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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री गंगा माता आरती

आरती

पाठ

1

ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता। जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥

2

शिव की जटा से निकली, धरती पर तुम आई। भगीरथ के संग चलकर, जग को राह दिखाई॥

3

पतित-पावनी तुम हो, पाप सभी हरती। जो नहाये तेरे जल में, मुक्ति वही पाती॥

4

तट पर साधु-संत सब, तेरे गुण गाते। हर-हर गंगे कहकर, मन को हर्षाते॥

5

गंगा माँ की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। पाप-ताप सब मिटते, मोक्ष-पद वह पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे गंगा माता, आपकी जय हो! जो मनुष्य आपका ध्यान करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है।
  2. आप शिव की जटाओं से निकलकर धरती पर अवतरित हुईं; राजा भगीरथ के संग चलकर आपने जगत को (मुक्ति का) मार्ग दिखाया।
  3. आप पतितों को पावन करने वाली हैं और समस्त पापों को हर लेती हैं; जो आपके जल में स्नान करता है, वह मुक्ति पा जाता है।
  4. आपके तट पर सभी साधु-संत आपके गुण गाते हैं; "हर-हर गंगे" कहकर अपने मन को हर्षित करते हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से गंगा माँ की यह आरती गाता है, उसके समस्त पाप-ताप मिट जाते हैं और वह मोक्ष-पद प्राप्त करता है।

लाभ

  • पापों का नाश होकर मन पवित्र होता है।
  • मोक्ष-मार्ग प्रशस्त होकर आध्यात्मिक उन्नति होती है।
  • मन को शांति व सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।

कब करें पाठ

गंगा-तट पर संध्या-आरती में · गंगा दशहरा व कार्तिक पूर्णिमा पर · प्रातः व संध्या स्नान के समय

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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