श्री काली चालीसा
पाठ
जय जय सीताराम के, अनुपम भक्त उदार। काली माँ की वंदना, करूँ हृदय सुधार॥
जय काली कलकत्ते वाली। दुष्ट-दलन भक्तन प्रतिपाली॥
श्याम-वरण तन अति छवि भारी। खड्ग-खप्पर कर में धारी॥
मुण्डमाल गल शोभा पावै। रूप निरख भक्तन मन भावै॥
रक्तबीज का नाश कराया। चण्ड-मुण्ड को क्षण में मिटाया॥
शुम्भ-निशुम्भ संहार किया तुम। देवन का भय दूर किया तुम॥
महिषासुर मर्दिनि कहलाई। जग की रक्षक तुम मात आई॥
सिंह-वाहिनी शोभा पावै। भक्त-गण नित दरस को धावै॥
दश-महाविद्या में तुम प्रथमा। आदिशक्ति तुम परम-महिमा॥
जो जन तुमको नित ही ध्यावै। भूत-प्रेत बाधा मिट जावै॥
शत्रु-संकट सब टारन हारी। भक्तन की तुम सदा रखवारी॥
दक्षिणेश्वर में धाम तुम्हारा। रामकृष्ण ने तुम्हें पुकारा॥
तंत्र-मंत्र की बाधा टारो। नजर-टोना सब संहारो॥
भय-निवारण नाम तुम्हारा। जो सुमिरे सो उतरे पारा॥
अमावस की रात पूजन कीजै। मन-वांछित वर माँ से लीजै॥
लाल पुष्प जो माँ को भावै। भोग लगाकर भक्त मनावै॥
ता पर माँ प्रसन्न हो जावैं। मनवांछित फल तुरत दिलावैं॥
काल-भय से तुम रखवाली। जगदम्बा तुम कलियुग वाली॥
जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥
साहस-बल तुम भक्तन देती। निर्भयता का वर तुम देती॥
दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करती बेड़ा पारा॥
जो जन तुमको शीश नवावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥
रोग-दोष सब दूर भगाती। सुख-समृद्धि घर में लाती॥
दुर्गा-स्वरूपा तुम महामाया। त्रिभुवन में फैली तव छाया॥
जो नर निशदिन ध्यान लगावै। काली-कृपा सहज वह पावै॥
भूत-पिशाच निकट नहिं आवैं। जहँ काली-नाम सुनावैं॥
मंगल-कारी विघ्न-विनाशिनि। भय-हारिणि तुम सुख-प्रदायिनि॥
जो श्रद्धा से भोग चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥
जो यह काली चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥
नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा काली की होई॥
मन-इच्छित फल सब जन पावैं। सुख-समृद्धि घर में लावैं॥
रात्रि-काल जो पाठ करावै। भय-बाधा सब दूर भगावै॥
काली-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥
नवरात्रि में पूजन कीजै। अष्टमी-नवमी हवन कीजै॥
कन्या-पूजन जो जन करते। माँ की कृपा से सुख वे भरते॥
महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥
जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत काली देवा॥
संकट-मोचनि नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥
काली-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥
जो जन काली गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥
जय जय जय काली भयहारी। रक्षा करो माँ शरण हमारी॥
काली चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। भय-संकट सब दूर हो, माँ की कृपा बरसाय॥
अर्थ (हिन्दी)
- सीताराम के अनुपम उदार भक्तों को नमन; हृदय शुद्ध कर मैं माँ काली की वंदना करता हूँ।
- हे कलकत्ते वाली काली, आपकी जय हो; आप दुष्टों का दमन व भक्तों का पालन करती हैं।
- श्याम वर्ण शरीर की अति शोभा है; हाथों में खड्ग व खप्पर धारण किए हैं।
- गले में मुण्डमाला शोभा पाती है; आपका रूप निरखकर भक्तों का मन प्रसन्न होता है।
- आपने रक्तबीज का नाश किया और चण्ड-मुण्ड को क्षण भर में मिटा दिया।
- आपने शुम्भ-निशुम्भ का संहार किया और देवताओं का भय दूर किया।
- आप महिषासुर-मर्दिनी कहलाईं; हे माता, आप जगत की रक्षक बनकर आईं।
- सिंह पर सवार होकर आप शोभा पाती हैं; भक्तगण नित्य दर्शन को दौड़े आते हैं।
- दस महाविद्याओं में आप प्रथमा हैं; आप आदिशक्ति व परम-महिमामयी हैं।
- जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, उसकी भूत-प्रेत बाधा मिट जाती है।
- आप शत्रु व संकट सब दूर करने वाली हैं; आप सदा भक्तों की रक्षक हैं।
- दक्षिणेश्वर में आपका धाम है; (संत) रामकृष्ण परमहंस ने आपको ही पुकारा।
- आप तंत्र-मंत्र की बाधा दूर करती हैं और नजर-टोना आदि का नाश करती हैं।
- आपका नाम भय का निवारण करने वाला है; जो स्मरण करता है, वह भवसागर से पार उतर जाता है।
- अमावस्या की रात्रि को पूजन कीजिए और माँ से मन-वांछित वर प्राप्त कीजिए।
- माँ को लाल पुष्प प्रिय हैं; भोग लगाकर भक्त उन्हें मनाते हैं।
- उस पर माँ प्रसन्न हो जाती हैं और तुरंत मनोवांछित फल दिलाती हैं।
- आप काल के भय से रक्षा करती हैं; हे जगदम्बा, आप कलियुग में शीघ्र फलदायिनी हैं।
- जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
- आप भक्तों को साहस व बल देती हैं और निर्भयता का वरदान देती हैं।
- आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देती हैं।
- जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
- आप समस्त रोग-दोष दूर भगाती हैं और घर में सुख-समृद्धि लाती हैं।
- आप दुर्गा-स्वरूपा महामाया हैं; आपकी छाया तीनों लोकों में फैली है।
- जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही काली-कृपा प्राप्त करता है।
- जहाँ काली-नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत-पिशाच निकट नहीं आते।
- आप मंगलकारी व विघ्नों की विनाशिनी हैं; भय हरकर सुख प्रदान करती हैं।
- जो श्रद्धा से भोग चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
- जो यह काली चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
- जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर माँ काली की कृपा होती है।
- सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।
- जो रात्रि-काल में पाठ करता है, वह भय व बाधा सब दूर भगा देता है।
- जिन पर माँ काली की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
- नवरात्रि में पूजन कीजिए तथा अष्टमी-नवमी को हवन कीजिए।
- जो जन कन्या-पूजन करते हैं, वे माँ की कृपा से सुख से भर जाते हैं।
- आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
- जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर माँ काली तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं।
- आपका नाम संकट-मोचनी है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करती हैं।
- जो जन काली-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
- जो जन माँ काली के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
- हे भय हरने वाली काली, आपकी जय हो; हे माँ, शरण में आए हम सबकी रक्षा कीजिए।
- जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल काली चालीसा पढ़ता है, उसके भय-संकट दूर होते हैं और माँ की कृपा बरसती है।
लाभ
- भय, शत्रु व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
- भूत-प्रेत, तंत्र-बाधा व नजर-दोष का नाश होता है।
- संकट व विपत्ति का शीघ्र नाश होता है।
- साहस, शक्ति व निर्भयता में वृद्धि होती है।
कब करें पाठ
मंगलवार व अमावस्या को · नवरात्रि व काली पूजा (दीपावली) पर · रात्रि व संध्या पूजा में
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक काली चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह
