स्वरूप
| वाहन | गर्दभ (गधा) |
|---|---|
| भुजाएँ | चार |
| हाथों में | बाएँ हाथों में खड्ग और लोहे का काँटा; दाएँ हाथ अभय और वर मुद्रा में |
| वर्ण | श्याम |
| अन्य नाम | शुभंकरी |
| प्रिय फूल | रात की रानी |
आयुधों का विवरण ग्रंथों में थोड़ा बदलता है। द्रिक पंचांग खड्ग और लोहे का काँटा लिखता है; विकिपीडिया खड्ग और वज्र लिखता है। अभय और वर मुद्रा पर सब एकमत हैं।
माँ कालरात्रि की कथा
शुंभ-निशुंभ। शुंभ और निशुंभ नाम के असुरों ने देवताओं को हराकर उनका स्वर्ग छीन लिया था। द्रिक पंचांग के अनुसार उनके अंत के लिए देवी पार्वती ने अपनी बाहरी सुनहरी त्वचा त्याग दी। वे श्याम वर्ण की कालरात्रि बनीं।
चंड-मुंड। शुंभ-निशुंभ ने पहले अपने सेनापति चंड और मुंड को भेजा। देवी के उग्र रूप ने दोनों का अंत कर दिया। चंड और मुंड के अंत से देवी का एक नाम चामुंडा पड़ा।
रक्तबीज। फिर आया रक्तबीज। उसे शिव से एक वरदान मिला था। युद्ध में उसके रक्त की एक भी बूँद धरती पर गिरे, तो उससे एक नया रक्तबीज पैदा हो जाए — उतना ही बलवान, उन्हीं अस्त्रों के साथ।
युद्ध में जैसे ही उस पर प्रहार होता, रक्त की बूँदें गिरतीं और नए-नए रक्तबीज खड़े हो जाते। देखते-देखते पूरा रणक्षेत्र रक्तबीजों से भर गया, और देवी व मातृकाएँ उनसे घिर गईं।
देवी का उपाय। तब देवी ने काली (चामुंडा) से कहा — अपना मुख फैला दो। मैं जैसे ही रक्तबीज पर प्रहार करूँ, तुम उसका रक्त गिरने से पहले ही पी जाना।
ऐसा ही हुआ। रक्त की एक बूँद भी धरती तक नहीं पहुँची, इसलिए कोई नया रक्तबीज नहीं बना। जो बचे थे, उन्हें देवी ने अस्त्रों से समाप्त किया, और अंत में रक्तबीज का भी अंत हुआ।
यह रूप देखने में सबसे उग्र है, पर इसका अर्थ डर नहीं। माँ का यह रूप अंधकार को हटाने के लिए है — और भक्तों के लिए ये सदा शुभंकरी हैं।
रक्तबीज और चंड-मुंड की कथा देवी माहात्म्य (अध्याय 8 आदि) में काली/चामुंडा से जुड़ी है। विकिपीडिया इसे कालरात्रि के लेख में देता है, और कई परंपराएँ दोनों को एक मानती हैं — इसलिए यह कथा यहाँ दी है।
सातवें दिन का महत्व — उग्र रूप, शुभ भाव
द्रिक पंचांग कहता है कि उग्र रूप के भीतर शुभ शक्ति है, इसलिए ये शुभंकरी कहलाती हैं। विकिपीडिया भी यही बताता है — भक्तों को ये सदा अच्छा फल देती हैं।
इनके दो हाथ अभय और वर मुद्रा में हैं — एक कहता है "डरो मत", दूसरा आशीर्वाद देता है। इसलिए इस दिन घबराने की कोई बात नहीं। आप शांत मन से पूजा कीजिए, जैसे बाक़ी दिनों में करते हैं।
माँ कालरात्रि के मंत्र
प्रार्थना श्लोक
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता । लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ॥ वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा । वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी ॥
ekaveṇī japākarṇapūrā nagnā kharāsthitā | lamboṣṭhī karṇikākarṇī tailābhyaktaśarīriṇī || vāmapādollasallohalatākaṇṭakabhūṣaṇā | vardhanmūrdhadhvajā kṛṣṇā kālarātrirbhayaṅkarī ||
अर्थ: उनकी एक ही वेणी (चोटी) है, और कानों में जपा (गुड़हल) के फूल हैं। वे निर्वस्त्र हैं और गर्दभ पर सवार हैं। उनके होंठ बड़े हैं, कानों में कर्णिका के आभूषण हैं और शरीर पर तेल लगा है। बाएँ पैर में लोहे की काँटेदार लता का आभूषण है। वे श्याम वर्ण वाली, उग्र रूप की कालरात्रि हैं।
यह श्लोक देवी के उग्र रूप का सीधा वर्णन है। "वर्धन्मूर्धध्वजा" पद का अर्थ टीकाकार अलग-अलग करते हैं, इसलिए हमने उसे अर्थ में नहीं जोड़ा।
नाम मंत्र
ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥
oṃ devī kālarātryai namaḥ||
यह छोटा मंत्र जप के लिए है — अर्थ है “देवी कालरात्रि को नमस्कार”। आप इसे अपनी श्रद्धा से 11, 21 या 108 बार जप सकते हैं; संख्या से बड़ा मन का भाव है।
बीज मंत्र (प्रचलित)
क्लीं ऐं श्री कालिकायै नमः॥
klīṃ aiṃ śrī kālikāyai namaḥ||
नवदुर्गा के बीज मंत्रों की यह सूची कई हिंदी स्रोतों में शब्दशः एक-सी मिलती है, पर इनमें से किसी ने किसी शास्त्र का हवाला नहीं दिया — इसलिए इसे “प्रचलित” कहा है। परंपरा में बीज मंत्र गुरु से लेकर जपने की बात कही जाती है; बिना दीक्षा के ऊपर दिया नाम मंत्र और प्रार्थना श्लोक सरल और पूर्ण हैं।
स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
yā devī sarvabhūteṣu mām̐ kālarātri rūpeṇa saṃsthitā| namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ||
अर्थ: जो देवी सब प्राणियों में माँ कालरात्रि के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
“या देवी सर्वभूतेषु” स्तुति मूल रूप से दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय की है (“…शक्तिरूपेण संस्थिता” आदि)। नौ देवियों के नाम वाला यह रूप भक्ति-परंपरा में उसी से बना है।
माँ कालरात्रि की पूजा विधि
नवरात्रि में पूजा का क्रम हर दिन एक ही रहता है। बदलते हैं देवी, उनका मंत्र, फूल और भोग।सातवें दिन आप ऐसे पूजा कर सकते हैं:
- स्नान करके साफ़ कपड़े पहनिए, और कलश व पूजा-स्थान को प्रणाम कीजिए।
- माँ कालरात्रि का ध्यान कीजिए और ऊपर दिया प्रार्थना श्लोक पढ़कर उनका आवाहन कीजिए।
- आसन के लिए फूल, फिर जल (पाद्य, अर्घ्य, आचमन) अर्पित कीजिए।
- स्नान के लिए जल, फिर वस्त्र के रूप में मौली, चंदन, कुमकुम और अक्षत चढ़ाइए।
- रात की रानी अर्पित कीजिए, और बिल्वपत्र भी।
- धूप और दीप दिखाइए।
- भोग में गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई चढ़ाइए, साथ में फल।
- नाम मंत्र का जप कीजिए, फिर आरती और परिक्रमा।
- अंत में पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँग लीजिए।
यह षोडशोपचार पूजा का सरल क्रम है। समय कम हो, तो पंचोपचार भी पूरा माना गया है — दीप, धूप, फूल, गंध और नैवेद्य। घबराइए मत, भाव सच्चा हो तो छोटी पूजा भी पूरी है।
ग्रह और चक्र — मान्यता
ज्योतिषीय मान्यता में माँ कालरात्रि का संबंध शनि ग्रह से जोड़ा जाता है।
चक्र पर एक ईमानदार बात: बाक़ी देवियों के ध्यान मंत्र में एक चक्र का नाम आता है, पर कालरात्रि के ध्यान मंत्र में किसी चक्र का उल्लेख नहीं है। कई सूचियाँ इन्हें सहस्रार से जोड़ देती हैं, पर वह पाठ में नहीं है।
ये परंपरा और ज्योतिष की मान्यताएँ हैं, शास्त्र का नियम या भविष्यवाणी नहीं।
