पाठ का क्रम
गीता प्रेस की पाठ-विधि के संकल्प में पूरा क्रम दिया गया है। नीचे हर अंग और अध्याय अपने पूरे पाठ और अर्थ से जुड़ा है।
पाठ से पहले — तेरह अध्यायों से पहले, इसी क्रम में
- देवी कवच · 56 श्लोक
- अर्गला स्तोत्र · 25 श्लोक
- कीलक स्तोत्र · 14 श्लोक
- वेदोक्त रात्रिसूक्त · 8 श्लोक
- तन्त्रोक्त रात्रिसूक्त · 15 श्लोक
- देव्यथर्वशीर्ष · 26 श्लोक
तेरह अध्याय
- प्रथम अध्याय — मधुकैटभवध · प्रथम चरित्र · 104 मंत्र
- द्वितीय अध्याय — महिषासुरसैन्यवध · मध्यम चरित्र · 69 मंत्र
- तृतीय अध्याय — महिषासुरवध · मध्यम चरित्र · 44 मंत्र
- चतुर्थ अध्याय — शक्रादिस्तुति · मध्यम चरित्र · 42 मंत्र
- पञ्चम अध्याय — देवीदूतसंवाद · उत्तम चरित्र · 129 मंत्र
- षष्ठ अध्याय — धूम्रलोचनवध · उत्तम चरित्र · 24 मंत्र
- सप्तम अध्याय — चण्डमुण्डवध · उत्तम चरित्र · 27 मंत्र
- अष्टम अध्याय — रक्तबीजवध · उत्तम चरित्र · 63 मंत्र
- नवम अध्याय — निशुम्भवध · उत्तम चरित्र · 41 मंत्र
- दशम अध्याय — शुम्भवध · उत्तम चरित्र · 32 मंत्र
- एकादश अध्याय — नारायणीस्तुति · उत्तम चरित्र · 55 मंत्र
- द्वादश अध्याय — फलस्तुति (भगवती वाक्य) · उत्तम चरित्र · 41 मंत्र
- त्रयोदश अध्याय — सुरथ-वैश्य को वरदान · उत्तम चरित्र · 29 मंत्र
पाठ के बाद — तेरह अध्यायों के बाद
- ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त · 8 श्लोक
- प्राधानिक रहस्य · 31 श्लोक
- वैकृतिक रहस्य · 39 श्लोक
- मूर्ति रहस्य · 25 श्लोक
- क्षमा-प्रार्थना · 8 श्लोक
परिशिष्ट — संकल्प के क्रम में नहीं, पर सप्तशती के साथ प्रचलित
- सिद्धकुञ्जिका स्तोत्र · 12 श्लोक
- देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र · 12 श्लोक
पाठ-विधि
- स्नान करके पवित्र हों, आसन शुद्ध करके उस पर बैठें। साथ में शुद्ध जल, पूजन-सामग्री और सप्तशती की पुस्तक रखें; पुस्तक को अपने सामने लकड़ी आदि के शुद्ध आसन पर रखें।
- ललाट पर अपनी रुचि के अनुसार भस्म, चंदन या रोली लगाएँ, शिखा बाँधें और पूर्व की ओर मुख करके नीचे दिए चार मंत्रों से चार बार आचमन करें।
- प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं और गुरुजनों को प्रणाम करें, और कुश की पवित्री धारण करें।
- हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर संकल्प करें — अपना नाम, गोत्र, तिथि और पाठ का उद्देश्य बोलकर।
- देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार से पुस्तक की पूजा करें।
- शापोद्धार मंत्र का पाठ के आरंभ और अंत में सात-सात बार जप करें, और उसके बाद उत्कीलन मंत्र का आरंभ और अंत में इक्कीस-इक्कीस बार।
- फिर नीचे दिए क्रम से अंगों सहित पाठ करें — कवच, अर्गला, कीलक, रात्रिसूक्त और अथर्वशीर्ष, फिर तेरह अध्याय, फिर देवीसूक्त, तीनों रहस्य और क्षमा-प्रार्थना।
आचमन के चार मंत्र
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा ।
शापोद्धार मंत्र (आरंभ और अंत में 7-7 बार)
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा ।
उत्कीलन मंत्र (आरंभ और अंत में 21-21 बार)
ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा ।
सप्तशती के छह अंग — कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य — माने गए हैं, पर इनके क्रम में मतभेद है: चिदम्बरसंहिता में पहले अर्गला, फिर कीलक और अंत में कवच का विधान है; योगरत्नावली कवच को बीज, अर्गला को शक्ति और कीलक को कीलक मानकर इसी क्रम से पढ़ने को कहती है। यह विधि और ये मंत्र गीता प्रेस की पाठ-विधि से हैं, जैसी द्रिक पंचांग पर प्रकाशित है; शापोद्धार के और भी प्रकार प्रचलित हैं।
