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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री संत कबीर आरती

आरती

पाठ

1

जय जय सद्गुरु कबीर, साहिब अविनाशी। निर्गुण नाम सिखाया, हरि-चरण निवासी॥

2

आडम्बर सब त्यागा, सच्चा मारग दीन्हा। जाति-पाँति को तजकर, प्रेम-धरम कीन्हा॥

3

साखी-सबद सुनाए, अज्ञान मिटाया। घट-घट राम बसे हैं, यह ज्ञान जगाया॥

4

सहज समाधि सिखाई, माया से तारा। भक्तन के मन-मंदिर, बसे कबीर प्यारा॥

5

कबीर साहिब आरती, जो जन श्रद्धा गावे। ज्ञान-भक्ति वह पावे, सहज शान्ति पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे सद्गुरु कबीर साहिब, हे अविनाशी, आपकी जय हो! आपने निर्गुण (निराकार) नाम सिखाया और आप हरि-चरणों में निवास करते हैं।
  2. आपने समस्त आडम्बर त्यागकर सच्चा मार्ग दिखाया; जाति-पाँति का भेद त्यागकर प्रेम के धर्म को अपनाया।
  3. आपने साखी व सबद (दोहे-पद) सुनाकर अज्ञान मिटाया; "घट-घट (हर हृदय) में राम बसते हैं" — यह ज्ञान जगाया।
  4. आपने सहज समाधि सिखाई और माया से तारा; हे प्यारे कबीर, आप भक्तों के मन-मंदिर में निवास करते हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से कबीर साहिब की यह आरती गाता है, वह ज्ञान-भक्ति तथा सहज शांति प्राप्त करता है।

लाभ

  • मन को सहज शांति व आत्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है।
  • आडम्बर व भेदभाव से ऊपर उठकर समता का भाव आता है।
  • भक्ति, विवेक व सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

कब करें पाठ

कबीर जयंती (ज्येष्ठ पूर्णिमा) पर · नित्य संध्या व सत्संग में · पूर्णिमा को

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक संत आरती संग्रह

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