श्री काली चालीसा

śrī kālī cālīsā

Kali Chalisa

समय
10–12 मिनट
श्लोक/चौपाई
57
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
नवरात्रि, काली चौदस व मंगलवार-शनिवार
उद्देश्य:रक्षा (Protection)शक्ति (Power)संकट-मोचन (Relief from Troubles)
✓ संपूर्ण (54/54 श्लोक)

श्री काली चालीसा दो दोहों से आरंभ होकर चौवन चौपाइयों में चलती है। इसका आरंभ "जय काली जगदम्ब जय, हरनि ओघ अघ पुंज" से होता है। इसकी पहली इक्कीस चौपाइयाँ देवी के नामों की माला हैं — दस महाविद्या, नवदुर्गा और सप्तमातृका, तीनों इसमें आ जाती हैं।

परिचय

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

स्रोत: परंपरागत काली चालीसा; समापन दोहे में "भक्त" की छाप

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री काली चालीसा
IASTśrī kālī cālīsā
देवतामाँ दुर्गा
मूल स्रोतपरंपरागत काली चालीसा; समापन दोहे में "भक्त" की छाप
शुभ दिननवरात्रि, काली चौदस व मंगलवार-शनिवार
पाठ समय10–12 मिनट
कठिनाईमध्यम

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा पहले इक्कीस चौपाइयों में नामों की माला है, और उसकी बनावट देखने लायक है। इसमें तीन अलग-अलग परंपराएँ एक साथ पिरो दी गई हैं:

· दस महाविद्या — तारा, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, धूमावती, षोडशी, बगला, मातंगी, भैरवी, कमला (चौपाई 9–11)। · नवदुर्गा — ब्रह्मचारिणी, कालरात्रि, कूष्माण्डा, चन्द्रघण्टा, स्कन्दमाता (7, 8, 13, 21)। · सप्तमातृका — ब्राह्मणी, वाराही, शर्वाणी, विनायकी (19–20)।

इसके बाद स्वरूप-वर्णन आता है, और यहीं चालीसा सबसे स्पष्ट है — "अष्टादश तब भुजा मनोहर" (23): अठारह भुजाएँ, जिनमें शंख, चक्र, गदा, परिघ, भुशुण्डी, घंटा, शूल, वज्र और धनुष-बाण (25–26)। फिर शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज का वध (27), चौंसठ योगिनियों का साथ (28), शव पर आरूढ़ नृत्य (31) और लपलपाती जिह्वा (33)।

चौपाई 39 बावन शक्तिपीठ की बात करती है, और आगे विंध्यवासिनी, शाकम्भरी, महिषासुरमर्दिनी व कामाख्या — देवी के क्षेत्रीय रूप गिनाती है (40–41)।

अंत में स्वर बदल जाता है: "माँ उर वास करहू तुम अंबा, सदा दीन जन की अवलंबा" (46) — वही विनय-भाव जो हर चालीसा के अंत में आता है। समापन दोहे में रचयिता अपने को केवल "भक्त" कहता है; नाम नहीं देता।

संपूर्ण चालीसा

PDF डाउनलोड

जय काली जगदम्ब जय, हरनि ओघ अघ पुंज। वास करहु निज दास के, निशदिन हृदय निकुंज॥

हे जगदम्बा काली, आपकी जय हो; आप पापों के समूह को हरने वाली हैं। अपने दास के हृदय-निकुंज में दिन-रात निवास कीजिए।

जयति कपाली कालिका, कंकाली सुख दानि। कृपा करहु वरदायिनी, निज सेवक अनुमानि॥

कपाली कालिका की जय हो; कंकाली रूप में आप सुख देने वाली हैं। हे वरदायिनी, अपना सेवक जानकर कृपा कीजिए।

जय जय जय काली कंकाली। जय कपालिनी, जयति कराली॥

हे कंकाली काली, आपकी जय-जय-जय हो; हे कपालिनी, हे कराल रूप वाली, जय हो।

शंकर प्रिया, अपर्णा, अम्बा। जय कपर्दिनी, जय जगदम्बा॥

शंकर की प्रिया, अपर्णा, अम्बा; हे जटाधारिणी कपर्दिनी, हे जगदम्बा, जय हो।

आर्या, हला, अम्बिका, माया। कात्यायनी उमा जगजाया॥

आर्या, हला, अम्बिका, माया; कात्यायनी, उमा और जगत को जन्म देने वाली।

गिरिजा गौरी दुर्गा चण्डी। दाक्षायिनी शाम्भवी प्रचंडी॥

गिरिजा, गौरी, दुर्गा, चण्डी; दक्ष-पुत्री दाक्षायिनी, शाम्भवी और प्रचंडा।

पार्वती मंगला भवानी। विश्वकारिणी सती मृडानी॥

पार्वती, मंगला, भवानी; विश्व की रचयिता, सती और मृडानी।

सर्वमंगला शैल नन्दिनी। हेमवती तुम जगत वन्दिनी॥

सर्वमंगला, पर्वतराज की पुत्री; हेमवती — आप समस्त जगत से वंदित हैं।

ब्रह्मचारिणी कालरात्रि जय। महारात्रि जय मोहरात्रि जय॥

ब्रह्मचारिणी और कालरात्रि की जय; महारात्रि और मोहरात्रि की जय।

तुम त्रिमूर्ति रोहिणी कालिका। कूष्माण्डा कार्तिका चण्डिका॥

आप त्रिमूर्ति-स्वरूपा, रोहिणी और कालिका हैं; कूष्माण्डा, कार्तिका और चण्डिका भी।

तारा भुवनेश्वरी अनन्या। तुम्हीं छिन्नमस्ता शुचिधन्या॥

तारा और भुवनेश्वरी — आप अनन्य हैं; आप ही पवित्र और धन्य छिन्नमस्ता हैं।

धूमावती षोडशी माता। बगला मातंगी विख्याता॥

धूमावती और षोडशी माता; बगलामुखी और मातंगी के रूप में विख्यात।

तुम भैरवी मातु तुम कमला। रक्तदन्तिका कीरति अमला॥

आप भैरवी हैं, माता आप ही कमला हैं; रक्तदन्तिका — आपकी कीर्ति निर्मल है।

शाकम्भरी कौशिकी भीमा। महातमा अग जग की सीमा॥

शाकम्भरी, कौशिकी और भीमा; महात्मा रूप में आप चर-अचर जगत की सीमा हैं।

चन्द्रघण्टिका तुम सावित्री। ब्रह्मवादिनी माँ गायत्री॥

आप चन्द्रघण्टा और सावित्री हैं; ब्रह्म का वर्णन करने वाली माँ गायत्री भी।

रुद्राणी तुम कृष्ण पिंगला। अग्निज्वाला तुम सर्वमंगला॥

आप रुद्राणी, कृष्णा और पिंगला हैं; अग्नि की ज्वाला और सर्वमंगला भी आप ही हैं।

मेघस्वना तपस्विनि योगिनी। सहस्राक्षि तुम अगजग भोगिनी॥

मेघ जैसी गर्जना वाली, तपस्विनी और योगिनी; सहस्र नेत्रों वाली और चर-अचर जगत में व्याप्त।

जलोदरी सरस्वती डाकिनी। त्रिदशेश्वरी अजेय लाकिनी॥

जलोदरी, सरस्वती और डाकिनी; देवताओं की ईश्वरी तथा अजेय लाकिनी।

पुष्टि तुष्टि धृति स्मृति शिवदूती। कामाक्षी लज्जा आहूती॥

पुष्टि, तुष्टि, धृति, स्मृति और शिवदूती; कामाक्षी, लज्जा और आहुति-स्वरूपा।

महोदरी कामाक्षि हारिणी। विनायकी श्रुति महा शाकिनी॥

महोदरी और कामाक्षी — कष्ट हरने वाली; विनायकी, श्रुति-स्वरूपा और महाशाकिनी।

अजा कर्ममोही ब्रह्माणी। धात्री वाराही शर्वाणी॥

अजा, कर्ममोहिनी और ब्राह्मणी; धात्री, वाराही और शर्वाणी।

स्कन्द मातु तुम सिंह वाहिनी। मातु सुभद्रा रहहु दाहिनी॥

आप स्कन्दमाता और सिंहवाहिनी हैं; हे माता सुभद्रा, सदा अनुकूल रहिए।

नाम रूप गुण अमित तुम्हारे। शेष शारदा बरणत हारे॥

आपके नाम, रूप और गुण अनगिनत हैं; शेषनाग और शारदा भी वर्णन करते-करते हार गए।

तनु छवि श्यामवर्ण तव माता। नाम कालिका जग विख्याता॥

हे माता, आपके शरीर की छवि श्याम वर्ण की है; इसी से "कालिका" नाम जगत में विख्यात है।

अष्टादश तब भुजा मनोहर। तिनमहँ अस्त्र विराजत सुन्दर॥

आपकी अठारह भुजाएँ मनोहर हैं, और उनमें सुंदर अस्त्र सुशोभित हैं।

शंख चक्र अरु गदा सुहावन। परिघ भुशण्डी घण्टा पावन॥

शंख, चक्र और गदा सुहावने हैं; परिघ, भुशुण्डी और पवित्र घंटा भी।

शूल बज्र धनुबाण उठाए। निशिचर कुल सब मारि गिराए॥

शूल, वज्र, धनुष और बाण उठाकर आपने राक्षसों का सारा कुल मार गिराया।

शुंभ निशुंभ दैत्य संहारे। रक्तबीज के प्राण निकारे॥

शुंभ और निशुंभ दैत्यों का संहार किया; रक्तबीज के प्राण निकाल लिए।

चौंसठ योगिनी नाचत संगा। मद्यपान कीन्हैउ रण गंगा॥

चौंसठ योगिनियाँ आपके संग नाचती हैं; रण-भूमि में आपने रक्त-गंगा का पान किया।

कटि किंकिणी मधुर नूपुर धुनि। दैत्यवंश काँपत जेहि सुनि-सुनि॥

कमर की करधनी और नूपुरों की मधुर ध्वनि — जिसे सुन-सुनकर दैत्यों का वंश काँप उठता है।

कर खप्पर त्रिशूल भयकारी। अहै सदा सन्तन सुखकारी॥

हाथ में खप्पर और त्रिशूल भयंकर हैं, पर वे सदा संतों को सुख देने वाले हैं।

शव आरूढ़ नृत्य तुम साजा। बजत मृदंग भेरी के बाजा॥

शव पर आरूढ़ होकर आपने नृत्य सजाया; मृदंग और भेरी के बाजे बजते हैं।

रक्त पान अरिदल को कीन्हा। प्राण तजेउ जो तुम्हिं न चीन्हा॥

शत्रु-दल का रक्तपान किया; जिन्होंने आपको नहीं पहचाना, उन्होंने प्राण त्याग दिए।

लपलपाति जिव्हा तव माता। भक्तन सुख दुष्टन दुःख दाता॥

हे माता, आपकी जिह्वा लपलपाती है; आप भक्तों को सुख और दुष्टों को दुःख देने वाली हैं।

लसत भाल सेंदुर को टीको। बिखरे केश रूप अति नीको॥

भाल पर सिंदूर का टीका सुशोभित है; बिखरे केशों में आपका रूप अत्यंत सुंदर लगता है।

मुंडमाल गल अतिशय सोहत। भुजा मल किंकण मनमोहन॥

गले में मुंडमाला अत्यंत सुशोभित है; भुजाओं के आभूषण मन मोह लेते हैं।

प्रलय नृत्य तुम करहु भवानी। जगदम्बा कहि वेद बखानी॥

हे भवानी, प्रलय का नृत्य आप ही करती हैं; वेद आपको "जगदम्बा" कहकर बखानते हैं।

तुम मशान वासिनी कराला। भजत तुरत काटहु भवजाला॥

आप श्मशान में निवास करने वाली कराल रूपा हैं; भजते ही आप भव-जाल तुरंत काट देती हैं।

बावन शक्ति पीठ तव सुन्दर। जहाँ बिराजत विविध रूप धर॥

आपके बावन शक्तिपीठ सुंदर हैं, जहाँ आप विविध रूप धारण कर विराजती हैं।

विन्ध्यवासिनी कहूँ बड़ाई। कहँ कालिका रूप सुहाई॥

कहीं विंध्यवासिनी रूप में आपकी बड़ाई है, तो कहीं कालिका का सुहावना रूप।

शाकम्भरी बनी कहँ ज्वाला। महिषासुर मर्दिनी कराला॥

कहीं आप शाकम्भरी हैं, कहीं ज्वाला रूप; और कहीं कराल महिषासुरमर्दिनी।

कामाख्या तव नाम मनोहर। पुजवहिं मनोकामना द्रुततर॥

कामाख्या आपका मनोहर नाम है; वहाँ मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं।

चंड मुंड वध छिन महँ करेउ। देवन के उर आनन्द भरेउ॥

चंड और मुंड का वध आपने क्षण भर में कर दिया, और देवताओं के हृदय आनंद से भर दिए।

सर्व व्यापिनी तुम माँ तारा। अरिदल दलन लेहु अवतारा॥

हे माँ तारा, आप सर्वव्यापिनी हैं; शत्रु-दल का दलन करने के लिए अवतार लेती हैं।

खलबल मचत सुनत हुँकारी। अगजग व्यापक देह तुम्हारी॥

आपकी हुंकार सुनते ही खलबली मच जाती है; आपकी देह चर-अचर जगत में व्याप्त है।

तुम विराट रूपा गुणखानी। विश्व स्वरूपा तुम महारानी॥

आप विराट रूपा और गुणों की खान हैं; हे महारानी, आप ही विश्व-स्वरूपा हैं।

उत्पत्ति स्थिति लय तुम्हरे कारण। करहु दास के दोष निवारण॥

सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय — तीनों आपके ही कारण हैं; इस दास के दोष दूर कीजिए।

माँ उर वास करहू तुम अंबा। सदा दीन जन की अवलंबा॥

हे अम्बा माँ, मेरे हृदय में निवास कीजिए; आप सदा दीन जनों का सहारा हैं।

तुम्हारो ध्यान धरै जो कोई। ता कहँ भीति कतहुँ नहिं होई॥

जो कोई आपका ध्यान धरता है, उसे कहीं भी भय नहीं होता।

विश्वरूप तुम आदि भवानी। महिमा वेद पुराण बखानी॥

आप विश्वरूपा आदि भवानी हैं; वेद और पुराण आपकी महिमा का बखान करते हैं।

अति अपार तव नाम प्रभावा। जपत न रहन रंच दुःख दावा॥

आपके नाम का प्रभाव अत्यंत अपार है; जपने से तनिक भी दुःख की आग शेष नहीं रहती।

महाकालिका जय कल्याणी। जयति सदा सेवक सुखदानी॥

हे महाकालिका, हे कल्याणी, जय हो; सेवकों को सुख देने वाली, आपकी सदा जय हो।

तुम अनन्त औदार्य विभूषण। कीजिए कृपा क्षमिये सब दूषण॥

आपकी उदारता अनंत है और वही आपका आभूषण है; कृपा कीजिए और मेरे सब दोष क्षमा कीजिए।

दास जानि निज दया दिखावहु। सुत अनुमानित सहित अपनावहु॥

अपना दास जानकर दया दिखाइए; पुत्र समझकर मुझे अपना लीजिए।

जननी तुम सेवक प्रतिपाली। करहु कृपा सब विधि माँ काली॥

हे जननी, आप सेवकों का पालन करने वाली हैं; हे माँ काली, हर प्रकार से कृपा कीजिए।

पाठ करै चालीसा जोई। ता पर कृपा तुम्हारी होई॥

जो कोई यह चालीसा पढ़ता है, उस पर आपकी कृपा होती है।

जय तारा, जय दक्षिणा, कलावती सुखमूल। शरणागत "भक्त" है, रहहु सदा अनुकूल॥

फलश्रुति: हे तारा, हे दक्षिणा काली, हे कलावती — आप सुख की जड़ हैं। यह "भक्त" आपकी शरण में है; सदा अनुकूल रहिए। (रचयिता अपने को केवल "भक्त" कहता है, नाम नहीं देता।)

लिपि बदलने के लिए ऊपर देवनागरी / IAST / Roman चुनें।

शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

ओघ अघ पुंजपापों का समूह
कपालिनीकपाल धारण करने वाली
कपर्दिनीजटाजूट वाली
दाक्षायिनीदक्ष की पुत्री — सती
मृडानीमृड (शिव) की पत्नी
दस महाविद्यातारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगला, मातंगी, कमला, भैरवी, काली
शिवदूतीसप्तशती का वह रूप जिसमें शिव को दूत बनाया गया
अष्टादश भुजाअठारह भुजाएँ
भुशण्डीएक प्राचीन अस्त्र
खप्परकपाल-पात्र
चौंसठ योगिनीदेवी की चौंसठ सहचरी शक्तियाँ
बावन शक्तिपीठदेवी के बावन पीठ — इस चालीसा की गणना
दक्षिणादक्षिणा काली — बंगाल की उपासना का प्रमुख रूप

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे जगदम्बा काली, आपकी जय हो; आप पापों के समूह को हरने वाली हैं। अपने दास के हृदय-निकुंज में दिन-रात निवास कीजिए।
  2. कपाली कालिका की जय हो; कंकाली रूप में आप सुख देने वाली हैं। हे वरदायिनी, अपना सेवक जानकर कृपा कीजिए।
  3. हे कंकाली काली, आपकी जय-जय-जय हो; हे कपालिनी, हे कराल रूप वाली, जय हो।
  4. शंकर की प्रिया, अपर्णा, अम्बा; हे जटाधारिणी कपर्दिनी, हे जगदम्बा, जय हो।
  5. आर्या, हला, अम्बिका, माया; कात्यायनी, उमा और जगत को जन्म देने वाली।
  6. गिरिजा, गौरी, दुर्गा, चण्डी; दक्ष-पुत्री दाक्षायिनी, शाम्भवी और प्रचंडा।
  7. पार्वती, मंगला, भवानी; विश्व की रचयिता, सती और मृडानी।
  8. सर्वमंगला, पर्वतराज की पुत्री; हेमवती — आप समस्त जगत से वंदित हैं।
  9. ब्रह्मचारिणी और कालरात्रि की जय; महारात्रि और मोहरात्रि की जय।
  10. आप त्रिमूर्ति-स्वरूपा, रोहिणी और कालिका हैं; कूष्माण्डा, कार्तिका और चण्डिका भी।
  11. तारा और भुवनेश्वरी — आप अनन्य हैं; आप ही पवित्र और धन्य छिन्नमस्ता हैं।
  12. धूमावती और षोडशी माता; बगलामुखी और मातंगी के रूप में विख्यात।
  13. आप भैरवी हैं, माता आप ही कमला हैं; रक्तदन्तिका — आपकी कीर्ति निर्मल है।
  14. शाकम्भरी, कौशिकी और भीमा; महात्मा रूप में आप चर-अचर जगत की सीमा हैं।
  15. आप चन्द्रघण्टा और सावित्री हैं; ब्रह्म का वर्णन करने वाली माँ गायत्री भी।
  16. आप रुद्राणी, कृष्णा और पिंगला हैं; अग्नि की ज्वाला और सर्वमंगला भी आप ही हैं।
  17. मेघ जैसी गर्जना वाली, तपस्विनी और योगिनी; सहस्र नेत्रों वाली और चर-अचर जगत में व्याप्त।
  18. जलोदरी, सरस्वती और डाकिनी; देवताओं की ईश्वरी तथा अजेय लाकिनी।
  19. पुष्टि, तुष्टि, धृति, स्मृति और शिवदूती; कामाक्षी, लज्जा और आहुति-स्वरूपा।
  20. महोदरी और कामाक्षी — कष्ट हरने वाली; विनायकी, श्रुति-स्वरूपा और महाशाकिनी।
  21. अजा, कर्ममोहिनी और ब्राह्मणी; धात्री, वाराही और शर्वाणी।
  22. आप स्कन्दमाता और सिंहवाहिनी हैं; हे माता सुभद्रा, सदा अनुकूल रहिए।
  23. आपके नाम, रूप और गुण अनगिनत हैं; शेषनाग और शारदा भी वर्णन करते-करते हार गए।
  24. हे माता, आपके शरीर की छवि श्याम वर्ण की है; इसी से "कालिका" नाम जगत में विख्यात है।
  25. आपकी अठारह भुजाएँ मनोहर हैं, और उनमें सुंदर अस्त्र सुशोभित हैं।
  26. शंख, चक्र और गदा सुहावने हैं; परिघ, भुशुण्डी और पवित्र घंटा भी।
  27. शूल, वज्र, धनुष और बाण उठाकर आपने राक्षसों का सारा कुल मार गिराया।
  28. शुंभ और निशुंभ दैत्यों का संहार किया; रक्तबीज के प्राण निकाल लिए।
  29. चौंसठ योगिनियाँ आपके संग नाचती हैं; रण-भूमि में आपने रक्त-गंगा का पान किया।
  30. कमर की करधनी और नूपुरों की मधुर ध्वनि — जिसे सुन-सुनकर दैत्यों का वंश काँप उठता है।
  31. हाथ में खप्पर और त्रिशूल भयंकर हैं, पर वे सदा संतों को सुख देने वाले हैं।
  32. शव पर आरूढ़ होकर आपने नृत्य सजाया; मृदंग और भेरी के बाजे बजते हैं।
  33. शत्रु-दल का रक्तपान किया; जिन्होंने आपको नहीं पहचाना, उन्होंने प्राण त्याग दिए।
  34. हे माता, आपकी जिह्वा लपलपाती है; आप भक्तों को सुख और दुष्टों को दुःख देने वाली हैं।
  35. भाल पर सिंदूर का टीका सुशोभित है; बिखरे केशों में आपका रूप अत्यंत सुंदर लगता है।
  36. गले में मुंडमाला अत्यंत सुशोभित है; भुजाओं के आभूषण मन मोह लेते हैं।
  37. हे भवानी, प्रलय का नृत्य आप ही करती हैं; वेद आपको "जगदम्बा" कहकर बखानते हैं।
  38. आप श्मशान में निवास करने वाली कराल रूपा हैं; भजते ही आप भव-जाल तुरंत काट देती हैं।
  39. आपके बावन शक्तिपीठ सुंदर हैं, जहाँ आप विविध रूप धारण कर विराजती हैं।
  40. कहीं विंध्यवासिनी रूप में आपकी बड़ाई है, तो कहीं कालिका का सुहावना रूप।
  41. कहीं आप शाकम्भरी हैं, कहीं ज्वाला रूप; और कहीं कराल महिषासुरमर्दिनी।
  42. कामाख्या आपका मनोहर नाम है; वहाँ मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं।
  43. चंड और मुंड का वध आपने क्षण भर में कर दिया, और देवताओं के हृदय आनंद से भर दिए।
  44. हे माँ तारा, आप सर्वव्यापिनी हैं; शत्रु-दल का दलन करने के लिए अवतार लेती हैं।
  45. आपकी हुंकार सुनते ही खलबली मच जाती है; आपकी देह चर-अचर जगत में व्याप्त है।
  46. आप विराट रूपा और गुणों की खान हैं; हे महारानी, आप ही विश्व-स्वरूपा हैं।
  47. सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय — तीनों आपके ही कारण हैं; इस दास के दोष दूर कीजिए।
  48. हे अम्बा माँ, मेरे हृदय में निवास कीजिए; आप सदा दीन जनों का सहारा हैं।
  49. जो कोई आपका ध्यान धरता है, उसे कहीं भी भय नहीं होता।
  50. आप विश्वरूपा आदि भवानी हैं; वेद और पुराण आपकी महिमा का बखान करते हैं।
  51. आपके नाम का प्रभाव अत्यंत अपार है; जपने से तनिक भी दुःख की आग शेष नहीं रहती।
  52. हे महाकालिका, हे कल्याणी, जय हो; सेवकों को सुख देने वाली, आपकी सदा जय हो।
  53. आपकी उदारता अनंत है और वही आपका आभूषण है; कृपा कीजिए और मेरे सब दोष क्षमा कीजिए।
  54. अपना दास जानकर दया दिखाइए; पुत्र समझकर मुझे अपना लीजिए।
  55. हे जननी, आप सेवकों का पालन करने वाली हैं; हे माँ काली, हर प्रकार से कृपा कीजिए।
  56. जो कोई यह चालीसा पढ़ता है, उस पर आपकी कृपा होती है।
  57. फलश्रुति: हे तारा, हे दक्षिणा काली, हे कलावती — आप सुख की जड़ हैं। यह "भक्त" आपकी शरण में है; सदा अनुकूल रहिए। (रचयिता अपने को केवल "भक्त" कहता है, नाम नहीं देता।)

लाभ

  • दस महाविद्या, नवदुर्गा और सप्तमातृका — तीनों परंपराओं के नाम एक ही पाठ में।
  • नवरात्रि तथा काली चौदस की पूजा का प्रमुख पाठ; मंगलवार व शनिवार को भी पढ़ा जाता है।
  • देवी का पूरा स्वरूप-वर्णन — अठारह भुजाएँ, अस्त्र, मुंडमाला और शव पर नृत्य।
  • शुंभ-निशुंभ, रक्तबीज तथा चंड-मुंड — सप्तशती के प्रसंग संक्षेप में आ जाते हैं।

कब करें पाठ

नवरात्रि में — विशेषकर अष्टमी व नवमी कोकाली चौदस (नरक चतुर्दशी) परमंगलवार व शनिवार कोदीपावली की रात्रि में काली पूजा के समय

पाठ विधि

माँ काली के चित्र के समक्ष लाल या काले वस्त्र पर दीप जलाएँ; लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल), अक्षत और गुड़ अथवा खीर का भोग अर्पित करें। पहले दोनों दोहे पढ़ें, फिर चौवन चौपाइयाँ, और अंत में समापन दोहा। रात्रि का समय विशेष कहा जाता है। पाठ के बाद आरती कर प्रसाद बाँटें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (54/54 श्लोक)
स्रोत परंपराdrikpanchang.com — काली माता चालीसा (आधार-पाठ) · aartichalisa.com — Kali Chalisa (स्वतंत्र पुष्टि; शब्द-मिलान 88.3%) · ℹ️ काली जी की एक और चालीसा प्रचलित है — "जय काली कंकाल मालिनी…" (महाकाली चालीसा); वह अलग रचना है।
रचयिताअज्ञात (परंपरा से प्रचलित)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

माँ दुर्गा

Goddess Durga

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

देवता वर्गशक्ति · रक्षा · विजय · साहस
वाहनसिंह
मुख्य मंत्रॐ दुं दुर्गायै नमः
सभी पाठ देखें

श्री काली चालीसा — सामान्य प्रश्न

संबंधित पर्व व व्रत

माँ दुर्गा भक्ति संग्रह

आरती, चालीसा, मंत्र, स्तोत्र, अष्टकम, सहस्रनाम और अन्य भक्ति पाठ