नौ देवियाँ, पर दिन कभी आठ, कभी दस
हर देवी की पूजा तिथि से होती है, अंग्रेज़ी तारीख़ से नहीं। पहली तिथि प्रतिपदा को शैलपुत्री, दूसरी को ब्रह्मचारिणी — ऐसे ही नवमी तक।
तिथियों की लंबाई बराबर नहीं होती। कभी कोई तिथि इतनी छोटी पड़ती है कि दो देवियों की पूजा एक ही दिन आ जाती है। कभी कोई तिथि दो सूर्योदय तक रहती है, तो एक दिन बिना नई पूजा के निकल जाता है।
इसलिए अगर आपको नीचे की तालिका में दो देवियाँ एक ही तारीख़ पर दिखें, तो घबराइए मत। यह चूक नहीं, सही गणना है।
घटस्थापना — कलश कब स्थापित करें
नवरात्रि पहले दिन कलश स्थापना से शुरू होती है। इसे घटस्थापना कहते हैं — नौ दिनों के लिए देवी का आवाहन।
इसका सबसे अच्छा समय प्रतिपदा तिथि में दिन का पहला एक-तिहाई भाग माना गया है। हो सके तो आप इसे मध्याह्न से पहले कर लीजिए। वह समय न मिले, तो अभिजित मुहूर्त में भी किया जा सकता है।
अमावस्या में और रात में घटस्थापना नहीं की जाती। चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग को टालने की सलाह है, पर ये वर्जित नहीं हैं — इन्हें लेकर चिंता न कीजिए।
संधि पूजा — अष्टमी और नवमी का मिलन
जिस क्षण अष्टमी तिथि ख़त्म होती है और नवमी शुरू होती है, उसे संधि काल कहते हैं। अष्टमी के आख़िरी 24 मिनट और नवमी के पहले 24 मिनट — कुल लगभग 48 मिनट।
परंपरा में इसे पूरी दुर्गा पूजा का सबसे पवित्र समय माना गया है। मान्यता है कि इसी समय देवी चामुंडा प्रकट हुईं और चंड-मुंड का अंत किया।
यह समय हर साल अलग होता है, कभी सुबह, कभी दोपहर। इसलिए आप इसे पंचांग से ही देखिए — नीचे इस वर्ष का समय दिया है।
नौ रंग — एक आधुनिक प्रथा
आजकल नवरात्रि में हर दिन एक रंग पहनने का चलन है। यह प्रथा प्यारी है, पर शास्त्र से नहीं आई। माना जाता है कि यह 2003 में शुरू हुई। तब मुंबई के समाचार-पत्र महाराष्ट्र टाइम्स ने इसका अभियान चलाया था।
पहले सात दिनों का रंग वार से तय होता है — रविवार नारंगी, सोमवार सफ़ेद, मंगलवार लाल, बुधवार रॉयल ब्लू, गुरुवार पीला, शुक्रवार हरा और शनिवार स्लेटी।
आठवें और नौवें दिन के रंग उस वार से तय होते हैं जिस दिन नवरात्रि शुरू हुई — द्रिक पंचांग यही नियम बताता है, और पिछले वर्षों में अख़बारों की घोषित सूचियाँ इसी से मेल खाती हैं। जैसे रविवार से शुरू हो तो आठवें दिन बैंगनी और नौवें दिन मोरपंखी हरा। आप पहनिए ज़रूर, पर पूजा का भाव रंग से बड़ा है।
देश भर में नवरात्रि
बंगाल और पूर्वोत्तर में यही पर्व दुर्गा पूजा बनकर आता है, बड़े-बड़े पंडालों के साथ। गुजरात में आरती और गरबा की रातें होती हैं।
दक्षिण भारत में घरों में गोलू सजाया जाता है — सीढ़ियों पर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ क्रम से रखी जाती हैं। आप कहीं भी हों, रूप अलग हैं पर आराधना एक ही शक्ति की है।
