प्राधानिक रहस्य

श्रीदुर्गासप्तशती का अंग · पाठ के बाद

31 श्लोक — मूल संस्कृत, IAST और सरल हिंदी अर्थ के साथ।

प्राधानिक रहस्य में

राजा सुरथ मेधा ऋषि से देवी का मूल (प्रधान) स्वरूप पूछते हैं। ऋषि बताते हैं कि सबकी आदि त्रिगुणमयी महालक्ष्मी हैं; उन्हीं से तमोगुण से महाकाली और सत्त्वगुण से महासरस्वती प्रकट हुईं, और तीनों से ब्रह्मा-लक्ष्मी, रुद्र-त्रयी और विष्णु-गौरी के जोड़े — जिनसे सृष्टि, पालन और संहार चलते हैं।

तेरह अध्यायों के बाद ये अंग पढ़े जाते हैं: ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त → प्राधानिक रहस्य → वैकृतिक रहस्य → मूर्ति रहस्य → क्षमा-प्रार्थना। प्राधानिक रहस्य इनमें दूसरा है।

॥ अथ प्राधानिकं रहस्यम् ॥

विनियोग / ध्यान

ॐ अस्य श्रीसप्तशतीरहस्यत्रयस्य नारायण ऋषिरनुष्टुप्छन्दः महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता यथोक्तफलावाप्त्यर्थं जपे विनियोगः।

oṃ asya śrīsaptaśatīrahasyatrayasya nārāyaṇa ṛṣiranuṣṭupchandaḥ mahākālīmahālakṣmīmahāsarasvatyo devatā yathoktaphalāvāptyarthaṃ jape viniyogaḥ|

इस श्री सप्तशती-रहस्यत्रय (तीनों रहस्यों) के ऋषि नारायण हैं, छन्द अनुष्टुप् है, और देवता महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती हैं। बताए गए फल की प्राप्ति के लिए जप में इसका विनियोग है।

राजोवाच

भगवन्नवतारा मे चण्डिकायास्त्वयोदिताः । एतेषां प्रकृतिं ब्रह्मन् प्रधानं वक्तुमर्हसि ॥1॥

bhagavannavatārā me caṇḍikāyāstvayoditāḥ | eteṣāṃ prakṛtiṃ brahman pradhānaṃ vaktumarhasi ||1||

हे ब्रह्मन्! आपने मुझे चण्डिका के अवतार बताए। अब इन सबकी मूल प्रकृति — उनका प्रधान (मूल) रूप — बताने की कृपा करें।

आराध्यं यन्मया देव्याः स्वरूपं येन च द्विज । विधिना ब्रूहि सकलं यथावत्प्रणतस्य मे ॥2॥

ārādhyaṃ yanmayā devyāḥ svarūpaṃ yena ca dvija | vidhinā brūhi sakalaṃ yathāvatpraṇatasya me ||2||

हे द्विज! मुझे देवी के किस स्वरूप की, किस विधि से आराधना करनी चाहिए — यह सब मुझ शरणागत को यथावत् बताइए।

ऋषिरुवाच

इदं रहस्यं परममनाख्येयं प्रचक्षते । भक्तोऽसीति न मे किञ्चित्तवावाच्यं नराधिप ॥3॥

idaṃ rahasyaṃ paramamanākhyeyaṃ pracakṣate | bhakto'sīti na me kiñcittavāvācyaṃ narādhipa ||3||

यह रहस्य परम है और किसी से कहने योग्य नहीं माना जाता। पर हे नराधिप, तुम मेरे भक्त हो, इसलिए तुमसे कहने योग्य न हो — ऐसा मेरे पास कुछ नहीं।

सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणा परमेश्वरी । लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा सा व्याप्य कृत्स्नं व्यवस्थिता ॥4॥

sarvasyādyā mahālakṣmīstriguṇā parameśvarī | lakṣyālakṣyasvarūpā sā vyāpya kṛtsnaṃ vyavasthitā ||4||

सबकी आदि महालक्ष्मी हैं — तीनों गुणों वाली परमेश्वरी। वे दृश्य भी हैं और अदृश्य भी, और सारे जगत को व्याप्त करके स्थित हैं।

मातुलुङ्गं गदां खेटं पानपात्रं च बिभ्रती । नागं लिङ्गं च योनिं च बिभ्रती नृप मूर्धनि ॥5॥

mātuluṅgaṃ gadāṃ kheṭaṃ pānapātraṃ ca bibhratī | nāgaṃ liṅgaṃ ca yoniṃ ca bibhratī nṛpa mūrdhani ||5||

हे राजन्! वे हाथों में बिजौरा फल, गदा, ढाल और पानपात्र धारण करती हैं, और मस्तक पर नाग, लिंग और योनि धारण करती हैं।

तप्तकाञ्चनवर्णाभा तप्तकाञ्चनभूषणा । शून्यं तदखिलं स्वेन पूरयामास तेजसा ॥6॥

taptakāñcanavarṇābhā taptakāñcanabhūṣaṇā | śūnyaṃ tadakhilaṃ svena pūrayāmāsa tejasā ||6||

उनकी आभा तपे हुए सोने जैसी है और आभूषण भी तपे सोने के हैं। उन्होंने अपने तेज से उस सारे शून्य को भर दिया।

शून्यं तदखिलं लोकं विलोक्य परमेश्वरी । बभार रूपमपरं तमसा केवलेन हि ॥7॥

śūnyaṃ tadakhilaṃ lokaṃ vilokya parameśvarī | babhāra rūpamaparaṃ tamasā kevalena hi ||7||

उस सारे लोक को शून्य देखकर परमेश्वरी ने केवल तमोगुण से एक दूसरा रूप धारण किया।

पाठ-भेद — द्रिक (गीता प्रेस क्रम) का पाठ: "बभार परमं रूपं"

सा भिन्नाञ्जनसङ्काशा दंष्ट्राङ्कितवरानना । विशाललोचना नारी बभूव तनुमध्यमा ॥8॥

sā bhinnāñjanasaṅkāśā daṃṣṭrāṅkitavarānanā | viśālalocanā nārī babhūva tanumadhyamā ||8||

वह रूप खान से निकले अंजन (काजल) जैसा काला था, सुंदर मुख दाढ़ों से युक्त था, नेत्र विशाल थे और कमर पतली — वे ऐसी नारी बनीं।

खड्गपात्रशिरःखेटैरलङ्कृतचतुर्भुजा । कबन्धहारं शिरसा बिभ्राणा हि शिरःस्रजम् ॥9॥

khaḍgapātraśiraḥkheṭairalaṅkṛtacaturbhujā | kabandhahāraṃ śirasā bibhrāṇā hi śiraḥsrajam ||9||

उनकी चार भुजाएँ खड्ग, पात्र, (कटे) सिर और ढाल से सुशोभित थीं। वे धड़ों का हार और सिर पर मुंडों की माला धारण किए थीं।

सा प्रोवाच महालक्ष्मीं तामसी प्रमदोत्तमा । नाम कर्म च मे मातर्देहि तुभ्यं नमो नमः ॥10॥

sā provāca mahālakṣmīṃ tāmasī pramadottamā | nāma karma ca me mātardehi tubhyaṃ namo namaḥ ||10||

उस तामसी श्रेष्ठ नारी ने महालक्ष्मी से कहा — "माँ! मुझे नाम और कर्म दो। तुम्हें बार-बार नमस्कार है।"

पाठ-भेद — यह श्लोक वाचस्पत्यम् (विकिस्रोत) और स्तोत्रनिधि के पाठ में नहीं है; द्रिक (गीता प्रेस क्रम) में है।

तां प्रोवाच महालक्ष्मीस्तामसीं प्रमदोत्तमाम् । ददामि तव नामानि यानि कर्माणि तानि ते ॥11॥

tāṃ provāca mahālakṣmīstāmasīṃ pramadottamām | dadāmi tava nāmāni yāni karmāṇi tāni te ||11||

तब महालक्ष्मी ने उस तामसी श्रेष्ठ नारी से कहा — "मैं तुम्हें नाम देती हूँ, और जो तुम्हारे कर्म हैं, वे भी।"

महामाया महाकाली महामारी क्षुधा तृषा । निद्रा तृष्णा चैकवीरा कालरात्रिर्दुरत्यया ॥12॥

mahāmāyā mahākālī mahāmārī kṣudhā tṛṣā | nidrā tṛṣṇā caikavīrā kālarātrirduratyayā ||12||

"महामाया, महाकाली, महामारी, क्षुधा, तृषा, निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, कालरात्रि और दुरत्यया (जिसे पार करना कठिन है) —"

इमानि तव नामानि प्रतिपाद्यानि कर्मभिः । एभिः कर्माणि ते ज्ञात्वा योऽधीते सोऽश्नुते सुखम् ॥13॥

imāni tava nāmāni pratipādyāni karmabhiḥ | ebhiḥ karmāṇi te jñātvā yo'dhīte so'śnute sukham ||13||

"— ये तुम्हारे नाम हैं, जो तुम्हारे कर्मों से प्रकट होंगे। इन नामों से तुम्हारे कर्मों को जानकर जो इनका पाठ करता है, वह सुख पाता है।"

तामित्युक्त्वा महालक्ष्मीः स्वरूपमपरं नृप । सत्त्वाख्येनातिशुद्धेन गुणेनेन्दुप्रभं दधौ ॥14॥

tāmityuktvā mahālakṣmīḥ svarūpamaparaṃ nṛpa | sattvākhyenātiśuddhena guṇenenduprabhaṃ dadhau ||14||

हे राजन्! उनसे ऐसा कहकर महालक्ष्मी ने अत्यंत शुद्ध सत्त्व-गुण से चन्द्रमा जैसी आभा वाला एक दूसरा रूप धारण किया।

अक्षमालाङ्कुशधरा वीणापुस्तकधारिणी । सा बभूव वरा नारी नामान्यस्यै च सा ददौ ॥15॥

akṣamālāṅkuśadharā vīṇāpustakadhāriṇī | sā babhūva varā nārī nāmānyasyai ca sā dadau ||15||

अक्षमाला, अंकुश, वीणा और पुस्तक धारण किए वे एक श्रेष्ठ नारी बनीं, और महालक्ष्मी ने उन्हें भी नाम दिए।

महाविद्या महावाणी भारती वाक् सरस्वती । आर्या ब्राह्मी कामधेनुर्वेदगर्भा सुरेश्वरी ॥16॥

mahāvidyā mahāvāṇī bhāratī vāk sarasvatī | āryā brāhmī kāmadhenurvedagarbhā sureśvarī ||16||

महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती, आर्या, ब्राह्मी, कामधेनु, वेदगर्भा और सुरेश्वरी।

पाठ-भेद — द्रिक का पाठ: "वेदगर्भा च धीश्वरी"

अथोवाच महालक्ष्मीर्महाकालीं सरस्वतीम् । युवां जनयतां देव्यौ मिथुने स्वानुरूपतः ॥17॥

athovāca mahālakṣmīrmahākālīṃ sarasvatīm | yuvāṃ janayatāṃ devyau mithune svānurūpataḥ ||17||

फिर महालक्ष्मी ने महाकाली और सरस्वती से कहा — "हे देवियो! तुम दोनों अपने-अपने अनुरूप एक-एक जोड़ा (स्त्री-पुरुष) उत्पन्न करो।"

इत्युक्त्वा ते महालक्ष्मीः ससर्ज मिथुनं स्वयम् । हिरण्यगर्भौ रुचिरौ स्त्रीपुंसौ कमलासनौ ॥18॥

ityuktvā te mahālakṣmīḥ sasarja mithunaṃ svayam | hiraṇyagarbhau rucirau strīpuṃsau kamalāsanau ||18||

उनसे ऐसा कहकर महालक्ष्मी ने स्वयं भी एक जोड़ा रचा — सुनहरे गर्भ वाले, सुंदर, कमल पर बैठे स्त्री और पुरुष।

ब्रह्मन् विधे विरिञ्चेति धातरित्याह तं नरम् । श्रीः पद्मे कमले लक्ष्मीत्याह माता स्त्रियं च ताम् ॥19॥

brahman vidhe viriñceti dhātarityāha taṃ naram | śrīḥ padme kamale lakṣmītyāha mātā striyaṃ ca tām ||19||

माता ने उस पुरुष को "ब्रह्मन्, विधे, विरिञ्च, धाता" कहकर पुकारा, और उस स्त्री को "श्री, पद्मा, कमला, लक्ष्मी" कहकर।

महाकाली भारती च मिथुने सृजतः सह । एतयोरपि रूपाणि नामानि च वदामि ते ॥20॥

mahākālī bhāratī ca mithune sṛjataḥ saha | etayorapi rūpāṇi nāmāni ca vadāmi te ||20||

महाकाली और भारती (सरस्वती) ने भी साथ-साथ एक-एक जोड़ा रचा। उनके रूप और नाम भी मैं तुम्हें बताता हूँ।

नीलकण्ठं रक्तबाहुं श्वेताङ्गं चन्द्रशेखरम् । जनयामास पुरुषं महाकाली सितां स्त्रियम् ॥21॥

nīlakaṇṭhaṃ raktabāhuṃ śvetāṅgaṃ candraśekharam | janayāmāsa puruṣaṃ mahākālī sitāṃ striyam ||21||

महाकाली ने नीले कंठ, लाल भुजाओं, श्वेत अंगों वाले और मस्तक पर चन्द्रमा धारण करने वाले पुरुष को, और एक श्वेत वर्ण की स्त्री को जन्म दिया।

स रुद्रः शङ्करः स्थाणुः कपर्दी च त्रिलोचनः । त्रयी विद्या कामधेनुः सा स्त्री भाषाक्षरा स्वरा ॥22॥

sa rudraḥ śaṅkaraḥ sthāṇuḥ kapardī ca trilocanaḥ | trayī vidyā kāmadhenuḥ sā strī bhāṣākṣarā svarā ||22||

वह पुरुष रुद्र, शंकर, स्थाणु, कपर्दी और त्रिलोचन कहलाया; और वह स्त्री त्रयी, विद्या, कामधेनु, भाषा, अक्षरा और स्वरा।

सरस्वती स्त्रियं गौरीं कृष्णं च पुरुषं नृप । जनयामास नामानि तयोरपि वदामि ते ॥23॥

sarasvatī striyaṃ gaurīṃ kṛṣṇaṃ ca puruṣaṃ nṛpa | janayāmāsa nāmāni tayorapi vadāmi te ||23||

हे राजन्! सरस्वती ने गौर वर्ण की स्त्री और श्याम वर्ण के पुरुष को जन्म दिया। उनके नाम भी मैं तुम्हें बताता हूँ।

विष्णुः कृष्णो हृषीकेशो वासुदेवो जनार्दनः । उमा गौरी सती चण्डी सुन्दरी सुभगा शिवा ॥24॥

viṣṇuḥ kṛṣṇo hṛṣīkeśo vāsudevo janārdanaḥ | umā gaurī satī caṇḍī sundarī subhagā śivā ||24||

वह पुरुष विष्णु, कृष्ण, हृषीकेश, वासुदेव और जनार्दन कहलाया; और वह स्त्री उमा, गौरी, सती, चण्डी, सुन्दरी, सुभगा और शिवा।

एवं युवतयः सद्यः पुरुषत्वं प्रपेदिरे । चक्षुष्मन्तो नु पश्यन्ति नेतरेऽतद्विदो जनाः ॥25॥

evaṃ yuvatayaḥ sadyaḥ puruṣatvaṃ prapedire | cakṣuṣmanto nu paśyanti netare'tadvido janāḥ ||25||

इस प्रकार तीनों युवतियाँ तुरंत पुरुष-रूप को भी प्राप्त हुईं (एक ही शक्ति दोनों रूपों में है)। इसे ज्ञान-दृष्टि वाले ही देखते हैं; जो इसे नहीं जानते, वे नहीं देख पाते।

ब्रह्मणे प्रददौ पत्नीं महालक्ष्मीर्नृप त्रयीम् । रुद्राय गौरीं वरदां वासुदेवाय च श्रियम् ॥26॥

brahmaṇe pradadau patnīṃ mahālakṣmīrnṛpa trayīm | rudrāya gaurīṃ varadāṃ vāsudevāya ca śriyam ||26||

हे राजन्! महालक्ष्मी ने ब्रह्मा को त्रयी (सरस्वती) पत्नी रूप में दी, रुद्र को वर देने वाली गौरी, और वासुदेव को श्री (लक्ष्मी)।

स्वरया सह सम्भूय विरिञ्चोऽण्डमजीजनत् । बिभेद भगवान् रुद्रस्तद् गौर्या सह वीर्यवान् ॥27॥

svarayā saha sambhūya viriñco'ṇḍamajījanat | bibheda bhagavān rudrastad gauryā saha vīryavān ||27||

स्वरा (सरस्वती) के साथ मिलकर ब्रह्मा ने ब्रह्मांड-रूपी अंड को उत्पन्न किया, और बलवान भगवान रुद्र ने गौरी के साथ उसका भेदन किया।

अण्डमध्ये प्रधानादि कार्यजातमभून्नृप । महाभूतात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥28॥

aṇḍamadhye pradhānādi kāryajātamabhūnnṛpa | mahābhūtātmakaṃ sarvaṃ jagatsthāvarajaṅgamam ||28||

हे राजन्! उस अंड के भीतर प्रधान (प्रकृति) आदि से होने वाला सारा कार्य-जगत प्रकट हुआ — पंच महाभूतों से बना सारा स्थावर-जंगम जगत।

पुपोष पालयामास तल्लक्ष्म्या सह केशवः । सञ्जहार जगत्सर्वं सह गौर्या महेश्वरः ॥29॥

pupoṣa pālayāmāsa tallakṣmyā saha keśavaḥ | sañjahāra jagatsarvaṃ saha gauryā maheśvaraḥ ||29||

लक्ष्मी के साथ केशव (विष्णु) ने उसका पोषण और पालन किया, और गौरी के साथ महेश्वर ने सारे जगत का संहार किया।

पाठ-भेद — दूसरी पंक्ति ("सञ्जहार जगत्सर्वं…") वाचस्पत्यम् और स्तोत्रनिधि में नहीं है।

महालक्ष्मीर्महाराज सर्वसत्त्वमयीश्वरी । निराकारा च साकारा सैव नानाभिधानभृत् ॥30॥

mahālakṣmīrmahārāja sarvasattvamayīśvarī | nirākārā ca sākārā saiva nānābhidhānabhṛt ||30||

हे महाराज! महालक्ष्मी ही सब सत्त्वों (प्राणियों) में व्याप्त ईश्वरी हैं। वही निराकार भी हैं और साकार भी, और वही अनेक नाम धारण करती हैं।

पाठ-भेद — वाचस्पत्यम् व स्तोत्रनिधि में पहली पंक्ति: "महालक्ष्मीरेवमजा राजन् सर्वेश्वरेश्वरी"।

नामान्तरैर्निरूप्यैषा नाम्ना नान्येन केनचित् ॥31॥

nāmāntarairnirūpyaiṣā nāmnā nānyena kenacit ||31||

इनका निरूपण अलग-अलग नामों से ही होता है — किसी एक नाम से नहीं।

पाठ और अर्थ का स्रोत

मूल पाठ: संस्कृत विकिस्रोत (CC BY-SA 4.0) के आधार पर; श्लोकों का क्रम और विभाजन द्रिक पंचांग के पाठ से (जो गीता प्रेस का क्रम मानता है), और जहाँ उपलब्ध हो वहाँ sanskritdocuments.org से भी शब्द-दर-शब्द मिलाया गया है; तीनों रहस्यों में द्रिक, वाचस्पत्यम् (विकिस्रोत) और स्तोत्रनिधि का बहुमत लिया गया है। स्रोतों में जो भी अंतर मिला, वह हाथ से जाँचा गया है। अर्थ: मूल संस्कृत से; ऋग्वेद के सूक्तों में R. T. H. Griffith (1896) के अनुवाद से मिलाकर। CC BY-SA 4.0

प्राधानिक रहस्य — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न