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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री गुरु नानक देव आरती
आरती
पाठ
1
गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने, तारिका मंडल जनक मोती। धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे, सगल बनराइ फूलंत जोती॥
2
कैसी आरती होइ, भव खंडना तेरी आरती। अनहता सबद वाजंत भेरी॥
3
सहस तव नैन, नन नैन हैं तोहि कउ, सहस मूरति नना एक तोही। सहस पद बिमल नन एक पद, गंध बिनु सहस तव गंध इव चलत मोही॥
4
सभ महि जोति जोति है सोइ, तिस कै चानणि सभ महि चानणु होइ। गुर साखी जोति परगटु होइ॥
5
गुरु नानक की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। नाम-ज्योति वह पावे, गुरु-कृपा पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- आकाश ही थाल है, सूर्य व चन्द्र उसमें दीपक हैं, तारों का समूह मानो मोती हैं; मलयाचल की पवन धूप है, वायु चँवर डुला रही है और समस्त वनस्पति पुष्प-रूप ज्योति अर्पित कर रही है।
- हे भव (जन्म-मरण) का नाश करने वाले! आपकी कैसी अद्भुत आरती हो रही है — अनहद नाद (अनाहत शब्द) ही नगाड़े-भेरी की भाँति बज रहा है।
- आपके सहस्र (अनंत) नेत्र हैं, फिर भी निराकार रूप में कोई नेत्र नहीं; आपके सहस्र रूप हैं, फिर भी आप एक ही हैं — यह विराट रहस्य मन को मोह लेता है।
- सबके भीतर वही एक ज्योति (परमात्मा) है, उसी के प्रकाश से सबमें प्रकाश है; गुरु के उपदेश (साक्षी) से ही वह ज्योति प्रकट होती है।
- जो भक्त श्रद्धा से गुरु नानक देव की यह आरती गाता है, वह नाम-ज्योति (आत्म-प्रकाश) तथा गुरु-कृपा प्राप्त करता है।
लाभ
- मन को शांति, ज्ञान-ज्योति व आत्म-बोध की प्राप्ति होती है।
- अहंकार दूर होकर समता व भक्ति का भाव जागता है।
- गुरु-कृपा व आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
कब करें पाठ
गुरु नानक जयंती (प्रकाश पर्व) पर · नित्य प्रातः व संध्या कीर्तन में · गुरुवार व पूर्णिमा को
स्रोत
रचयिता: गुरु नानक देव जी. गुरु ग्रंथ साहिब (गगन मै थालु — आरती)
