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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री गोवर्धन चालीसा

चालीसा · श्री कृष्ण

पाठ

गणपति-गुरु-पद वंदना, सुमिर श्याम-सुखधाम। गिरिराज गोवर्धन की, करूँ चालीसा अभिराम॥

1

जय गिरिराज गोवर्धन स्वामी। ब्रज-रक्षक तुम अन्तर्यामी॥

2

कृष्ण-स्वरूप तुम्हें जग माने। गिरिराज रूप सब जन जाने॥

3

कृष्ण-कर पर तुम्हें उठाया। इन्द्र-कोप से ब्रज बचाया॥

4

सात दिवस तुम छत्र बने थे। ब्रजवासी सब शरण मिले थे॥

5

मूसलधार वृष्टि जब आई। गिरि-तले ब्रज-रक्षा पाई॥

6

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

7

गोवर्धन-धाम सुहावन तेरा। भक्त-गण नित परिक्रमा फेरा॥

8

सात कोस परिक्रमा भारी। भक्त लगावें श्रद्धा धारी॥

9

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

10

अन्नकूट का पर्व सुहाता। छप्पन भोग गिरिधर भाता॥

11

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥

12

जो जन तुमको शीश नवावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

13

दूध-दही भोग जो लगावैं। गिरिराज-कृपा वे सब पावैं॥

14

रोग-दोष सब दूर भगाते। सुख-समृद्धि घर में लाते॥

15

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। गिरिराज-कृपा सहज वह पावै॥

16

मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥

17

राधा-कृष्ण संग तुम विराजो। ब्रज-धाम की शोभा साजो॥

18

जो श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

19

जो यह गोवर्धन चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥

20

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा गिरिराज की होई॥

21

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। सुख-समृद्धि घर में लावैं॥

22

गिरिराज-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

23

मानसी-गंगा निकट सुहाती। भक्त-गण वहँ पुण्य कमाती॥

24

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत गिरिराज देवा॥

25

संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

26

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

27

गौ-चारण की लीला प्यारी। श्याम-संग शोभा अति न्यारी॥

28

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

29

दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥

30

गिरिराज-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥

31

गोवर्धन-धाम की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥

32

भक्ति-प्रेम का बल बताते। शरणागत को पार लगाते॥

33

गिरिधर-स्वरूप तुम कल्याणी। ब्रज-रक्षक तुम सुख-दानी॥

34

जो जन गिरिराज गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

35

गिरिराज-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

36

सुख-समृद्धि घर में आवै। भक्ति-प्रेम-संतोष बढ़ावै॥

37

भय-संकट सब दूर हटावै। गिरिराज जो जन नित ध्यावै॥

38

भक्ति-मार्ग वह सहज वह पावै। गिरिराज-नाम जो जन गावै॥

39

प्रेम-सुख-शान्ति घर में लावै। भक्ति-श्रद्धा सब बढ़ावै॥

40

जय जय जय गिरिराज गोवर्धन। ब्रज-रक्षक तुम भव-भय-भंजन॥

गोवर्धन चालीसा सरल, पढ़े प्रेम मन लाय। भय-संकट सब दूर हो, गिरिराज-कृपा पाय॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, सुख-धाम श्याम का स्मरण कर मैं गिरिराज गोवर्धन की मनोहर चालीसा कहता हूँ।
  2. हे गिरिराज गोवर्धन स्वामी, आपकी जय हो; आप ब्रज के रक्षक व अन्तर्यामी हैं।
  3. जगत आपको कृष्ण-स्वरूप मानता है; सब जन आपको गिरिराज रूप में जानते हैं।
  4. श्रीकृष्ण ने अपने कर (हाथ) पर आपको उठाया और इन्द्र के कोप से ब्रज को बचाया।
  5. सात दिनों तक आप छत्र बने रहे और समस्त ब्रजवासियों ने आपकी शरण पाई।
  6. जब मूसलधार वृष्टि आई, तब गिरि के तले ब्रज को रक्षा मिली।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  8. गोवर्धन-धाम आपका सुहावना स्थान है; भक्तगण नित्य परिक्रमा करते हैं।
  9. सात कोस की भारी परिक्रमा भक्त श्रद्धापूर्वक लगाते हैं।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. अन्नकूट का पर्व सुहावना है; गिरिधर (गोवर्धन) को छप्पन भोग प्रिय लगते हैं।
  12. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  14. जो दूध-दही का भोग लगाते हैं, वे सब गिरिराज-कृपा पाते हैं।
  15. आप समस्त रोग-दोष दूर भगाते हैं और घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।
  16. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही गिरिराज-कृपा प्राप्त करता है।
  17. आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
  18. राधा-कृष्ण के संग आप विराजते हैं और ब्रज-धाम की शोभा सजाते हैं।
  19. जो श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  20. जो यह गोवर्धन चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
  21. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर गिरिराज जी की कृपा होती है।
  22. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।
  23. जिन पर गिरिराज जी की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  24. मानसी-गंगा निकट ही सुहावनी है; वहाँ भक्तगण पुण्य कमाते हैं।
  25. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर गिरिराज देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
  26. आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
  27. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  28. गौ-चारण की लीला प्यारी है; श्याम के संग आपकी शोभा अति अनुपम है।
  29. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  30. जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
  31. जो जन गिरिराज-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
  32. गोवर्धन-धाम की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
  33. आप भक्ति व प्रेम का बल बताते हैं और शरणागत को पार लगाते हैं।
  34. आप गिरिधर-स्वरूप कल्याणकारी हैं; ब्रज के रक्षक व सुख देने वाले हैं।
  35. जो जन गिरिराज जी के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  36. जो जन गिरिराज-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  37. घर में सुख-समृद्धि आती है और भक्ति, प्रेम व संतोष बढ़ता है।
  38. जो जन गिरिराज जी का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  39. जो जन गिरिराज-नाम गाता है, वह सहज ही भक्ति-मार्ग पा लेता है।
  40. घर में प्रेम, सुख व शांति आती है और भक्ति व श्रद्धा बढ़ती है।
  41. हे गिरिराज गोवर्धन, आपकी जय हो; आप ब्रज के रक्षक व भव-भय के नाशक हैं।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल गोवर्धन चालीसा पढ़ता है, उसके भय-संकट दूर होते हैं और गिरिराज की कृपा प्राप्त होती है।

लाभ

  • भय, विपत्ति व प्राकृतिक संकटों से रक्षा होती है।
  • श्रीकृष्ण-भक्ति व प्रेम में वृद्धि होती है।
  • घर में सुख-समृद्धि व अन्न-धन की बरकत बनी रहती है।
  • मन को शांति व शरणागति का भाव मिलता है।

कब करें पाठ

गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) पर · कार्तिक मास में · परिक्रमा व प्रातः पूजा के समय

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक गोवर्धन चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह

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