ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त

श्रीदुर्गासप्तशती का अंग · पाठ के बाद

8 श्लोक — मूल संस्कृत, IAST और सरल हिंदी अर्थ के साथ।

ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त में

ऋग्वेद (मण्डल 10, सूक्त 125) — वाक् आम्भृणी का सूक्त, जिसमें देवी स्वयं कहती हैं कि वे ही सब देवताओं को धारण करती हैं, वे ही राष्ट्र की स्वामिनी हैं और सारे भुवन उन्हीं से व्याप्त हैं। तेरह अध्यायों के बाद पढ़ा जाता है।

तेरह अध्यायों के बाद ये अंग पढ़े जाते हैं: ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त → प्राधानिक रहस्य → वैकृतिक रहस्य → मूर्ति रहस्य → क्षमा-प्रार्थना। ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त इनमें पहला है।

॥ अथ ऋग्वेदोक्तं देवीसूक्तम् ॥

विनियोग / ध्यान

ॐ अहमित्यष्टर्चस्य सूक्तस्य वागाम्भृणी ऋषिः सच्चित्सुखात्मकः सर्वगतः परमात्मा देवता द्वितीयाया ॠचो जगती शिष्टानां त्रिष्टुप् छन्दः देवीमाहात्म्यपाठे विनियोगः । ॐ सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्चतुर्भिर्भुजैः शङ्खं चक्रधनुःशरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता । आमुक्ताङ्गदहारकङ्कणरणत्काञ्चीरणन्नूपुरा दुर्गा दुर्गतिहारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्कुण्डला

oṃ ahamityaṣṭarcasya sūktasya vāgāmbhṛṇī ṛṣiḥ saccitsukhātmakaḥ sarvagataḥ paramātmā devatā dvitīyāyā ṝco jagatī śiṣṭānāṃ triṣṭup chandaḥ devīmāhātmyapāṭhe viniyogaḥ | oṃ siṃhasthā śaśiśekharā marakataprakhyaiścaturbhirbhujaiḥ śaṅkhaṃ cakradhanuḥśarāṃśca dadhatī netraistribhiḥ śobhitā | āmuktāṅgadahārakaṅkaṇaraṇatkāñcīraṇannūpurā durgā durgatihāriṇī bhavatu no ratnollasatkuṇḍalā

"अहम्" से शुरू होने वाले इस आठ ऋचाओं के सूक्त की ऋषि वाक् आम्भृणी हैं, देवता सत्-चित्-आनंद स्वरूप सर्वव्यापी परमात्मा हैं; दूसरी ऋचा का छन्द जगती और बाकी का त्रिष्टुप् है। देवी-माहात्म्य के पाठ में इसका विनियोग है। (ध्यान:) जो सिंह पर विराजमान हैं, जिनके मस्तक पर चन्द्रमा है, जो मरकत मणि जैसी हरी आभा वाली चार भुजाओं में शंख, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं और तीन नेत्रों से शोभित हैं; जिनके अंगों में बाजूबंद, हार, कंगन, खनकती करधनी और रुनझुन करते नूपुर हैं, और जिनके कानों में रत्नों से चमकते कुंडल हैं — वे दुर्गति हरने वाली दुर्गा हमारा कल्याण करें।

ॐ अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा ॥1॥

oṃ ahaṃ rudrebhirvasubhiścarāmyahamādityairuta viśvadevaiḥ | ahaṃ mitrāvaruṇobhā bibharmyahamindrāgnī ahamaśvinobhā ||1||

मैं रुद्रों और वसुओं के साथ विचरती हूँ, आदित्यों और विश्वेदेवों के साथ भी। मैं मित्र और वरुण — दोनों को धारण करती हूँ, इन्द्र और अग्नि को, और दोनों अश्विनीकुमारों को भी।

अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम् । अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते ॥2॥

ahaṃ somamāhanasaṃ bibharmyahaṃ tvaṣṭāramuta pūṣaṇaṃ bhagam | ahaṃ dadhāmi draviṇaṃ haviṣmate suprāvye yajamānāya sunvate ||2||

मैं उमड़ते हुए सोम को धारण करती हूँ, और त्वष्टा, पूषा व भग को भी। जो यजमान हवि लेकर देवताओं को तृप्त करता और सोम-रस निकालता है, उसे मैं धन देती हूँ।

अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् । तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ॥3॥

ahaṃ rāṣṭrī saṃgamanī vasūnāṃ cikituṣī prathamā yajñiyānām | tāṃ mā devā vyadadhuḥ purutrā bhūristhātrāṃ bhūryāveśayantīm ||3||

मैं राष्ट्र की स्वामिनी हूँ, धन-संपदा को इकट्ठा करने वाली, ज्ञान वाली, और यज्ञ के योग्य देवताओं में प्रथम हूँ। देवताओं ने मुझे अनेक स्थानों पर स्थापित किया है — मैं बहुत जगह रहती हूँ और बहुत प्राणियों में प्रवेश करती हूँ।

मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम् । अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि ॥4॥

mayā so annamatti yo vipaśyati yaḥ prāṇiti ya īṃ śṛṇotyuktam | amantavo māṃ ta upa kṣiyanti śrudhi śruta śraddhivaṃ te vadāmi ||4||

जो देखता है, जो साँस लेता है, जो कही हुई बात सुनता है — वह मेरी ही शक्ति से अन्न खाता है। जो मुझे नहीं जानते, वे भी मेरे ही आश्रय में रहते हैं। हे श्रोता, सुनो — मैं तुम्हें श्रद्धा के योग्य सत्य कहती हूँ।

अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः । यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ॥5॥

ahameva svayamidaṃ vadāmi juṣṭaṃ devebhiruta mānuṣebhiḥ | yaṃ kāmaye taṃ tamugraṃ kṛṇomi taṃ brahmāṇaṃ tamṛṣiṃ taṃ sumedhām ||5||

मैं स्वयं ही यह सत्य कहती हूँ, जिसका देवता और मनुष्य दोनों आदर करते हैं। मैं जिसे चाहती हूँ, उसे बलवान बना देती हूँ — उसे ब्रह्मा, ऋषि और उत्तम बुद्धि वाला बना देती हूँ।

अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ । अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश ॥6॥

ahaṃ rudrāya dhanurā tanomi brahmadviṣe śarave hantavā u | ahaṃ janāya samadaṃ kṛṇomyahaṃ dyāvāpṛthivī ā viveśa ||6||

ज्ञान और भक्ति से द्वेष करने वाले को मारने के लिए मैं ही रुद्र का धनुष चढ़ाती हूँ। मैं ही लोगों के लिए संग्राम रचती हूँ, और मैंने ही आकाश और पृथ्वी में प्रवेश किया है।

अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे । ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वो तामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि ॥7॥

ahaṃ suve pitaramasya mūrdhanmama yonirapsvantaḥ samudre | tato vi tiṣṭhe bhuvanānu viśvo tāmūṃ dyāṃ varṣmaṇopa spṛśāmi ||7||

इस जगत के शिखर पर मैं पिता (आकाश) को जन्म देती हूँ; मेरा उद्गम जल में, समुद्र के भीतर है। वहीं से मैं सब भुवनों में फैलती हूँ, और अपने विशाल शरीर से उस आकाश को छूती हूँ।

अहमेव वात इव प्रवाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा । परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना संबभूव ॥8॥

ahameva vāta iva pravāmyārabhamāṇā bhuvanāni viśvā | paro divā para enā pṛthivyaitāvatī mahinā saṃbabhūva ||8||

सब भुवनों की रचना करती हुई मैं ही वायु की तरह बहती हूँ। आकाश से भी परे और इस पृथ्वी से भी परे — अपनी महिमा से मैं इतनी विशाल हो गई हूँ।

पाठ और अर्थ का स्रोत

मूल पाठ: संस्कृत विकिस्रोत (CC BY-SA 4.0) के आधार पर; श्लोकों का क्रम और विभाजन द्रिक पंचांग के पाठ से (जो गीता प्रेस का क्रम मानता है), और जहाँ उपलब्ध हो वहाँ sanskritdocuments.org से भी शब्द-दर-शब्द मिलाया गया है; तीनों रहस्यों में द्रिक, वाचस्पत्यम् (विकिस्रोत) और स्तोत्रनिधि का बहुमत लिया गया है। स्रोतों में जो भी अंतर मिला, वह हाथ से जाँचा गया है। अर्थ: मूल संस्कृत से; ऋग्वेद के सूक्तों में R. T. H. Griffith (1896) के अनुवाद से मिलाकर। CC BY-SA 4.0

ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न