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॥ श्री ॥

श्री संत कबीर चालीसा

चालीसा

पाठ

गणपति-गुरु-पद वंदना, सुमिर हृदय धरि ध्यान। संत कबीर की करूँ, चालीसा गुणगान॥

1

जय जय संत कबीर ज्ञानी। सत्य-प्रेम के तुम वरदानी॥

2

काशी-नगरी कर्म तुम्हारा। संत-शिरोमणि जग-उजियारा॥

3

जुलाहे-कुल में रहे समाये। श्रम-भक्ति को साथ निभाये॥

4

साखी-दोहे जग को सुनाये। जीवन का सच मर्म बताये॥

5

पाखंड-आडंबर सब त्यागा। प्रेम-भक्ति का दीपक जागा॥

6

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

7

दीन-दुखी के तुम रखवारे। भक्त-गण नित तुम्हें पुकारे॥

8

हिन्दू-मुस्लिम भेद मिटाया। एक राम का मर्म बताया॥

9

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

10

कबीर जयंती भक्त मनावें। ज्येष्ठ-पूर्णिमा शीश नवावें॥

11

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥

12

जो जन तुमको शीश नवावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

13

सत्संग-कीर्तन भक्त सजावैं। श्रद्धा से गुरु को रिझावैं॥

14

रोग-दोष सब दूर भगाते। सुख-शान्ति घर में लाते॥

15

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। कबीर-कृपा वह पावै॥

16

मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥

17

मगहर में जब देह तजाई। हिन्दू-मुस्लिम भ्रम मिटाई॥

18

जो श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

19

जो यह कबीर चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥

20

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा कबीर की होई॥

21

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। सुख-शान्ति घर में लावैं॥

22

कबीर-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

23

सद्गुरु-महिमा खूब बताई। नाम-भक्ति की राह दिखाई॥

24

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत कबीर देवा॥

25

संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

26

महिमा तुम्हरी अति अपारा। जन-जन गाता जयकारा॥

27

बीजक-बानी जग को भाई। भक्ति-ज्ञान की ज्योति जगाई॥

28

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

29

दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥

30

कबीर-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥

31

काशी-मगहर महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥

32

सत्य-नाम का मार्ग दिखाते। शरणागत को पार लगाते॥

33

दीन-रक्षक तुम कल्याणी। भव-तारण तुम सुख-दानी॥

34

जो जन कबीर गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

35

कबीर-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

36

सुख-शान्ति-भक्ति घर में आवै। ज्ञान-श्रद्धा-संतोष बढ़ावै॥

37

भय-संकट सब दूर हटावै। कबीर जो जन नित ध्यावै॥

38

सत्य-मार्ग वह सहज वह पावै। कबीर-नाम जो जन गावै॥

39

ज्ञान-सुख-शान्ति घर में लावै। भक्ति-श्रद्धा सब बढ़ावै॥

40

जय जय जय संत कबीरा। रक्षा करो प्रभु हर पीरा॥

कबीर चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। भय-संकट सब दूर हो, संत-कृपा बरसाय॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं संत कबीर की चालीसा का गुणगान करता हूँ।
  2. हे ज्ञानी संत कबीर, आपकी जय-जय हो; आप सत्य व प्रेम के वरदानी हैं।
  3. काशी-नगरी आपकी कर्म-स्थली रही; आप संत-शिरोमणि व जगत के उजियारे हैं।
  4. आप जुलाहे-कुल में रहे और श्रम व भक्ति को साथ निभाया।
  5. आपने साखी व दोहे जगत को सुनाए और जीवन का सच्चा मर्म बताया।
  6. आपने सब पाखंड व आडंबर त्यागा और प्रेम-भक्ति का दीपक जगाया।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  8. आप दीन-दुखियों के रक्षक हैं; भक्तगण नित्य आपको पुकारते हैं।
  9. आपने हिन्दू-मुस्लिम भेद मिटाया और एक राम (एक ईश्वर) का मर्म बताया।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. भक्त कबीर जयंती मनाते हैं और ज्येष्ठ-पूर्णिमा पर शीश नवाते हैं।
  12. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  14. भक्त सत्संग-कीर्तन सजाते हैं और श्रद्धा से गुरु को रिझाते हैं।
  15. आप समस्त रोग-दोष दूर भगाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।
  16. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह कबीर-कृपा प्राप्त करता है।
  17. आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
  18. मगहर में जब आपने देह त्यागी, तब हिन्दू-मुस्लिम का भ्रम (पुष्प-रूप कथा से) मिटाया।
  19. जो श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  20. जो यह कबीर चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
  21. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर संत कबीर की कृपा होती है।
  22. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।
  23. जिन पर संत कबीर की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  24. आपने सद्गुरु की महिमा खूब बताई और नाम-भक्ति की राह दिखाई।
  25. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर संत कबीर तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
  26. आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
  27. आपकी महिमा अति अपार है; जन-जन आपका जयकारा गाता है।
  28. आपकी "बीजक" बानी जगत को प्रिय लगी; आपने भक्ति व ज्ञान की ज्योति जगाई।
  29. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  30. जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
  31. जो जन कबीर-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
  32. काशी व मगहर से जुड़ी आपकी महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
  33. आप सत्य-नाम का मार्ग दिखाते हैं और शरणागत को पार लगाते हैं।
  34. आप दीनों के रक्षक व कल्याणकारी हैं; भव-तारण व सुख देने वाले हैं।
  35. जो जन संत कबीर के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  36. जो जन कबीर-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  37. घर में सुख, शांति व भक्ति आती है और ज्ञान, श्रद्धा व संतोष बढ़ता है।
  38. जो जन संत कबीर का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  39. जो जन कबीर-नाम गाता है, वह सहज ही सत्य-मार्ग पा लेता है।
  40. घर में ज्ञान, सुख व शांति आती है और भक्ति व श्रद्धा बढ़ती है।
  41. हे संत कबीर, आपकी जय हो; हे प्रभु, शरण में आए हम सबकी रक्षा कर हर पीड़ा हरिए।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल कबीर चालीसा पढ़ता है, उसके भय-संकट दूर होते हैं और संत की कृपा बरसती है।

लाभ

  • मन को शांति, सत्य व सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
  • भय, संकट व अहंकार-पाखंड से मुक्ति मिलती है।
  • सच्ची भक्ति, ज्ञान व समता का भाव बढ़ता है।
  • घर में सुख-शांति व संत-कृपा बनी रहती है।

कब करें पाठ

कबीर जयंती (ज्येष्ठ पूर्णिमा) पर · रविवार को · सत्संग व नित्य पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक कबीर चालीसा · संत कबीर भक्ति-परंपरा (बीजक)

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