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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री हरिहर आरती

आरती

पाठ

1

जय हरिहर देवा, हरि-हर एक स्वरूपा। आधे विष्णु आधे शिव, अद्भुत तव रूपा॥

2

एक हाथ शंख-चक्र, एक त्रिशूल-डमरू। एक अंग पीताम्बर, एक भस्म-वसन गुरु॥

3

विष्णु-शिव में भेद नहिं, यह ज्ञान सिखाते। द्वैत-भाव को तजकर, अद्वैत दरसाते॥

4

पाप-ताप सब हरते, भय-संकट टारे। भक्तन को सुख देते, हरिहर प्यारे॥

5

हरिहर जी की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। भक्ति-मुक्ति वह पावे, सुख-शान्ति पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे हरिहर देव, हे हरि व हर के एक स्वरूप, आपकी जय हो! आधे अंग विष्णु व आधे शिव — आपका रूप अद्भुत है।
  2. एक हाथ में शंख-चक्र, दूसरे में त्रिशूल-डमरू; एक अंग पर पीताम्बर तो दूसरे पर भस्म व वल्कल — ऐसे गुरुस्वरूप।
  3. विष्णु व शिव में कोई भेद नहीं — यह ज्ञान आप सिखाते हैं; द्वैत-भाव त्यागकर आप अद्वैत (एकता) का दर्शन कराते हैं।
  4. आप समस्त पाप-ताप हरते हैं और भय-संकट दूर करते हैं; हे प्यारे हरिहर, आप भक्तों को सुख देते हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से हरिहर जी की यह आरती गाता है, वह भक्ति-मुक्ति तथा सुख-शांति प्राप्त करता है।

लाभ

  • विष्णु व शिव दोनों की एक साथ कृपा प्राप्त होती है।
  • भय, पाप व संकट का नाश होकर मन को शांति मिलती है।
  • द्वैत-भाव मिटकर भक्ति व आध्यात्मिक एकता का बोध होता है।

कब करें पाठ

एकादशी व प्रदोष काल में · हरिहर-क्षेत्र दर्शन के समय · नित्य प्रातः व संध्या में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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