स्वरूप
| वाहन | श्वेत वृषभ — इसीलिए वृषारूढ़ा |
|---|---|
| भुजाएँ | चार |
| हाथों में | दाएँ हाथों में त्रिशूल और अभय मुद्रा; बाएँ हाथों में डमरू और वर मुद्रा |
| वर्ण | अत्यंत गौर — शंख, चंद्र और कुंद के फूल जैसा |
| वस्त्र | केवल श्वेत — इसीलिए श्वेतांबरधरा |
| प्रिय फूल | रात की रानी |
माँ महागौरी की कथा
इनके गौर वर्ण की कथा तीन रूपों में मिलती है, और तीनों सुंदर हैं।
तप और गंगाजल — प्रचलित कथा। भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए पार्वती ने बहुत कठोर तपस्या की। इस घोर तप के कारण उनका शरीर काला पड़ गया।
उनकी तपस्या और सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें स्वीकार किया। फिर शिव ने उनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धोया। देवी का रूप कांतिमय और अत्यंत गौर हो गया — और वे महागौरी कहलाईं।
द्रिक पंचांग का रूप। द्रिक पंचांग के अनुसार देवी शैलपुत्री सोलह वर्ष की आयु में अत्यंत सुंदर थीं, और उनका वर्ण बहुत गौर था। इसी कारण वे महागौरी कहलाईं। इनकी तुलना शंख, चंद्रमा और कुंद के फूल से की जाती है।
शिव पुराण का रूप — कौशिकी। शिव पुराण से जुड़ी कथा में शिव पार्वती को छेड़ते हुए "काली" कहते थे। पार्वती ने गौर वर्ण के लिए ब्रह्मा का तप किया। ब्रह्मा ने कहा कि पहले शुंभ-निशुंभ का अंत कीजिए।
तब पार्वती ने हिमालय में गंगा में स्नान किया। उनकी श्याम त्वचा धुल गई, और उसी से देवी कौशिकी प्रकट हुईं। पार्वती गौर वर्ण की हो गईं। असुरों पर विजय के बाद वे कैलास लौट आईं।
तीनों कथाओं में एक बात साझी है — तप, और उसके बाद निखरा हुआ उजला रूप। इसीलिए महागौरी को निर्मलता का रूप माना जाता है।
कुछ कथा-संग्रहों में एक भूखे सिंह की कथा भी मिलती है। पर वह हमें केवल एक स्रोत में मिली, और इस रूप का वाहन वृषभ है। इसलिए हमने उसे नहीं लिखा।
अष्टमी का महत्व
महागौरी का दिन दुर्गा अष्टमी है — नवरात्रि के सबसे बड़े दिनों में से एक। कई परिवारों में इसी दिन कन्या पूजन होता है।
देवी भागवत पुराण के अनुसार कन्या पूजन में दो से दस वर्ष की कन्याओं की पूजा होती है। हर आयु की कन्या देवी के एक रूप की मानी जाती है। कुछ घरों में कन्या पूजन नवमी को होता है — अपने घर की परंपरा देख लीजिए।
शारदीय नवरात्रि में अष्टमी के अंत और नवमी की शुरुआत पर संधि पूजा भी होती है। इसका समय हर साल पंचांग से निकलता है, और नवरात्रि के मुख्य पृष्ठ पर दिया है।
माँ महागौरी के मंत्र
प्रार्थना श्लोक
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः । महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ॥
śvete vṛṣe samārūḍhā śvetāmbaradharā śuciḥ | mahāgaurī śubhaṃ dadyānmahādevapramodadā ||
अर्थ: जो श्वेत वृषभ पर सवार हैं, श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और पवित्र हैं, महादेव को आनंद देने वाली वे महागौरी मुझे शुभ प्रदान करें।
नाम मंत्र
ॐ देवी महागौर्यै नमः॥
oṃ devī mahāgauryai namaḥ||
यह छोटा मंत्र जप के लिए है — अर्थ है “देवी महागौरी को नमस्कार”। आप इसे अपनी श्रद्धा से 11, 21 या 108 बार जप सकते हैं; संख्या से बड़ा मन का भाव है।
बीज मंत्र (प्रचलित)
श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नमः॥
śrī klīṃ hrīṃ varadāyai namaḥ||
नवदुर्गा के बीज मंत्रों की यह सूची कई हिंदी स्रोतों में शब्दशः एक-सी मिलती है, पर इनमें से किसी ने किसी शास्त्र का हवाला नहीं दिया — इसलिए इसे “प्रचलित” कहा है। परंपरा में बीज मंत्र गुरु से लेकर जपने की बात कही जाती है; बिना दीक्षा के ऊपर दिया नाम मंत्र और प्रार्थना श्लोक सरल और पूर्ण हैं।
स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
yā devī sarvabhūteṣu mām̐ mahāgaurī rūpeṇa saṃsthitā| namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ||
अर्थ: जो देवी सब प्राणियों में माँ महागौरी के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
“या देवी सर्वभूतेषु” स्तुति मूल रूप से दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय की है (“…शक्तिरूपेण संस्थिता” आदि)। नौ देवियों के नाम वाला यह रूप भक्ति-परंपरा में उसी से बना है।
माँ महागौरी की पूजा विधि
नवरात्रि में पूजा का क्रम हर दिन एक ही रहता है। बदलते हैं देवी, उनका मंत्र, फूल और भोग।आठवें दिन आप ऐसे पूजा कर सकते हैं:
- स्नान करके साफ़ कपड़े पहनिए, और कलश व पूजा-स्थान को प्रणाम कीजिए।
- माँ महागौरी का ध्यान कीजिए और ऊपर दिया प्रार्थना श्लोक पढ़कर उनका आवाहन कीजिए।
- आसन के लिए फूल, फिर जल (पाद्य, अर्घ्य, आचमन) अर्पित कीजिए।
- स्नान के लिए जल, फिर वस्त्र के रूप में मौली, चंदन, कुमकुम और अक्षत चढ़ाइए।
- रात की रानी अर्पित कीजिए, और बिल्वपत्र भी।
- धूप और दीप दिखाइए।
- भोग में नारियल चढ़ाइए, साथ में फल।
- नाम मंत्र का जप कीजिए, फिर आरती और परिक्रमा।
- अंत में पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँग लीजिए।
यह षोडशोपचार पूजा का सरल क्रम है। समय कम हो, तो पंचोपचार भी पूरा माना गया है — दीप, धूप, फूल, गंध और नैवेद्य। घबराइए मत, भाव सच्चा हो तो छोटी पूजा भी पूरी है।
ग्रह और चक्र — मान्यता
ज्योतिषीय मान्यता में माँ महागौरी का संबंध राहु से जोड़ा जाता है।
इनके ध्यान मंत्र में इन्हें सोम चक्र में स्थित बताया गया है। ध्यान दें — यह प्रचलित सात चक्रों में से नहीं है; कई सूचियाँ यहाँ सात चक्रों का ही नाम ठूँस देती हैं, पर पाठ सोम चक्र कहता है।
ये परंपरा और ज्योतिष की मान्यताएँ हैं, शास्त्र का नियम या भविष्यवाणी नहीं।
