देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र

श्रीदुर्गासप्तशती का अंग · परिशिष्ट

12 श्लोक — मूल संस्कृत, IAST और सरल हिंदी अर्थ के साथ।

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र में

बारह श्लोकों की यह स्तुति परंपरा से आदि शंकराचार्य की रचना मानी जाती है। इसकी टेक "कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति" — पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती — माँ के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव है।

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र पाठ-विधि के संकल्प में गिनाए गए अंगों में नहीं है, पर सप्तशती की पुस्तकों में परिशिष्ट के रूप में साथ छपता और पढ़ा जाता है।

॥ अथ देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् ॥

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः । न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥1॥

na mantraṃ no yantraṃ tadapi ca na jāne stutimaho na cāhvānaṃ dhyānaṃ tadapi ca na jāne stutikathāḥ | na jāne mudrāste tadapi ca na jāne vilapanaṃ paraṃ jāne mātastvadanusaraṇaṃ kleśaharaṇam ||1||

माँ! मैं न मंत्र जानता हूँ, न यंत्र; अहो, स्तुति करना भी नहीं जानता। न आवाहन जानता हूँ, न ध्यान; स्तुति की कथाएँ भी नहीं जानता। न तुम्हारी मुद्राएँ जानता हूँ, न तुम्हारे सामने रोकर पुकारना। बस इतना जानता हूँ कि तुम्हारी शरण सब क्लेश हर लेती है।

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् । तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥2॥

vidherajñānena draviṇaviraheṇālasatayā vidheyāśakyatvāttava caraṇayoryā cyutirabhūt | tadetat kṣantavyaṃ janani sakaloddhāriṇi śive kuputro jāyeta kvacidapi kumātā na bhavati ||2||

विधि न जानने से, धन के अभाव से, आलस्य से और विधि निभा न पाने से तुम्हारे चरणों की सेवा में जो चूक हुई है — हे सबका उद्धार करने वाली कल्याणमयी माँ, उसे क्षमा करो। पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती।

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः । मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥3॥

pṛthivyāṃ putrāste janani bahavaḥ santi saralāḥ paraṃ teṣāṃ madhye viralataralo'haṃ tava sutaḥ | madīyo'yaṃ tyāgaḥ samucitamidaṃ no tava śive kuputro jāyeta kvacidapi kumātā na bhavati ||3||

माँ! पृथ्वी पर तुम्हारे सीधे-सादे पुत्र बहुत हैं, पर उनमें मैं बड़ा ही चंचल पुत्र हूँ। हे शिवे, फिर भी मुझे त्याग देना तुम्हें उचित नहीं है — पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती।

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया । तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥4॥

jaganmātarmātastava caraṇasevā na racitā na vā dattaṃ devi draviṇamapi bhūyastava mayā | tathāpi tvaṃ snehaṃ mayi nirupamaṃ yatprakuruṣe kuputro jāyeta kvacidapi kumātā na bhavati ||4||

हे जगन्माता! मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं की, और न ही तुम्हें बहुत धन अर्पित किया। फिर भी तुम मुझ पर अनुपम स्नेह करती हो — क्योंकि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती।

परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि । इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥5॥

parityaktā devā vividhavidhasevākulatayā mayā pañcāśīteradhikamapanīte tu vayasi | idānīṃ cenmātastava yadi kṛpā nāpi bhavitā nirālambo lambodarajanani kaṃ yāmi śaraṇam ||5||

अनेक प्रकार की सेवा-विधियों से घबराकर मैंने दूसरे देवताओं को छोड़ दिया, और अब मेरी आयु पचासी वर्ष से भी अधिक बीत चुकी है। हे गणेश-जननी! अब भी यदि तुम्हारी कृपा न हुई, तो मैं निराश्रय किसकी शरण जाऊँ?

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः । तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥6॥

śvapāko jalpāko bhavati madhupākopamagirā nirātaṅko raṅko viharati ciraṃ koṭikanakaiḥ | tavāparṇe karṇe viśati manuvarṇe phalamidaṃ janaḥ ko jānīte janani japanīyaṃ japavidhau ||6||

हे अपर्णा! तुम्हारे मंत्र का एक अक्षर भी कान में पड़ जाए, तो सबसे उपेक्षित व्यक्ति भी मधु जैसी मीठी वाणी वाला वक्ता बन जाता है, और निर्धन भी निश्चिंत होकर करोड़ों स्वर्ण-मुद्राओं के साथ लंबे समय तक जीवन बिताता है। माँ! तो जो विधि से तुम्हारा जप करता है, उसके फल को कौन जान सकता है?

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः । कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥7॥

citābhasmālepo garalamaśanaṃ dikpaṭadharo jaṭādhārī kaṇṭhe bhujagapatihārī paśupatiḥ | kapālī bhūteśo bhajati jagadīśaikapadavīṃ bhavāni tvatpāṇigrahaṇaparipāṭīphalamidam ||7||

जो चिता की भस्म लगाते हैं, विष का भोजन करते हैं, दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं, जो जटा धारण करते हैं, गले में सर्पराज का हार पहनते हैं, कपाल लिए रहते हैं और भूतों के स्वामी हैं — वे पशुपति शिव भी "जगदीश" की अद्वितीय पदवी पाते हैं। हे भवानी, यह तुम्हारा पाणिग्रहण करने का ही फल है।

न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः । अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥8॥

na mokṣasyākāṅkṣā bhavavibhavavāñchāpi ca na me na vijñānāpekṣā śaśimukhi sukhecchāpi na punaḥ | atastvāṃ saṃyāce janani jananaṃ yātu mama vai mṛḍānī rudrāṇī śiva śiva bhavānīti japataḥ ||8||

माँ! मुझे न मोक्ष की इच्छा है, न संसार के वैभव की चाह; हे चन्द्रमुखी, न ज्ञान की अपेक्षा है, न सुख की कामना। इसलिए तुमसे बस यही माँगता हूँ कि मेरे जन्म "मृडानी, रुद्राणी, शिव-शिव, भवानी" — इन नामों का जप करते हुए बीतें।

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः । श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥9॥

nārādhitāsi vidhinā vividhopacāraiḥ kiṃ rukṣacintanaparairna kṛtaṃ vacobhiḥ | śyāme tvameva yadi kiñcana mayyanāthe dhatse kṛpāmucitamamba paraṃ tavaiva ||9||

हे श्यामा! मैंने अनेक उपचारों से विधिपूर्वक तुम्हारी आराधना नहीं की; रूखे चिंतन में लगी मेरी वाणी ने क्या-क्या अनुचित नहीं कहा! फिर भी यदि तुम मुझ अनाथ पर कुछ कृपा करती हो, तो हे अम्ब, यह तुम्हारे ही योग्य है।

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि । नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥10॥

āpatsu magnaḥ smaraṇaṃ tvadīyaṃ karomi durge karuṇārṇaveśi | naitacchaṭhatvaṃ mama bhāvayethāḥ kṣudhātṛṣārtā jananīṃ smaranti ||10||

हे दुर्गे! हे करुणा-सागर की स्वामिनी! विपत्ति में डूबकर ही मैं तुम्हारा स्मरण करता हूँ — इसे मेरी धूर्तता मत समझना। भूख-प्यास से व्याकुल बच्चे माँ को ही याद करते हैं।

जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि । अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥11॥

jagadamba vicitramatra kiṃ paripūrṇā karuṇāsti cenmayi | aparādhaparamparāparaṃ na hi mātā samupekṣate sutam ||11||

हे जगदम्बा! इसमें आश्चर्य क्या है कि मुझ पर तुम्हारी पूरी करुणा है? पुत्र अपराध पर अपराध करता जाए, तब भी माता उसकी उपेक्षा नहीं करती।

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि । एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥12॥

matsamaḥ pātakī nāsti pāpaghnī tvatsamā na hi | evaṃ jñātvā mahādevi yathāyogyaṃ tathā kuru ||12||

मेरे समान कोई पापी नहीं है, और तुम्हारे समान कोई पाप हरने वाली नहीं है। हे महादेवी, यह जानकर जैसा उचित हो, वैसा करो।

पाठ और अर्थ का स्रोत

मूल पाठ: संस्कृत विकिस्रोत (CC BY-SA 4.0) के आधार पर; श्लोकों का क्रम और विभाजन द्रिक पंचांग के पाठ से (जो गीता प्रेस का क्रम मानता है), और जहाँ उपलब्ध हो वहाँ sanskritdocuments.org से भी शब्द-दर-शब्द मिलाया गया है; तीनों रहस्यों में द्रिक, वाचस्पत्यम् (विकिस्रोत) और स्तोत्रनिधि का बहुमत लिया गया है। स्रोतों में जो भी अंतर मिला, वह हाथ से जाँचा गया है। अर्थ: मूल संस्कृत से; ऋग्वेद के सूक्तों में R. T. H. Griffith (1896) के अनुवाद से मिलाकर। CC BY-SA 4.0

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न