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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री गायत्री माता आरती
आरती
पाठ
1
जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता। सत् मारग पर हमको चलाओ, जो है सुखदाता॥
2
आदि शक्ति तुम अलख निरंजन, जग पालन कर्त्री। दुःख शोक भय क्लेश कलह दारिद्र्य दैन्य हर्त्री॥
3
ब्रह्मरूपिणी प्रणत पालिनी, जगत धातृ अम्बे। भवभयहारी जनहितकारी, सुखद जननि जगदम्बे॥
4
भय हारिणि भवतारिणि अम्बे, भक्तन की रक्षा करो। ज्योति जगा कर अन्तर्मन में, सद्बुद्धि वर दो॥
5
गायत्री माँ की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। तेज बुद्धि बल पावे, भवसागर तर जावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे गायत्री माता, आपकी जय हो! जो सुख देने वाला सत्य-मार्ग है, हमें उसी पर चलाइए।
- आप आदिशक्ति, अलक्ष्य व निरंजन हैं तथा जगत का पालन करने वाली हैं; आप दुःख, शोक, भय, क्लेश, कलह, दरिद्रता व दीनता का हरण करती हैं।
- हे अम्बे! आप ब्रह्मरूपिणी, शरणागत की रक्षिका व जगत को धारण करने वाली हैं; भवभय हरने वाली, जनहितकारी व सुख देने वाली जगज्जननी हैं।
- हे भय हरने वाली व भवसागर से तारने वाली अम्बे! भक्तों की रक्षा कीजिए; अन्तर्मन में ज्ञान-ज्योति जगाकर हमें सद्बुद्धि का वरदान दीजिए।
- जो भक्त श्रद्धा से गायत्री माँ की यह आरती गाता है, वह तेज, बुद्धि व बल प्राप्त करता है और भवसागर से पार हो जाता है।
लाभ
- बुद्धि, विवेक व एकाग्रता में वृद्धि होती है।
- मन शांत होकर आध्यात्मिक तेज व उन्नति बढ़ती है।
- नकारात्मक विचारों का नाश होकर सद्बुद्धि आती है।
कब करें पाठ
प्रातः व संध्या (संध्या-वंदन काल) · गायत्री जयंती पर · गायत्री जप/उपासना के पश्चात
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह
