श्री संत कबीर चालीसा
śrī saṃta kabīra cālīsā
Sant Kabir Das Chalisa
परिचय
स्रोत: संत कबीरदास; कर्म-स्थली काशी (वाराणसी), समाधि मगहर
संपूर्ण चालीसा
गणपति-गुरु-पद वंदना, सुमिर हृदय धरि ध्यान। संत कबीर की करूँ, चालीसा गुणगान॥
गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं संत कबीर की चालीसा का गुणगान करता हूँ।
जय जय संत कबीर ज्ञानी। सत्य-प्रेम के तुम वरदानी॥
हे ज्ञानी संत कबीर, आपकी जय-जय हो; आप सत्य व प्रेम के वरदानी हैं।
काशी-नगरी कर्म तुम्हारा। संत-शिरोमणि जग-उजियारा॥
काशी-नगरी आपकी कर्म-स्थली रही; आप संत-शिरोमणि व जगत के उजियारे हैं।
जुलाहे-कुल में रहे समाये। श्रम-भक्ति को साथ निभाये॥
आप जुलाहे-कुल में रहे और श्रम व भक्ति को साथ निभाया।
साखी-दोहे जग को सुनाये। जीवन का सच मर्म बताये॥
आपने साखी व दोहे जगत को सुनाए और जीवन का सच्चा मर्म बताया।
पाखंड-आडंबर सब त्यागा। प्रेम-भक्ति का दीपक जागा॥
आपने सब पाखंड व आडंबर त्यागा और प्रेम-भक्ति का दीपक जगाया।
जो जन तुमको नित ही ध्यावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥
जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
दीन-दुखी के तुम रखवारे। भक्त-गण नित तुम्हें पुकारे॥
आप दीन-दुखियों के रक्षक हैं; भक्तगण नित्य आपको पुकारते हैं।
हिन्दू-मुस्लिम भेद मिटाया। एक राम का मर्म बताया॥
आपने हिन्दू-मुस्लिम भेद मिटाया और एक राम (एक ईश्वर) का मर्म बताया।
जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥
जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
कबीर जयंती भक्त मनावें। ज्येष्ठ-पूर्णिमा शीश नवावें॥
भक्त कबीर जयंती मनाते हैं और ज्येष्ठ-पूर्णिमा पर शीश नवाते हैं।
दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥
आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
जो जन तुमको शीश नवावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥
जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
सत्संग-कीर्तन भक्त सजावैं। श्रद्धा से गुरु को रिझावैं॥
भक्त सत्संग-कीर्तन सजाते हैं और श्रद्धा से गुरु को रिझाते हैं।
रोग-दोष सब दूर भगाते। सुख-शान्ति घर में लाते॥
आप समस्त रोग-दोष दूर भगाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।
जो नर निशदिन ध्यान लगावै। कबीर-कृपा वह पावै॥
जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह कबीर-कृपा प्राप्त करता है।
मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥
आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
मगहर में जब देह तजाई। हिन्दू-मुस्लिम भ्रम मिटाई॥
मगहर में जब आपने देह त्यागी, तब हिन्दू-मुस्लिम का भ्रम (पुष्प-रूप कथा से) मिटाया।
जो श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥
जो श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
जो यह कबीर चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥
जो यह कबीर चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा कबीर की होई॥
जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर संत कबीर की कृपा होती है।
मन-इच्छित फल सब जन पावैं। सुख-शान्ति घर में लावैं॥
सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।
कबीर-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥
जिन पर संत कबीर की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
सद्गुरु-महिमा खूब बताई। नाम-भक्ति की राह दिखाई॥
आपने सद्गुरु की महिमा खूब बताई और नाम-भक्ति की राह दिखाई।
जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत कबीर देवा॥
जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर संत कबीर तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥
आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
महिमा तुम्हरी अति अपारा। जन-जन गाता जयकारा॥
आपकी महिमा अति अपार है; जन-जन आपका जयकारा गाता है।
बीजक-बानी जग को भाई। भक्ति-ज्ञान की ज्योति जगाई॥
आपकी "बीजक" बानी जगत को प्रिय लगी; आपने भक्ति व ज्ञान की ज्योति जगाई।
घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥
घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥
जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
कबीर-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥
जो जन कबीर-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
काशी-मगहर महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥
काशी व मगहर से जुड़ी आपकी महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
सत्य-नाम का मार्ग दिखाते। शरणागत को पार लगाते॥
आप सत्य-नाम का मार्ग दिखाते हैं और शरणागत को पार लगाते हैं।
दीन-रक्षक तुम कल्याणी। भव-तारण तुम सुख-दानी॥
आप दीनों के रक्षक व कल्याणकारी हैं; भव-तारण व सुख देने वाले हैं।
जो जन कबीर गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥
जो जन संत कबीर के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
कबीर-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥
जो जन कबीर-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
सुख-शान्ति-भक्ति घर में आवै। ज्ञान-श्रद्धा-संतोष बढ़ावै॥
घर में सुख, शांति व भक्ति आती है और ज्ञान, श्रद्धा व संतोष बढ़ता है।
भय-संकट सब दूर हटावै। कबीर जो जन नित ध्यावै॥
जो जन संत कबीर का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
सत्य-मार्ग वह सहज वह पावै। कबीर-नाम जो जन गावै॥
जो जन कबीर-नाम गाता है, वह सहज ही सत्य-मार्ग पा लेता है।
ज्ञान-सुख-शान्ति घर में लावै। भक्ति-श्रद्धा सब बढ़ावै॥
घर में ज्ञान, सुख व शांति आती है और भक्ति व श्रद्धा बढ़ती है।
जय जय जय संत कबीरा। रक्षा करो प्रभु हर पीरा॥
हे संत कबीर, आपकी जय हो; हे प्रभु, शरण में आए हम सबकी रक्षा कर हर पीड़ा हरिए।
कबीर चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। भय-संकट सब दूर हो, संत-कृपा बरसाय॥
जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल कबीर चालीसा पढ़ता है, उसके भय-संकट दूर होते हैं और संत की कृपा बरसती है।
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अर्थ (हिन्दी)
- गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं संत कबीर की चालीसा का गुणगान करता हूँ।
- हे ज्ञानी संत कबीर, आपकी जय-जय हो; आप सत्य व प्रेम के वरदानी हैं।
- काशी-नगरी आपकी कर्म-स्थली रही; आप संत-शिरोमणि व जगत के उजियारे हैं।
- आप जुलाहे-कुल में रहे और श्रम व भक्ति को साथ निभाया।
- आपने साखी व दोहे जगत को सुनाए और जीवन का सच्चा मर्म बताया।
- आपने सब पाखंड व आडंबर त्यागा और प्रेम-भक्ति का दीपक जगाया।
- जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
- आप दीन-दुखियों के रक्षक हैं; भक्तगण नित्य आपको पुकारते हैं।
- आपने हिन्दू-मुस्लिम भेद मिटाया और एक राम (एक ईश्वर) का मर्म बताया।
- जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
- भक्त कबीर जयंती मनाते हैं और ज्येष्ठ-पूर्णिमा पर शीश नवाते हैं।
- आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
- जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
- भक्त सत्संग-कीर्तन सजाते हैं और श्रद्धा से गुरु को रिझाते हैं।
- आप समस्त रोग-दोष दूर भगाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।
- जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह कबीर-कृपा प्राप्त करता है।
- आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
- मगहर में जब आपने देह त्यागी, तब हिन्दू-मुस्लिम का भ्रम (पुष्प-रूप कथा से) मिटाया।
- जो श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
- जो यह कबीर चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
- जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर संत कबीर की कृपा होती है।
- सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।
- जिन पर संत कबीर की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
- आपने सद्गुरु की महिमा खूब बताई और नाम-भक्ति की राह दिखाई।
- जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर संत कबीर तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
- आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
- आपकी महिमा अति अपार है; जन-जन आपका जयकारा गाता है।
- आपकी "बीजक" बानी जगत को प्रिय लगी; आपने भक्ति व ज्ञान की ज्योति जगाई।
- घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
- जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
- जो जन कबीर-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
- काशी व मगहर से जुड़ी आपकी महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
- आप सत्य-नाम का मार्ग दिखाते हैं और शरणागत को पार लगाते हैं।
- आप दीनों के रक्षक व कल्याणकारी हैं; भव-तारण व सुख देने वाले हैं।
- जो जन संत कबीर के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
- जो जन कबीर-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
- घर में सुख, शांति व भक्ति आती है और ज्ञान, श्रद्धा व संतोष बढ़ता है।
- जो जन संत कबीर का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
- जो जन कबीर-नाम गाता है, वह सहज ही सत्य-मार्ग पा लेता है।
- घर में ज्ञान, सुख व शांति आती है और भक्ति व श्रद्धा बढ़ती है।
- हे संत कबीर, आपकी जय हो; हे प्रभु, शरण में आए हम सबकी रक्षा कर हर पीड़ा हरिए।
- जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल कबीर चालीसा पढ़ता है, उसके भय-संकट दूर होते हैं और संत की कृपा बरसती है।
लाभ
- मन को शांति, सत्य व सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
- भय, संकट व अहंकार-पाखंड से मुक्ति मिलती है।
- सच्ची भक्ति, ज्ञान व समता का भाव बढ़ता है।
- घर में सुख-शांति व संत-कृपा बनी रहती है।
कब करें पाठ
पाठ विधि
संत कबीरदास के चित्र के समक्ष श्रद्धापूर्वक दीप-पुष्प अर्पित करें और उनके दोहों-साखियों का स्मरण करते हुए चालीसा का पाठ करें। कबीर जयंती व सत्संग में पाठ का विशेष महत्व है।
