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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री झूलेलाल आरती
आरती
पाठ
ॐ जय दूलह देवा, साईं जय दूलह देवा। पूजा कनि था प्रेमी, सिदुक रखी सेवा॥
1
तुहिंजे दर दे केई, सजण अचनि सवाली। दान वठन सभु दिलि, सां कोन दिठुभ खाली॥
2
अंधड़नि खे दिनव, अखडियूँ – दुखियनि खे दारुं। पाए मन जूं मुरादूं, सेवक कनि थारू॥
3
फल फूलमेवा सब्जिऊ, पोखनि मंझि पचिन। तुहिजे महिर मयासा अन्न, बि आपर अपार थियनी॥
4
ज्योति जगे थी जगु में, लाल तुहिंजी लाली। अमरलाल अचु मूं वटी, हे विश्व संदा वाली॥
5
जगु जा जीव सभेई, पाणिअ बिन प्यास। जेठानंद आनंद कर, पूरन करियो आशा॥
अर्थ (हिन्दी)
- (टेक — भावार्थ) हे दूल्हे-से सजे देव, हे साईं, आपकी जय हो! प्रेमी भक्त सच्ची श्रद्धा (सिदुक) रखकर आपकी पूजा और सेवा करते हैं।
- (भावार्थ) आपके दर पर अनेक सज्जन याचक बनकर आते हैं; सब मन से दान पाते हैं — किसी को खाली हाथ नहीं देखा।
- (भावार्थ) आपने अंधों को आँखें दीं और दुखियों को दवा; मन की मुरादें पाकर सेवक (आपका) गुणगान करते हैं।
- (भावार्थ) फल, फूल, मेवा और सब्ज़ियाँ खेतों में पकती हैं; आपकी मेहर से अन्न भी अपार हो जाता है।
- (भावार्थ) हे लाल, जगत में आपकी ज्योति जगती है, आपकी ही लाली है; हे अमरलाल, हे विश्व के रक्षक, मेरे पास आइए।
- (भावार्थ) जगत के सब जीव पानी के बिना प्यासे हैं; जेठानंद (कहते हैं) — आनंद कीजिए और आशा पूरी कीजिए।
लाभ
- चेटीचंड की पूजा का समापन।
- मनोकामना-पूर्ति का भाव — "पाए मन जूं मुरादूं"।
- अन्न और जल की समृद्धि की प्रार्थना (पद 3, 5)।
कब करें पाठ
चेटीचंड पर · संध्या पूजा में
स्रोत
रचयिता: जेठानंद (अंतिम पद की छाप). hindunidhi.com — श्री झूलेलाल आरती (आधार-पाठ) · knowledgegallery.in — श्री झूलेलाल जी की आरती
