स्वरूप
| वाहन | सिंह या बाघ — स्रोतों में दोनों मिलते हैं |
|---|---|
| भुजाएँ | दस |
| हाथों में | त्रिशूल, गदा, खड्ग, कमंडल, कमल, बाण, धनुष, जपमाला; एक हाथ वर मुद्रा में, एक अभय मुद्रा में |
| मस्तक पर | घंटे के आकार का अर्धचंद्र |
| वर्ण | स्वर्ण जैसा |
| प्रिय फूल | चमेली |
वाहन पर स्रोत एक नहीं हैं। द्रिक पंचांग बाघिन लिखता है, कई ग्रंथ और चित्र सिंह दिखाते हैं; इनके ध्यान मंत्र में भी "सिंहारूढा" आता है। दोनों परंपराएँ चलती हैं।
माँ चंद्रघंटा की कथा
माँ चंद्रघंटा से दो कथाएँ जुड़ी हैं। एक विवाह की, और एक असुर पर विजय की।
विवाह की कथा। कठोर तप के बाद पार्वती का विवाह शिव से तय हुआ। जब शिव बारात लेकर आए, तो उनका रूप देखकर पार्वती का परिवार घबरा गया — शरीर पर भस्म, गले में लिपटे सर्प, और मुंडों की माला।
तब देवी ने चंद्रघंटा का तेजस्वी रूप धारण किया — मस्तक पर घंटे जैसा अर्धचंद्र और दस भुजाएँ। उसके बाद शिव भी सौम्य रूप में आए, और विवाह शांति से संपन्न हुआ। द्रिक पंचांग के अनुसार विवाह के बाद देवी अर्धचंद्र धारण करने लगीं, और इसी से नाम पड़ा चंद्रघंटा।
असुर पर विजय — लोक-प्रचलित कथा। एक समय असुरों का आतंक बहुत बढ़ गया। उनका स्वामी महिषासुर देवराज इंद्र का सिंहासन पाना चाहता था, और स्वर्ग पर राज करने के लिए युद्ध कर रहा था।
चिंतित देवता त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु और महेश — के पास पहुँचे। उनकी व्यथा सुनकर त्रिदेव को क्रोध आया, और उनके मुख से एक ऊर्जा निकली। उस ऊर्जा से एक देवी प्रकट हुईं।
देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र दिए। भगवान शंकर ने त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र, और देवराज इंद्र ने अपना घंटा दिया। सूर्य ने अपना तेज और तलवार दी, और सवारी के लिए सिंह मिला।
इन अस्त्रों के साथ माँ चंद्रघंटा ने महिषासुर का अंत किया, और देवताओं की रक्षा की।
विवाह वाला प्रसंग शिव पुराण से जुड़ी परंपरा में है। महिषासुर वाली कथा हिंदी व्रत-कथाओं में प्रचलित है; देवी माहात्म्य और पुराणों में महिषासुर का अंत दुर्गा/कात्यायनी से जुड़ा है — इसलिए इसे "लोक-प्रचलित" लिखा है।
तीसरे दिन का महत्व
यह रूप दो बातें एक साथ सिखाता है। द्रिक पंचांग इसे शांत और भक्तों का कल्याण करने वाला रूप बताता है, और साथ ही हर अस्त्र से युक्त — यानी भीतर शांति, बाहर तैयारी।
मान्यता है कि इनके मस्तक के चंद्र-घंटे की ध्वनि भक्तों से बुरी शक्तियों को दूर रखती है। आप इस दिन पूजा करते समय घंटी की ध्वनि पर एक पल ध्यान टिकाकर देखिए — मन अपने-आप शांत होता है।
माँ चंद्रघंटा के मंत्र
प्रार्थना श्लोक
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता । प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥
piṇḍajapravarārūḍhā caṇḍakopāstrakairyutā | prasādaṃ tanute mahyaṃ candraghaṇṭeti viśrutā ||
अर्थ: श्रेष्ठ वाहन पर आरूढ़, प्रचंड शक्ति वाले अस्त्रों से युक्त, जो चंद्रघंटा नाम से प्रसिद्ध हैं — वे देवी मुझ पर अपनी कृपा बरसाएँ।
श्लोक के "पिण्डज" शब्द को अनुवादक प्रायः बाघ मानते हैं; इसका अर्थ पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
नाम मंत्र
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥
oṃ devī candraghaṇṭāyai namaḥ||
यह छोटा मंत्र जप के लिए है — अर्थ है “देवी चंद्रघंटा को नमस्कार”। आप इसे अपनी श्रद्धा से 11, 21 या 108 बार जप सकते हैं; संख्या से बड़ा मन का भाव है।
बीज मंत्र (प्रचलित)
ऐं श्रीं शक्त्यै नमः॥
aiṃ śrīṃ śaktyai namaḥ||
नवदुर्गा के बीज मंत्रों की यह सूची कई हिंदी स्रोतों में शब्दशः एक-सी मिलती है, पर इनमें से किसी ने किसी शास्त्र का हवाला नहीं दिया — इसलिए इसे “प्रचलित” कहा है। परंपरा में बीज मंत्र गुरु से लेकर जपने की बात कही जाती है; बिना दीक्षा के ऊपर दिया नाम मंत्र और प्रार्थना श्लोक सरल और पूर्ण हैं। प्रचलित स्रोतों में "शक्तयै" छपा है; "शक्ति" की चतुर्थी का शुद्ध रूप "शक्त्यै" है, वही यहाँ दिया है।
स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
yā devī sarvabhūteṣu mām̐ candraghaṇṭā rūpeṇa saṃsthitā| namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ||
अर्थ: जो देवी सब प्राणियों में माँ चंद्रघंटा के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
“या देवी सर्वभूतेषु” स्तुति मूल रूप से दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय की है (“…शक्तिरूपेण संस्थिता” आदि)। नौ देवियों के नाम वाला यह रूप भक्ति-परंपरा में उसी से बना है।
माँ चंद्रघंटा की पूजा विधि
नवरात्रि में पूजा का क्रम हर दिन एक ही रहता है। बदलते हैं देवी, उनका मंत्र, फूल और भोग।तीसरे दिन आप ऐसे पूजा कर सकते हैं:
- स्नान करके साफ़ कपड़े पहनिए, और कलश व पूजा-स्थान को प्रणाम कीजिए।
- माँ चंद्रघंटा का ध्यान कीजिए और ऊपर दिया प्रार्थना श्लोक पढ़कर उनका आवाहन कीजिए।
- आसन के लिए फूल, फिर जल (पाद्य, अर्घ्य, आचमन) अर्पित कीजिए।
- स्नान के लिए जल, फिर वस्त्र के रूप में मौली, चंदन, कुमकुम और अक्षत चढ़ाइए।
- चमेली अर्पित कीजिए, और बिल्वपत्र भी।
- धूप और दीप दिखाइए।
- भोग में दूध या दूध से बनी मिठाई (खीर) चढ़ाइए, साथ में फल।
- नाम मंत्र का जप कीजिए, फिर आरती और परिक्रमा।
- अंत में पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँग लीजिए।
यह षोडशोपचार पूजा का सरल क्रम है। समय कम हो, तो पंचोपचार भी पूरा माना गया है — दीप, धूप, फूल, गंध और नैवेद्य। घबराइए मत, भाव सच्चा हो तो छोटी पूजा भी पूरी है।
ग्रह और चक्र — मान्यता
ज्योतिषीय मान्यता में माँ चंद्रघंटा का संबंध शुक्र ग्रह से जोड़ा जाता है।
इनके ध्यान मंत्र में इन्हें मणिपुर चक्र में स्थित बताया गया है।
ये परंपरा और ज्योतिष की मान्यताएँ हैं, शास्त्र का नियम या भविष्यवाणी नहीं।
