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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री जगन्नाथ आरती

आरती · श्री कृष्ण

पाठ

1

जय जगदीश जगन्नाथ, जय जय जगन्नाथा। बलभद्र सुभद्रा संग, पुरी-धाम विराजा॥

2

नील-माधव रूप मनोहर, बड़े-बड़े नैना। दारु-विग्रह अद्भुत, मधुर तुम्हारी बैना॥

3

रथ पर होकर सवार, नगर भ्रमण करते। भक्तन को दर्शन देकर, सब दुख हर लेते॥

4

जगत के नाथ कहाओ, सबके हो रखवारे। शरण पड़े की रक्षा, करते प्रभु प्यारे॥

5

जगन्नाथ जी की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। भक्ति-मुक्ति वह पावे, सब सुख घर आवे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे जगदीश जगन्नाथ, आपकी जय हो! आप भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा के संग पुरी धाम में विराजमान हैं।
  2. नील-माधव का मनोहर रूप, बड़े-बड़े नेत्र वाले; दारु (काष्ठ) की अद्भुत मूर्ति वाले — आपकी वाणी अति मधुर है।
  3. रथ पर सवार होकर आप नगर का भ्रमण करते हैं; भक्तों को दर्शन देकर उनके समस्त दुःख हर लेते हैं।
  4. आप जगत के नाथ कहलाते हैं और सबके रक्षक हैं; हे प्यारे प्रभु, आप शरण में आए हुए जनों की रक्षा करते हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से जगन्नाथ जी की यह आरती गाता है, वह भक्ति व मुक्ति पाता है और उसके घर में सब सुख आते हैं।

लाभ

  • भक्ति, सुख-शांति व मन की प्रसन्नता बढ़ती है।
  • भय व संकट दूर होकर रक्षा मिलती है।
  • मनोकामना पूर्ण होकर मोक्ष-मार्ग प्रशस्त होता है।

कब करें पाठ

रथ यात्रा (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) पर · एकादशी व नित्य संध्या में · गुरुवार को

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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