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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री गोवर्धन आरती

आरती · श्री कृष्ण

पाठ

1

जय जय गिरिराज गोवर्धन, ब्रज के रखवारे। कृष्ण-कर पर शोभे, तुम सबसे न्यारे॥

2

कनिष्ठा पर धारे गिरि, इन्द्र-मान भंजन। ब्रजवासी की रक्षा, कीन्ही मधुसूदन॥

3

सात दिवस गिरि धारे, वर्षा से बचाया। गोवर्धन पूजा का, विधान जग बताया॥

4

अन्नकूट का भोग लगे, परिक्रमा प्यारी। जो जन तुमको पूजे, सुख-समृद्धि सारी॥

5

गोवर्धन की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। सुख-समृद्धि वह पावे, कृष्ण-कृपा पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे गिरिराज गोवर्धन, हे ब्रज के रक्षक, आपकी जय हो! श्रीकृष्ण के कर (हाथ) पर सुशोभित आप सबसे अद्वितीय हैं।
  2. कनिष्ठा अंगुली पर पर्वत धारण कर इन्द्र का मान भंग किया; मधुसूदन (कृष्ण) ने ब्रजवासियों की रक्षा की।
  3. सात दिनों तक पर्वत धारण कर (कृष्ण ने ब्रज को) वर्षा से बचाया; और जगत को गोवर्धन पूजा का विधान बताया।
  4. आपको अन्नकूट का भोग लगाया जाता है और परिक्रमा अति प्रिय है; जो आपको पूजता है, उसे समस्त सुख-समृद्धि मिलती है।
  5. जो भक्त श्रद्धा से गोवर्धन की यह आरती गाता है, वह सुख-समृद्धि तथा श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त करता है।

लाभ

  • सुख, समृद्धि व अन्न-धन की प्राप्ति होती है।
  • भय, बाधा व प्राकृतिक संकट से रक्षा होती है।
  • श्रीकृष्ण की कृपा व भक्ति में वृद्धि होती है।

कब करें पाठ

गोवर्धन पूजा/अन्नकूट (दीपावली के अगले दिन) पर · गोवर्धन परिक्रमा के समय · नित्य संध्या में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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