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॥ श्री ॥

श्री काली चालीसा

चालीसा · माँ दुर्गा

पाठ

जय जय सीताराम के, अनुपम भक्त उदार। काली माँ की वंदना, करूँ हृदय सुधार॥

1

जय काली कलकत्ते वाली। दुष्ट-दलन भक्तन प्रतिपाली॥

2

श्याम-वरण तन अति छवि भारी। खड्ग-खप्पर कर में धारी॥

3

मुण्डमाल गल शोभा पावै। रूप निरख भक्तन मन भावै॥

4

रक्तबीज का नाश कराया। चण्ड-मुण्ड को क्षण में मिटाया॥

5

शुम्भ-निशुम्भ संहार किया तुम। देवन का भय दूर किया तुम॥

6

महिषासुर मर्दिनि कहलाई। जग की रक्षक तुम मात आई॥

7

सिंह-वाहिनी शोभा पावै। भक्त-गण नित दरस को धावै॥

8

दश-महाविद्या में तुम प्रथमा। आदिशक्ति तुम परम-महिमा॥

9

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। भूत-प्रेत बाधा मिट जावै॥

10

शत्रु-संकट सब टारन हारी। भक्तन की तुम सदा रखवारी॥

11

दक्षिणेश्वर में धाम तुम्हारा। रामकृष्ण ने तुम्हें पुकारा॥

12

तंत्र-मंत्र की बाधा टारो। नजर-टोना सब संहारो॥

13

भय-निवारण नाम तुम्हारा। जो सुमिरे सो उतरे पारा॥

14

अमावस की रात पूजन कीजै। मन-वांछित वर माँ से लीजै॥

15

लाल पुष्प जो माँ को भावै। भोग लगाकर भक्त मनावै॥

16

ता पर माँ प्रसन्न हो जावैं। मनवांछित फल तुरत दिलावैं॥

17

काल-भय से तुम रखवाली। जगदम्बा तुम कलियुग वाली॥

18

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

19

साहस-बल तुम भक्तन देती। निर्भयता का वर तुम देती॥

20

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करती बेड़ा पारा॥

21

जो जन तुमको शीश नवावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

22

रोग-दोष सब दूर भगाती। सुख-समृद्धि घर में लाती॥

23

दुर्गा-स्वरूपा तुम महामाया। त्रिभुवन में फैली तव छाया॥

24

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। काली-कृपा सहज वह पावै॥

25

भूत-पिशाच निकट नहिं आवैं। जहँ काली-नाम सुनावैं॥

26

मंगल-कारी विघ्न-विनाशिनि। भय-हारिणि तुम सुख-प्रदायिनि॥

27

जो श्रद्धा से भोग चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

28

जो यह काली चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥

29

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा काली की होई॥

30

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। सुख-समृद्धि घर में लावैं॥

31

रात्रि-काल जो पाठ करावै। भय-बाधा सब दूर भगावै॥

32

काली-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

33

नवरात्रि में पूजन कीजै। अष्टमी-नवमी हवन कीजै॥

34

कन्या-पूजन जो जन करते। माँ की कृपा से सुख वे भरते॥

35

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

36

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत काली देवा॥

37

संकट-मोचनि नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

38

काली-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

39

जो जन काली गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

40

जय जय जय काली भयहारी। रक्षा करो माँ शरण हमारी॥

काली चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। भय-संकट सब दूर हो, माँ की कृपा बरसाय॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. सीताराम के अनुपम उदार भक्तों को नमन; हृदय शुद्ध कर मैं माँ काली की वंदना करता हूँ।
  2. हे कलकत्ते वाली काली, आपकी जय हो; आप दुष्टों का दमन व भक्तों का पालन करती हैं।
  3. श्याम वर्ण शरीर की अति शोभा है; हाथों में खड्ग व खप्पर धारण किए हैं।
  4. गले में मुण्डमाला शोभा पाती है; आपका रूप निरखकर भक्तों का मन प्रसन्न होता है।
  5. आपने रक्तबीज का नाश किया और चण्ड-मुण्ड को क्षण भर में मिटा दिया।
  6. आपने शुम्भ-निशुम्भ का संहार किया और देवताओं का भय दूर किया।
  7. आप महिषासुर-मर्दिनी कहलाईं; हे माता, आप जगत की रक्षक बनकर आईं।
  8. सिंह पर सवार होकर आप शोभा पाती हैं; भक्तगण नित्य दर्शन को दौड़े आते हैं।
  9. दस महाविद्याओं में आप प्रथमा हैं; आप आदिशक्ति व परम-महिमामयी हैं।
  10. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, उसकी भूत-प्रेत बाधा मिट जाती है।
  11. आप शत्रु व संकट सब दूर करने वाली हैं; आप सदा भक्तों की रक्षक हैं।
  12. दक्षिणेश्वर में आपका धाम है; (संत) रामकृष्ण परमहंस ने आपको ही पुकारा।
  13. आप तंत्र-मंत्र की बाधा दूर करती हैं और नजर-टोना आदि का नाश करती हैं।
  14. आपका नाम भय का निवारण करने वाला है; जो स्मरण करता है, वह भवसागर से पार उतर जाता है।
  15. अमावस्या की रात्रि को पूजन कीजिए और माँ से मन-वांछित वर प्राप्त कीजिए।
  16. माँ को लाल पुष्प प्रिय हैं; भोग लगाकर भक्त उन्हें मनाते हैं।
  17. उस पर माँ प्रसन्न हो जाती हैं और तुरंत मनोवांछित फल दिलाती हैं।
  18. आप काल के भय से रक्षा करती हैं; हे जगदम्बा, आप कलियुग में शीघ्र फलदायिनी हैं।
  19. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  20. आप भक्तों को साहस व बल देती हैं और निर्भयता का वरदान देती हैं।
  21. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देती हैं।
  22. जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  23. आप समस्त रोग-दोष दूर भगाती हैं और घर में सुख-समृद्धि लाती हैं।
  24. आप दुर्गा-स्वरूपा महामाया हैं; आपकी छाया तीनों लोकों में फैली है।
  25. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही काली-कृपा प्राप्त करता है।
  26. जहाँ काली-नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत-पिशाच निकट नहीं आते।
  27. आप मंगलकारी व विघ्नों की विनाशिनी हैं; भय हरकर सुख प्रदान करती हैं।
  28. जो श्रद्धा से भोग चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  29. जो यह काली चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
  30. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर माँ काली की कृपा होती है।
  31. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।
  32. जो रात्रि-काल में पाठ करता है, वह भय व बाधा सब दूर भगा देता है।
  33. जिन पर माँ काली की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  34. नवरात्रि में पूजन कीजिए तथा अष्टमी-नवमी को हवन कीजिए।
  35. जो जन कन्या-पूजन करते हैं, वे माँ की कृपा से सुख से भर जाते हैं।
  36. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  37. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर माँ काली तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं।
  38. आपका नाम संकट-मोचनी है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करती हैं।
  39. जो जन काली-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  40. जो जन माँ काली के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  41. हे भय हरने वाली काली, आपकी जय हो; हे माँ, शरण में आए हम सबकी रक्षा कीजिए।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल काली चालीसा पढ़ता है, उसके भय-संकट दूर होते हैं और माँ की कृपा बरसती है।

लाभ

  • भय, शत्रु व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
  • भूत-प्रेत, तंत्र-बाधा व नजर-दोष का नाश होता है।
  • संकट व विपत्ति का शीघ्र नाश होता है।
  • साहस, शक्ति व निर्भयता में वृद्धि होती है।

कब करें पाठ

मंगलवार व अमावस्या को · नवरात्रि व काली पूजा (दीपावली) पर · रात्रि व संध्या पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक काली चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह

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