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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री ज्वाला जी आरती

आरती · माँ दुर्गा

पाठ

1

जय ज्वाला माता, ज्योति-स्वरूपा। बिन बाती बिन तेल जले, अद्भुत तव रूपा॥

2

नौ ज्योतियाँ प्रकटीं, शाश्वत अग्नि-धारा। सती-जिह्वा जहँ गिरी, शक्तिपीठ प्यारा॥

3

अकबर का मद तोड़ा, ज्योति न बुझ पाई। भक्तन की रक्षक तू, महिमा अधिकाई॥

4

मनोकामना पूरण, भय-संकट हरती। शरण पड़े की रक्षा, हे जग की महतारी॥

5

ज्वाला जी आरती, जो जन श्रद्धा गावे। भय-संकट सब मिटते, मनवांछित पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे ज्वाला माता, हे ज्योति-स्वरूपा, आपकी जय हो! बिना बाती व बिना तेल के जलने वाली आपकी छवि अद्भुत है।
  2. नौ शाश्वत ज्योतियाँ (अग्नि-धारा) स्वयं प्रकट हुईं; जहाँ सती की जिह्वा गिरी वह प्रिय शक्तिपीठ है।
  3. (आपने) अकबर का अहंकार तोड़ा — आपकी ज्योति कभी बुझ न सकी; आप भक्तों की रक्षक हैं और आपकी महिमा अपार है।
  4. आप मनोकामना पूर्ण करती हैं और भय-संकट हरती हैं; हे जगत की माता, शरण में आए जनों की रक्षा करती हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से ज्वाला जी की यह आरती गाता है, उसके समस्त भय-संकट मिट जाते हैं और वह मनोवांछित फल पाता है।

लाभ

  • भय, संकट व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
  • श्रद्धा से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
  • भक्ति, शक्ति व सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

कब करें पाठ

नवरात्रि में · मंगलवार व शुक्रवार को · प्रातः व संध्या पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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