धारी
- खर्वः — बौने रूप
- खड्गप्रियः — खड्ग के प्रिय
- खड्गखान्तान्तःस्थः — खड्ग व 'ख' के अंत में स्थित
- खनिर्मलः — आकाश सम निर्मल
- खल्वाटशृङ्गनिलयः — खल्वाट-शिखर पर निवास करने वाले
- खट्वाङ्गी — खट्वांग धारी
- खदुरासदः — आकाश सम दुर्गम
- गुणाढ्यः — गुणों से समृद्ध
- गहनः — गहन (गूढ़)
- गस्थः — 'ग' में स्थित
- गद्यपद्यसुधार्णवः — गद्य-पद्य रूपी अमृत-सागर
- गद्यगानप्रियः — गद्य-गान के प्रिय
- गर्जः — गर्जना रूप
- गीतगीर्वाणपूर्वजः — देवताओं से पूर्वज (अग्रपूज्य)
- गुह्याचाररतः — गुह्याचार में रत
- गुह्यः — गुह्य (गोपनीय)
- गुह्यागमनिरूपितः — गुह्य आगमों में निरूपित
- गुहाशयः — हृदय-गुहा में शयन करने वाले
- गुहाब्धिस्थः — गुहा-सागर में स्थित
- गुरुगम्यः — गुरु द्वारा गम्य
- गुरोर्गुरुः — गुरुओं के भी गुरु
- घण्टाघर्घरिकामाली — घंटा-घर्घरिका की माला वाले
- घटकुम्भः — घट सम कुंभ (मस्तक) वाले
- घटोदरः — घट सम उदर वाले
- चण्डः — प्रचंड
- चण्डेश्वरसुहृत् — चंडेश्वर के सुहृद
- चण्डीशः — चंडी के ईश
- चण्डविक्रमः — प्रचंड पराक्रम वाले
- चराचरपतिः — चर-अचर के पति
- चिन्तामणिचर्वणलालसः — चिंतामणि-चर्वण के इच्छुक
- छन्दः — छंद-स्वरूप
- छन्दोवपुः — छंद रूपी देह वाले
- छन्दोदुर्लक्ष्यः — छंदों से दुर्लक्ष्य
- छन्दविग्रहः — छंद रूपी विग्रह वाले
- जगद्योनिः — जगत् के उद्गम
- जगत्साक्षी — जगत् के साक्षी
- जगदीशः — जगत् के ईश
- जगन्मयः — जगत्-स्वरूप
- जपः — जप-स्वरूप
- जपपरः — जप में तत्पर
- जप्यः — जप करने योग्य
- जिह्वासिंहासनप्रभुः — जिह्वा रूपी सिंहासन के प्रभु
- झलज्झलोल्लसद्दानझङ्कारिभ्रमराकुलः — मद-झंकार करते भौंरों से युक्त
- टङ्कारस्फारसंरावः — टंकार के विशाल नाद वाले
- टङ्कारिमणिनूपुरः — टंकार करते मणि-नूपुर वाले
- ठद्वयीपल्लवान्तःस्थसर्वमन्त्रैकसिद्धिदः — 'ठठ' पल्लवांत में स्थित सर्वमंत्र-सिद्धि देने वाले
- डिण्डिमुण्डः — डिंडि-मुंड रूप
- डाकिनीशः — डाकिनियों के ईश
- डामरः — डामर रूप
- डिण्डिमप्रियः — डिंडिम-वाद्य के प्रिय
- ढक्कानिनादमुदितः — ढक्का-नाद से प्रसन्न
- ढौकः — समीप आने वाले/भेंट रूप
- ढुण्ढिविनायकः — ढुंढि-विनायक रूप
षष्ठ शतक (नाम 501–600)
- तत्त्वानां परमतत्त्वम् — तत्त्वों के परम तत्त्व
- तत्त्वम्पदनिरूपितः — 'तत्त्वम्' पद से निरूपित
- तारकान्तरसंस्थानः — ताराओं के मध्य स्थित
- तारकः — तारने वाले
- तारकान्तकः — तारकासुर का अंत करने वाले (के प्रेरक)
- स्थाणुः — स्थिर (अचल)
- स्थाणुप्रियः — स्थाणु (शिव) के प्रिय
- स्थाता — स्थित रहने वाले
- स्थावरजङ्गमजगत् — स्थावर-जंगम जगत् रूप
- दक्षयज्ञप्रमथनः — दक्ष-यज्ञ का विध्वंस करने वाले
- दाता — दान देने वाले
- दानवमोहनः — दानवों को मोहित करने वाले
- दयावान् — दयालु
- दिव्यविभवः — दिव्य ऐश्वर्य वाले
- दण्डभृत् — दंड धारण करने वाले
- दण्डनायकः — दंड के नायक
- दन्तप्रभिन्नाभ्रमालः — दाँत से मेघ-माला भेदने वाले
- दैत्यवारणदारणः — दैत्य रूपी गजों का विदारण करने वाले
- दंष्ट्रालग्नद्विपघटः — दाढ़ में गज-समूह लटकाने वाले
- देवार्थनृगजाकृतिः — देवताओं के हेतु नर-गज आकृति वाले
- धनधान्यपतिः — धन-धान्य के पति
- धन्यः — धन्य-स्वरूप
- धनदः — धन देने वाले
- धरणीधरः — पृथ्वी को धारण करने वाले
- ध्यानैकप्रकटः — ध्यान से ही प्रकट होने वाले
- ध्येयः — ध्यान करने योग्य
- ध्यानः — ध्यान-स्वरूप
- ध्यानपरायणः — ध्यान में तत्पर
- नन्द्यः — वंदनीय
- नन्दिप्रियः — नंदी के प्रिय
- नादः — नाद-स्वरूप
- नादमध्यप्रतिष्ठितः — नाद के मध्य प्रतिष्ठित
- निष्कलः — निष्कल (अखंड)
- निर्मलः — निर्मल
- नित्यः — नित्य
- नित्यानित्यः — नित्य व अनित्य रूप
- निरामयः — रोग-रहित
- परं व्योम — परम आकाश रूप
- परं धाम — परम धाम
- परमात्मा — परमात्मा
- परं पदम् — परम पद
- परात्परः — परे से भी परे
- पशुपतिः — पशुओं (जीवों) के पति
- पशुपाशविमोचकः — पशु-पाश (बंधन) से मुक्त करने वाले
- पूर्णानन्दः — पूर्ण आनंद रूप
- परानन्दः — परम आनंद रूप
- पुराणपुरुषोत्तमः — पुराण-पुरुषोत्तम
- पद्मप्रसन्ननयनः — कमल सम प्रसन्न नयन वाले
- प्रणताज्ञाननाशनः — शरणागतों के अज्ञान का नाश करने वाले
- प्रमाणप्रत्ययातीतः — प्रमाण व प्रत्यय से परे
- प्रणतार्तिनिवारणः — शरणागतों की पीड़ा निवारण करने वाले
- फलहस्तः — हाथ में फल वाले
- फणिपतिः — नागों के पति
- फेत्कारः — फेत्कार-नाद रूप
- फाणितप्रियः — गुड़-राब के प्रिय
- बाणार्चिताङ्घ्रियुगलः — बाणासुर द्वारा पूजित चरण-युगल वाले
- बालकेलिकुतूहली — बाल-क्रीड़ा के कौतुकी
- ब्रह्म — ब्रह्म-स्वरूप
- ब्रह्मार्चितपदः — ब्रह्मा द्वारा पूजित चरण वाले
- ब्रह्मचारी — ब्रह्मचारी
- बृहस्पतिः — बृहस्पति रूप
- बृहत्तमः — सबसे महान
- ब्रह्मपरः — ब्रह्म से परे
- ब्रह्मण्यः — ब्रह्म-हितैषी
- ब्रह्मवित्प्रियः — ब्रह्मवेत्ताओं के प्रिय
- बृहन्नादाग्र्यचीत्कारः — उच्च नाद व चीत्कार वाले
- ब्रह्माण्डावलिमेखलः — ब्रह्मांड-समूह रूपी मेखला वाले
- भ्रूक्षेपदत्तलक्ष्मीकः — भ्रू-संकेत से लक्ष्मी प्रदान करने वाले
- भर्गः — तेज-स्वरूप
- भद्रः — कल्याणकारी
- भयापहः — भय को हरने वाले
- भगवान् — षड्ऐश्वर्य-संपन्न भगवान
- भक्तिसुलभः — भक्ति से सुलभ
- भूतिदः — ऐश्वर्य देने वाले
- भूतिभूषणः — भस्म से विभूषित
- भव्यः — भव्य (कल्याण रूप)
- भूतालयः — भूतों के आलय
- भोगदाता — भोग प्रदान करने वाले
- भ्रूमध्यगोचरः — भ्रू-मध्य में गोचर
- मन्त्रः — मंत्र-स्वरूप
- मन्त्रपतिः — मंत्रों के पति
- मन्त्री — मंत्र-ज्ञाता
- मदमत्तमनोरमः — मद से मत्त व मनोरम
- मेखलावान् — मेखला धारी
- मन्दगतिः — मंद गति वाले
- मतिमत्कमलेक्षणः — बुद्धिमानों को कमल सम दृष्टि वाले
- महाबलः — महाबलशाली
- महावीर्यः — महावीर्यवान
- महाप्राणः — महाप्राण रूप
- महामनाः — उदार मन वाले
- यज्ञः — यज्ञ-स्वरूप
- यज्ञपतिः — यज्ञों के पति
- यज्ञगोप्ता — यज्ञ के रक्षक
- यज्ञफलप्रदः — यज्ञ का फल देने वाले
- यशस्करः — यश देने वाले
- योगगम्यः — योग द्वारा गम्य
- याज्ञिकः — यज्ञकर्ता रूप
- याजकप्रियः — याजकों के प्रिय
- रसः — रस-स्वरूप
- रसप्रियः — रस के प्रिय
सप्तम शतक (नाम 601–700)
- रस्यः — रस्य (आस्वाद्य)
- रञ्जकः — आनंदित करने वाले
- रावणार्चितः — रावण द्वारा पूजित
- रक्षोरक्षाकरः — राक्षसों से रक्षा करने वाले
- रत्नगर्भः — रत्न-गर्भ वाले
- राजसुखप्रदः — राज-सुख देने वाले
- लक्ष्यः — लक्ष्य-स्वरूप
- लक्ष्यप्रदः — लक्ष्य प्रदान करने वाले
- लयस्थः — लय में स्थित
- लड्डुकप्रियः — लड्डू के प्रिय
- लानप्रियः — आलिंगन-प्रिय
- लास्यपरः — लास्य-नृत्य में तत्पर
- लाभकृल्लोकविश्रुतः — लाभ देने वाले व लोक-विख्यात
- वरेण्यः — वरणीय (श्रेष्ठ)
- वह्निवदनः — अग्नि सम मुख वाले
- वन्द्यः — वंदनीय
- वेदान्तगोचरः — वेदांत द्वारा गोचर
- विकर्ता — सृष्टि-कर्ता
- विश्वतश्चक्षुः — सर्वत्र दृष्टि वाले
- विधाता — विधाता
- विश्वतोमुखः — सर्वत्र मुख वाले
- वामदेवः — वामदेव (शिव) रूप
- विश्वनेता — विश्व के नेता
- वज्रिवज्रनिवारणः — इंद्र-वज्र का निवारण करने वाले
- विश्वबन्धनविष्कम्भाधारः — विश्व-बंधन के विष्कंभ-आधार
- विश्वेश्वरप्रभुः — विश्वेश्वर प्रभु
- शब्दब्रह्म — शब्द-ब्रह्म रूप
- शमप्राप्यः — शम (शांति) से प्राप्य
- शम्भुशक्तिगणेश्वरः — शम्भु-शक्ति रूपी गणेश्वर
- शास्ता — शासक
- शिखाग्रनिलयः — शिखाग्र में निवास करने वाले
- शरण्यः — शरण देने योग्य
- शिखरीश्वरः — पर्वतों के ईश
- षड्ऋतुकुसुमस्रग्वी — छह ऋतुओं के पुष्प-हार वाले
- षडाधारः — छह आधार (चक्र) वाले
- षडक्षरः — षडक्षर-स्वरूप
- संसारवैद्यः — संसार-रोग के वैद्य
- सर्वज्ञः — सर्वज्ञ
- सर्वभेषजभेषजः — समस्त औषधियों की औषधि
- सृष्टिस्थितिलयक्रीडः — सृष्टि-स्थिति-लय की क्रीड़ा करने वाले
- सुरकुञ्जरभेदनः — देव-गजों का भेदन करने वाले
- सिन्दूरितमहाकुम्भः — सिंदूर-चर्चित विशाल कुंभ वाले
- सदसद्व्यक्तिदायकः — सत्-असत् की व्यक्ति देने वाले
- साक्षी — साक्षी-स्वरूप
- समुद्रमथनः — समुद्र-मंथन के (प्रेरक)
- स्वसंवेद्यः — स्वयं से ज्ञेय
- स्वदक्षिणः — उदार दक्षिण वाले
- स्वतन्त्रः — स्वतंत्र
- सत्यसङ्कल्पः — सत्य संकल्प वाले
- सामगानरतः — सामगान में रत
- सुखी — सुखस्वरूप
- हंसः — हंस (परमात्मा) रूप
- हस्तिपिशाचीशः — हस्तिपिशाची-शक्ति के ईश
- हवनः — हवन-स्वरूप
- हव्यकव्यभुक् — हव्य-कव्य का भोग करने वाले
- हव्यः — हव्य (आहुति) रूप
- हुतप्रियः — हवन के प्रिय
- हर्षः — हर्ष-स्वरूप
- हृल्लेखामन्त्रमध्यगः — हृल्लेखा-मंत्र के मध्य स्थित
- क्षेत्राधिपः — क्षेत्रों के अधिपति
- क्षमाभर्ता — क्षमा के धारक
- क्षमापरपरायणः — क्षमा में परम तत्पर
- क्षिप्रक्षेमकरः — शीघ्र कल्याण करने वाले
- क्षेमानन्दः — कल्याण व आनंद रूप
- क्षोणीसुरद्रुमः — पृथ्वी पर देव-कल्पवृक्ष रूप
- धर्मप्रदः — धर्म प्रदान करने वाले
- अर्थदः — अर्थ (धन) देने वाले
- कामदाता — काम (इच्छा) पूर्ण करने वाले
- सौभाग्यवर्धनः — सौभाग्य बढ़ाने वाले
- विद्याप्रदः — विद्या देने वाले
- विभवदः — वैभव देने वाले
- भुक्तिमुक्तिफलप्रदः — भोग व मोक्ष फल देने वाले
- आभिरूप्यकरः — सौंदर्य प्रदान करने वाले
- वीरश्रीप्रदः — वीर-श्री प्रदान करने वाले
- विजयप्रदः — विजय प्रदान करने वाले
- सर्ववश्यकरः — सबको वश में करने वाले
- गर्भदोषहा — गर्भ-दोषों का नाश करने वाले
- पुत्रपौत्रदः — पुत्र-पौत्र देने वाले
- मेधादः — मेधा (बुद्धि) देने वाले
- कीर्तिदः — कीर्ति देने वाले
- शोकहारी — शोक हरने वाले
- दौर्भाग्यनाशनः — दुर्भाग्य का नाश करने वाले
- प्रतिवादिमुखस्तम्भः — प्रतिवादियों के मुख स्तंभित करने वाले
- रुष्टचित्तप्रसादनः — रुष्ट चित्त को प्रसन्न करने वाले
- पराभिचारशमनः — पर-अभिचार (टोना) का शमन करने वाले
- दुःखभञ्जनकारकः — दुःखों का नाश करने वाले
- लवः — लव (काल-अंश) रूप
- त्रुटिः — त्रुटि (काल-अंश) रूप
- कला — कला-स्वरूप
- काष्ठा — काष्ठा (काल-अंश) रूप
- निमेषः — निमेष (काल) रूप
- तत्परः — तत्पर (काल-अंश) रूप
- क्षणः — क्षण-स्वरूप
- घटी — घटी (काल) रूप
- मुहूर्तः — मुहूर्त-स्वरूप
- प्रहरः — प्रहर-स्वरूप
- दिवानक्तः — दिन-रात रूप
- अहर्निशः — अहोरात्र रूप
- पक्षः — पक्ष-स्वरूप
- मासः — मास-स्वरूप
अष्टम शतक (नाम 701–800)
- अयनः — अयन-स्वरूप
- वर्षः — वर्ष-स्वरूप
- युगः — युग-स्वरूप
- कल्पः — कल्प-स्वरूप
- महालयः — महाप्रलय रूप
- राशिः — राशि-स्वरूप
- तारा — तारा (नक्षत्र) रूप
- तिथिः — तिथि-स्वरूप
- योगः — योग (पंचांग) रूप
- वारः — वार-स्वरूप
- करणः — करण-स्वरूप
- अंशकः — अंश-स्वरूप
- लग्नः — लग्न-स्वरूप
- होरा — होरा-स्वरूप
- कालचक्रः — कालचक्र-स्वरूप
- मेरुः — मेरु-स्वरूप
- सप्तर्षिः — सप्तर्षि-स्वरूप
- ध्रुवः — ध्रुव-स्वरूप
- राहुः — राहु-स्वरूप
- मन्दः — शनि-स्वरूप
- कविः — शुक्र-स्वरूप
- जीवः — बृहस्पति-स्वरूप
- बुधः — बुध-स्वरूप
- भौमः — मंगल-स्वरूप
- शशी — चंद्र-स्वरूप
- रविः — सूर्य-स्वरूप
- कालः — काल-स्वरूप
- सृष्टिः — सृष्टि-स्वरूप
- स्थितिः — स्थिति-स्वरूप
- विश्वः — विश्व-स्वरूप
- भूः — पृथ्वी-स्वरूप
- आपः — जल-स्वरूप
- अग्निः — अग्नि-स्वरूप
- मरुत् — वायु-स्वरूप
- व्योम — आकाश-स्वरूप
- अहङ्कृतिः — अहंकार-तत्त्व रूप
- प्रकृतिः — प्रकृति-स्वरूप
- पुमान् — पुरुष-स्वरूप
- ब्रह्मा — ब्रह्मा-स्वरूप
- विष्णुः — विष्णु-स्वरूप
- शिवः — शिव-स्वरूप
- रुद्रः — रुद्र-स्वरूप
- ईशः — ईश्वर-स्वरूप
- शक्तिः — शक्ति-स्वरूप
- सदाशिवः — सदाशिव-स्वरूप
- त्रिदशः — देवता-स्वरूप
- पितृः — पितर-स्वरूप
- सिद्धः — सिद्ध-स्वरूप
- यक्षः — यक्ष-स्वरूप
- रक्षः — राक्षस-स्वरूप
- किन्नरः — किन्नर-स्वरूप
- साध्यः — साध्य-स्वरूप
- विद्याधरः — विद्याधर-स्वरूप
- भूतः — भूत-स्वरूप
- मनुष्यः — मनुष्य-स्वरूप
- पशुः — पशु-स्वरूप
- खगः — पक्षी-स्वरूप
- समुद्रः — समुद्र-स्वरूप
- सरित् — नदी-स्वरूप
- शैलः — पर्वत-स्वरूप
- भूतः — प्राणी-स्वरूप
- भव्यः — भव्य (भविष्य) रूप
- साङ्ख्यः — सांख्य-दर्शन रूप
- पातञ्जलः — पातंजल-योग रूप
- योगः — योग-दर्शन रूप
- पुराणः — पुराण-स्वरूप
- श्रुतिः — श्रुति (वेद) रूप
- स्मृतिः — स्मृति-स्वरूप
- वेदाङ्गः — वेदांग-स्वरूप
- सदाचारः — सदाचार-स्वरूप
- मीमांसा — मीमांसा-दर्शन रूप
- न्यायविस्तरः — न्याय-दर्शन के विस्तार रूप
- आयुर्वेदः — आयुर्वेद-स्वरूप
- धनुर्वेदः — धनुर्वेद-स्वरूप
- गान्धर्वः — गांधर्व (संगीत) वेद रूप
- काव्यनाटकः — काव्य-नाटक रूप
- वैखानसः — वैखानस-मत रूप
- भागवतः — भागवत-मत रूप
- सात्वतः — सात्वत-मत रूप
- पाञ्चरात्रकः — पांचरात्र-मत रूप
- शैवः — शैव-मत रूप
- पाशुपतः — पाशुपत-मत रूप
- कालामुखः — कालामुख-मत रूप
- भैरवशासनः — भैरव-शासन रूप
- शाक्तः — शाक्त-मत रूप
- वैनायकः — वैनायक-मत रूप
- सौरः — सौर-मत रूप
- जैनः — जैन-मत रूप
- आर्हतसंहिता — आर्हत-संहिता रूप
- सत् — सत् (विद्यमान) रूप
- असत् — असत् (अव्यक्त) रूप
- व्यक्तः — व्यक्त रूप
- अव्यक्तः — अव्यक्त रूप
- सचेतनः — सचेतन रूप
- अचेतनः — अचेतन रूप
- बन्धः — बंधन-स्वरूप
- मोक्षः — मोक्ष-स्वरूप
- सुखम् — सुख-स्वरूप
- भोगः — भोग-स्वरूप
- अयोगः — योग-रहित रूप
नवम शतक (नाम 801–900)
- सत्यम् — सत्य-स्वरूप
- अणुः — अणु (सूक्ष्म) रूप
- महान् — महान (विराट) रूप
- स्वस्ति — स्वस्ति-स्वरूप
- हुम् — 'हुं' बीज रूप
- फट् — 'फट्' मंत्रांग रूप
- स्वधा — स्वधा-स्वरूप
- स्वाहा — स्वाहा-स्वरूप
- श्रौषट् — 'श्रौषट्' वषट्कार रूप
- वौषट् — 'वौषट्' वषट्कार रूप
- वषट् — 'वषट्' वषट्कार रूप
- नमो नमः — नमस्कार-स्वरूप
- ज्ञानम् — ज्ञान-स्वरूप
- विज्ञानम् — विज्ञान-स्वरूप
- आनन्दः — आनंद-स्वरूप
- बोधः — बोध-स्वरूप
- संविद् — संवित् (चेतना) रूप
- शमः — शम (शांति) रूप
- यमः — यम (संयम) रूप
- एकः — एक (अद्वितीय)
- एकाक्षराधारः — एकाक्षर (ॐ) के आधार
- एकाक्षरपरायणः — एकाक्षर में तत्पर
- एकाग्रधीः — एकाग्र बुद्धि वाले
- एकवीरः — अद्वितीय वीर
- एकानेकस्वरूपधृक् — एक व अनेक रूप धारण करने वाले
- द्विरूपः — दो रूप वाले
- द्विभुजः — दो भुजाओं वाले
- द्व्यक्षः — दो नेत्रों वाले
- द्विरदः — दो दाँतों वाले
- द्वीपरक्षकः — द्वीपों के रक्षक
- द्वैमातुरः — दो माताओं वाले
- द्विवदनः — दो मुख वाले
- द्वन्द्वातीतः — द्वंद्वों से परे
- द्व्यातिगः — द्वंद्व से परे जाने वाले
- त्रिधामा — तीन धाम वाले
- त्रिकरः — तीन कर वाले
- त्रेतात्रिवर्गफलदायकः — त्रेता व त्रिवर्ग का फल देने वाले
- त्रिगुणात्मा — तीन गुण-स्वरूप
- त्रिलोकादिः — तीन लोकों के आदि
- त्रिशक्तीशः — तीन शक्तियों के ईश
- त्रिलोचनः — तीन नेत्रों वाले
- चतुर्बाहुः — चार भुजाओं वाले
- चतुर्दन्तः — चार दाँतों वाले
- चतुरात्मा — चार रूप-स्वरूप
- चतुर्मुखः — चार मुख वाले
- चतुर्विधोपायमयः — चार उपायों (साम आदि) रूप
- चतुर्वर्णाश्रमाश्रयः — चार वर्ण-आश्रमों के आश्रय
- चतुर्विधवचोवृत्तिपरिवृत्तिप्रवर्तकः — चार वाणी-वृत्तियों के प्रवर्तक
- चतुर्थीपूजनप्रीतः — चतुर्थी-पूजन से प्रसन्न होने वाले
- चतुर्थीतिथिसम्भवः — चतुर्थी तिथि पर प्रकट
- पञ्चाक्षरात्मा — पञ्चाक्षर-स्वरूप
- पञ्चात्मा — पाँच रूप-स्वरूप
- पञ्चास्यः — पाँच मुख वाले
- पञ्चकृत्यकृत् — पाँच कृत्य (सृष्टि आदि) करने वाले
- पञ्चाधारः — पाँच आधार वाले
- पञ्चवर्णः — पाँच वर्णों वाले
- पञ्चाक्षरपरायणः — पञ्चाक्षर में तत्पर
- पञ्चतालः — पाँच ताल वाले
- पञ्चकरः — पाँच कर वाले
- पञ्चप्रणवभावितः — पाँच प्रणवों से भावित
- पञ्चब्रह्ममयस्फूर्तिः — पञ्च-ब्रह्ममयी स्फूर्ति रूप
- पञ्चावरणवारितः — पाँच आवरणों से वेष्टित
- पञ्चभक्ष्यप्रियः — पाँच भक्ष्यों के प्रिय
- पञ्चबाणः — पाँच बाण वाले
- पञ्चशिवात्मकः — पञ्च-शिव स्वरूप
- षट्कोणपीठः — षट्कोण पीठ वाले
- षट्चक्रधामा — षट्चक्रों के धाम
- षड्ग्रन्थिभेदकः — छह ग्रंथियों का भेदन करने वाले
- षड्ध्वध्वान्तविध्वंसी — छह मार्गों के अंधकार का नाश करने वाले
- षडङ्गुलमहाह्रदः — षडङ्गुल महाह्रद रूप
- षण्मुखः — छह मुख वाले
- षण्मुखभ्राता — षण्मुख (कार्तिकेय) के भ्राता
- षट्शक्तिपरिवारितः — छह शक्तियों से घिरे
- षड्वैरिवर्गविध्वंसी — छह शत्रुओं (काम आदि) का नाश करने वाले
- षडूर्मिमायाभञ्जनः — छह ऊर्मियों की माया का नाश करने वाले
- षट्तर्कदूरः — छह तर्कों से परे
- षट्कर्मनिरतः — छह कर्मों में रत
- षड्रसाश्रयः — छह रसों के आश्रय
- सप्तपातालचरणः — सात पातालरूपी चरण वाले
- सप्तद्वीपोरुमण्डलः — सात द्वीपरूपी विशाल मण्डल वाले
- सप्तस्वर्लोकमुकुटः — सात स्वर्गलोक रूपी मुकुट वाले
- सप्तसप्तिवरप्रदः — सप्त-अश्व (सूर्य) को वर देने वाले
- सप्ताङ्गराज्यसुखदः — सप्तांग राज्य का सुख देने वाले
- सप्तर्षिगणमण्डितः — सप्तर्षिगण से मण्डित
- सप्तच्छन्दोनिधिः — सात छंदों के निधि
- सप्तहोता — सात होताओं रूप
- सप्तस्वराश्रयः — सात स्वरों के आश्रय
- सप्ताब्धिकेलिकासारः — सात समुद्ररूपी क्रीड़ा-सरोवर वाले
- सप्तमातृनिषेवितः — सप्त-मातृकाओं द्वारा सेवित
- सप्तच्छन्दोमोदमदः — सात छंदों के आनंद-मद वाले
- सप्तच्छन्दोमखप्रभुः — सात छंदों के यज्ञ के प्रभु
- अष्टमूर्तिध्येयमूर्तिः — अष्टमूर्ति में ध्येय मूर्ति वाले
- अष्टप्रकृतिकारणः — आठ प्रकृतियों के कारण
- अष्टाङ्गयोगफलभूः — अष्टांग योग के फल रूप
- अष्टपत्राम्बुजासनः — अष्टदल कमल पर आसीन
- अष्टशक्तिसमृद्धश्रीः — आठ शक्तियों से समृद्ध श्री वाले
- अष्टैश्वर्यप्रदायकः — आठ ऐश्वर्य देने वाले
- अष्टपीठोपपीठश्रीः — आठ पीठ-उपपीठ की श्री वाले
- अष्टमातृसमावृतः — आठ मातृकाओं से घिरे
- अष्टभैरवसेव्यः — आठ भैरवों द्वारा सेव्य
दशम शतक (नाम 901–996)
- अष्टवसुवन्द्यः — आठ वसुओं द्वारा वंदित
- अष्टमूर्तिभृत् — आठ मूर्तियाँ धारण करने वाले
- अष्टचक्रस्फुरन्मूर्तिः — आठ चक्रों में स्फुरित मूर्ति वाले
- अष्टद्रव्यहविःप्रियः — आठ द्रव्यों की हवि के प्रिय
- नवनागासनाध्यासी — नौ नागासन पर विराजमान
- नवनिध्यनुशासितः — नौ निधियों के अनुशासक
- नवद्वारपुराधारः — नवद्वार-पुर (देह) के आधार
- नवाधारनिकेतनः — नौ आधारों के निकेतन
- नवनारायणस्तुत्यः — नौ नारायणों द्वारा स्तुत्य
- नवदुर्गानिषेवितः — नवदुर्गाओं द्वारा सेवित
- नवनाथमहानाथः — नौ नाथों के महानाथ
- नवनागविभूषणः — नौ नागों से विभूषित
- नवरत्नविचित्राङ्गः — नवरत्नों से विचित्र अंगों वाले
- नवशक्तिशिरोधृतः — नौ शक्तियों को शिरोधार्य करने वाले
- दशात्मकः — दश रूप वाले
- दशभुजः — दस भुजाओं वाले
- दशदिक्पतिवन्दितः — दस दिक्पालों द्वारा वंदित
- दशाध्यायः — दश अध्याय रूप
- दशप्राणः — दस प्राण रूप
- दशेन्द्रियनियामकः — दस इंद्रियों के नियामक
- दशाक्षरमहामन्त्रः — दशाक्षर महामंत्र रूप
- दशाशाव्यापिविग्रहः — दसों दिशाओं में व्यापक विग्रह वाले
- एकादशादिभीरुद्रैःस्तुतः — एकादश रुद्रों आदि द्वारा स्तुत
- एकादशाक्षरः — एकादशाक्षर रूप
- द्वादशोद्दण्डदोर्दण्डः — बारह उद्दंड भुजादंड वाले
- द्वादशान्तनिकेतनः — द्वादशांत में निवास करने वाले
- त्रयोदशाभिदाभिन्नविश्वेदेवाधिदैवतः — तेरह भेदों वाले विश्वेदेवों के अधिदैवत
- चतुर्दशेन्द्रवरदः — चौदह इंद्रों को वर देने वाले
- चतुर्दशमनुप्रभुः — चौदह मनुओं के प्रभु
- चतुर्दशविद्याढ्यः — चौदह विद्याओं से समृद्ध
- चतुर्दशजगत्प्रभुः — चौदह भुवनों के प्रभु
- सामपञ्चदशः — समान पंद्रह कलाओं वाले
- पञ्चदशीशीतांशुनिर्मलः — पूर्ण चंद्रकला सम निर्मल
- षोडशाधारनिलयः — सोलह आधारों के निलय
- षोडशस्वरमातृका — सोलह स्वर-मातृका रूप
- षोडशान्तपदवासः — षोडशांत पद में वास करने वाले
- षोडशेन्दुकलात्मकः — सोलह चंद्रकला स्वरूप
- कलासप्तदशी — सत्रहवीं कला रूप
- सप्तदशः — सत्रह रूप
- सप्तदशाक्षरः — सत्रह अक्षर रूप
- अष्टादशद्वीपपतिः — अठारह द्वीपों के पति
- अष्टादशपुराणकृत् — अठारह पुराणों के रचयिता
- अष्टादशौषधिसृष्टिः — अठारह औषधियों की सृष्टि करने वाले
- अष्टादशविधिस्मृतः — अठारह विधियों में स्मृत
- अष्टादशलिपिव्यष्टिसमष्टिज्ञानकोविदः — अठारह लिपियों के व्यष्टि-समष्टि ज्ञान में निपुण
- एकविंशपुरुषः — इक्कीस रूप वाले पुरुष
- एकविंशत्यङ्गुलिपल्लवः — इक्कीस अंगुलिरूपी पल्लव वाले
- चतुर्विंशतितत्त्वात्मा — चौबीस तत्त्व-स्वरूप
- पञ्चविंशाख्यपुरुषः — पच्चीस नामक पुरुष रूप
- सप्तविंशतितारेशः — सत्ताईस ताराओं (नक्षत्रों) के ईश
- सप्तविंशतियोगकृत् — सत्ताईस योग करने वाले
- द्वात्रिंशद्भैरवाधीशः — बत्तीस भैरवों के अधीश
- चतुस्त्रिंशन्महाह्रदः — चौंतीस महाह्रद रूप
- षट्त्रिंशत्तत्त्वसम्भूतिः — छत्तीस तत्त्वों की उत्पत्ति
- अष्टत्रिंशकलातनुः — अड़तीस कलाओं वाले तनु
- एकोनपञ्चाशन्मरुद्वर्गनिरर्गलः — उनचास मरुद्गणों में निर्बाध
- पञ्चाशदक्षरश्रेणी — पचास अक्षरों की श्रेणी रूप
- पञ्चाशद्रुद्रविग्रहः — पचास रुद्र विग्रह वाले
- पञ्चाशद्विष्णुशक्तीशः — पचास विष्णु-शक्तियों के ईश
- पञ्चाशन्मातृकालयः — पचास मातृकाओं के आलय
- द्विपञ्चाशद्वपुःश्रेणी — बावन रूपों की श्रेणी वाले
- त्रिषष्ट्यक्षरसंश्रयः — तिरसठ अक्षरों के आश्रय
- चतुःषष्ट्यर्णनिर्णेता — चौंसठ अक्षरों के निर्णायक
- चतुःषष्टिकलानिधिः — चौंसठ कलाओं के निधि
- चतुःषष्टिमहासिद्धयोगिनीवृन्दवन्दितः — चौंसठ महासिद्ध योगिनी-वृंद द्वारा वंदित
- अष्टषष्टिमहातीर्थक्षेत्रभैरवभावनः — अड़सठ महातीर्थ-क्षेत्रों के भैरवरूप भावन
- चतुर्नवतिमन्त्रात्मा — चौरानवे मंत्र-स्वरूप
- षण्णवत्यधिकप्रभुः — छियानवे से अधिक के प्रभु
- शतानन्दः — सौ आनंद रूप
- शतधृतिः — सौ धारण करने वाले
- शतपत्रायतेक्षणः — शतदल कमल सम विशाल नेत्रों वाले
- शतानीकः — सौ सेनाओं वाले
- शतमखः — सौ यज्ञों वाले
- शतधारवरायुधः — सौ धार वाले श्रेष्ठ आयुध वाले
- सहस्रपत्रनिलयः — सहस्रदल कमल के निलय
- सहस्रफणभूषणः — सहस्र फणों से भूषित
- सहस्रशीर्षपुरुषः — सहस्र शीर्ष वाले पुरुष
- सहस्राक्षः — सहस्र नेत्रों वाले
- सहस्रपात् — सहस्र चरणों वाले
- सहस्रनामसंस्तुत्यः — सहस्रनाम से संस्तुत्य
- सहस्राक्षबलापहः — सहस्राक्ष (इंद्र) का बल हरने वाले
- दशसहस्रफणभृत्फणिराजकृतासनः — दस सहस्र फण वाले नागराज को आसन बनाने वाले
- अष्टाशीतिसहस्राद्यमहर्षिस्तोत्रयन्त्रितः — अट्ठासी सहस्र महर्षियों के स्तोत्र से आबद्ध
- लक्षाधीशप्रियाधारः — लाखों ईशों के प्रिय आधार
- लक्ष्याधारमनोमयः — लक्ष्य के आधार व मनोमय
- चतुर्लक्षजपप्रीतः — चार लाख जप से प्रसन्न
- चतुर्लक्षप्रकाशितः — चार लाख योनियों में प्रकाशित
- चतुराशीतिलक्षाणां जीवानां देहसंस्थितः — चौरासी लाख जीवों की देह में स्थित
- कोटिसूर्यप्रतिकाशः — करोड़ों सूर्यों सम प्रकाश वाले
- कोटिचन्द्रांशुनिर्मलः — करोड़ों चंद्र-किरणों सम निर्मल
- शिवभवाध्युष्टकोटिविनायकधुरन्धरः — साढ़े तीन करोड़ विनायकों के धुरंधर
- सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रितावयवद्युतिः — सात करोड़ महामंत्रों से मंत्रित अंग-कांति वाले
- त्रयस्त्रिंशत्कोटिसुरश्रेणीप्रणतपादुकः — तैंतीस करोड़ देवों द्वारा प्रणत चरण-पादुका वाले
- अनन्तनामा — अनंत नाम वाले
- अनन्तश्रीः — अनंत श्री वाले
- अनन्तानन्तसौख्यदः — अनंत-अनंत सुख देने वाले
अर्थ (हिन्दी)
- वक्र सूँड वाले, विशाल काय, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हे देव! मेरे समस्त कार्यों को सदा निर्विघ्न कीजिए।
लाभ
- कार्यों में विघ्नों का नाश व सफलता मिलती है।
- बुद्धि, विवेक व एकाग्रता बढ़ती है।
- रोग, दोष व नकारात्मकता का नाश होता है।
- घर में सुख-समृद्धि व मंगल का वास होता है।
कब करें पाठ
बुधवार को · गणेश चतुर्थी पर · किसी नए कार्य के आरंभ में
स्रोत
रचयिता: गणेश पुराण परंपरा. गणेश पुराण — उपासना खण्ड (श्री गणेश सहस्रनामस्तोत्र)
