॥ मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥
ॐ ऐं मार्कण्डेय उवाच ॥1॥ — मार्कण्डेय जी बोले।
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः । निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम ॥2॥
sāvarṇiḥ sūryatanayo yo manuḥ kathyate'ṣṭamaḥ | niśāmaya tadutpattiṃ vistarād gadato mama ||2||
सूर्य के पुत्र सावर्णि, जो आठवें मनु कहे जाते हैं — उनके जन्म की कथा मैं विस्तार से कहता हूँ, ध्यान से सुनो।
महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः । स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः ॥3॥
mahāmāyānubhāvena yathā manvantarādhipaḥ | sa babhūva mahābhāgaḥ sāvarṇistanayo raveḥ ||3||
महामाया के प्रभाव से सूर्य-पुत्र महाभाग सावर्णि किस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी बने, यह सुनो।
स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः । सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले ॥4॥
svārociṣe'ntare pūrvaṃ caitravaṃśasamudbhavaḥ | suratho nāma rājābhūtsamaste kṣitimaṇḍale ||4||
पहले स्वारोचिष मन्वन्तर में चैत्र वंश में जन्मे सुरथ नाम के राजा पूरी पृथ्वी पर राज करते थे।
तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान् । बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ॥5॥
tasya pālayataḥ samyak prajāḥ putrānivaurasān | babhūvuḥ śatravo bhūpāḥ kolāvidhvaṃsinastadā ||5||
वे प्रजा का पालन अपने पुत्रों की तरह भली-भाँति करते थे। उसी समय कोलाविध्वंसी राजा उनके शत्रु बन गए।
तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः । न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥6॥
tasya tairabhavad yuddhamatiprabaladaṇḍinaḥ | nyūnairapi sa tairyuddhe kolāvidhvaṃsibhirjitaḥ ||6||
अत्यंत बलशाली दंड वाले सुरथ का उनसे युद्ध हुआ, और संख्या में कम होते हुए भी उन कोलाविध्वंसियों ने उन्हें युद्ध में हरा दिया।
ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत् । आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः ॥7॥
tataḥ svapuramāyāto nijadeśādhipo'bhavat | ākrāntaḥ sa mahābhāgastaistadā prabalāribhiḥ ||7||
तब वे अपने नगर लौट आए और केवल अपने देश के राजा रह गए। पर वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओं ने उन पर आक्रमण किया।
अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः । कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः ॥8॥
amātyairbalibhirduṣṭairdurbalasya durātmabhiḥ | kośo balaṃ cāpahṛtaṃ tatrāpi svapure tataḥ ||8||
राजा को दुर्बल देखकर उनके बलवान, दुष्ट और दुरात्मा मंत्रियों ने उनके अपने ही नगर में उनका खज़ाना और सेना छीन ली।
ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः । एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥9॥
tato mṛgayāvyājena hṛtasvāmyaḥ sa bhūpatiḥ | ekākī hayamāruhya jagāma gahanaṃ vanam ||9||
अपना राज्य खोकर वे राजा शिकार के बहाने अकेले घोड़े पर बैठकर घने वन में चले गए।
स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः । प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ॥10॥
sa tatrāśramamadrākṣīd dvijavaryasya medhasaḥ | praśāntaśvāpadākīrṇaṃ muniśiṣyopaśobhitam ||10||
वहाँ उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मण मेधा मुनि का आश्रम देखा, जहाँ हिंसक जीव भी शांत होकर रहते थे और मुनि के शिष्य आश्रम की शोभा बढ़ाते थे।
तस्थौ कंचित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः । इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे ॥11॥
tasthau kaṃcitsa kālaṃ ca muninā tena satkṛtaḥ | itaścetaśca vicaraṃstasminmunivarāśrame ||11||
मुनि ने उनका आदर-सत्कार किया, और वे कुछ समय वहीं रहे। उस श्रेष्ठ आश्रम में इधर-उधर घूमते हुए…
सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः । मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् ॥12॥
so'cintayattadā tatra mamatvākṛṣṭacetanaḥ | matpūrvaiḥ pālitaṃ pūrvaṃ mayā hīnaṃ puraṃ hi tat ||12||
…ममता से खिंचे मन के साथ वे सोचने लगे — जिस नगर का पालन मेरे पूर्वजों ने और फिर मैंने किया, वह अब मुझसे छिन गया।
मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा । न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः ॥13॥
madbhṛtyaistairasadvṛttairdharmataḥ pālyate na vā | na jāne sa pradhāno me śūrahastī sadāmadaḥ ||13||
मेरे वे दुराचारी सेवक उसका पालन धर्म से करते हैं या नहीं, मैं नहीं जानता। मेरा वह प्रधान, वीर और सदा मदमस्त हाथी…
मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते । ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः ॥14॥
mama vairivaśaṃ yātaḥ kān bhogānupalapsyate | ye mamānugatā nityaṃ prasādadhanabhojanaiḥ ||14||
…अब शत्रुओं के वश में चला गया है — वहाँ उसे क्या सुख मिलेगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पाकर सदा मेरे साथ रहते थे…
अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् । असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम् ॥15॥
anuvṛttiṃ dhruvaṃ te'dya kurvantyanyamahībhṛtām | asamyagvyayaśīlaistaiḥ kurvadbhiḥ satataṃ vyayam ||15||
…वे अब निश्चय ही दूसरे राजाओं की सेवा करते होंगे। व्यर्थ ख़र्च करने वाले वे लोग लगातार ख़र्च करते रहेंगे…
सञ्चितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति । एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः ॥16॥
sañcitaḥ so'tiduḥkhena kṣayaṃ kośo gamiṣyati | etaccānyacca satataṃ cintayāmāsa pārthivaḥ ||16||
…तो बड़े कष्ट से जोड़ा गया मेरा ख़ज़ाना ख़ाली हो जाएगा। राजा लगातार यही और ऐसी ही बातें सोचते रहते थे।
तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः । स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः ॥17॥
tatra viprāśramābhyāśe vaiśyamekaṃ dadarśa saḥ | sa pṛṣṭastena kastvaṃ bho hetuścāgamane'tra kaḥ ||17||
वहाँ ब्राह्मण के आश्रम के पास उन्होंने एक वैश्य को देखा और पूछा — भाई, तुम कौन हो? और यहाँ आने का कारण क्या है?
सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम् ॥18॥
saśoka iva kasmāttvaṃ durmanā iva lakṣyase | ityākarṇya vacastasya bhūpateḥ praṇayoditam ||18||
तुम शोक में डूबे और उदास-से क्यों दिखते हो? राजा के प्रेम से कहे ये वचन सुनकर…
प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम् ॥19॥
pratyuvāca sa taṃ vaiśyaḥ praśrayāvanato nṛpam ||19||
…वैश्य ने विनय से झुककर राजा को उत्तर दिया।
वैश्य उवाच ॥20॥ — वैश्य बोला।
समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ॥21॥
samādhirnāma vaiśyo'hamutpanno dhanināṃ kule ||21||
मैं समाधि नाम का वैश्य हूँ, धनवानों के कुल में जन्मा हूँ।
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः । विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम् ॥22॥
putradārairnirastaśca dhanalobhādasādhubhiḥ | vihīnaśca dhanairdāraiḥ putrairādāya me dhanam ||22||
धन के लोभ में पड़े मेरे दुष्ट पुत्रों और पत्नी ने मुझे घर से निकाल दिया है। मेरा धन लेकर उन्होंने मुझे धन, पत्नी और पुत्रों से वंचित कर दिया।
वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः । सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम् ॥23॥
vanamabhyāgato duḥkhī nirastaścāptabandhubhiḥ | so'haṃ na vedmi putrāṇāṃ kuśalākuśalātmikām ||23||
अपने विश्वासी बंधुओं से भी त्यागा हुआ मैं दुखी होकर वन में आ गया हूँ। यहाँ रहकर मैं नहीं जानता कि मेरे पुत्र कुशल से हैं या नहीं।
प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः । किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ॥24॥
pravṛttiṃ svajanānāṃ ca dārāṇāṃ cātra saṃsthitaḥ | kiṃ nu teṣāṃ gṛhe kṣemamakṣemaṃ kiṃ nu sāmpratam ||24||
अपने परिवार और पत्नी का भी हाल मुझे यहाँ पता नहीं। क्या इस समय उनके घर में कुशल है, या कोई कष्ट है?
कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः ॥25॥
kathaṃ te kiṃ nu sadvṛttā durvṛttāḥ kiṃ nu me sutāḥ ||25||
वे कैसे हैं? क्या मेरे पुत्र अच्छे आचरण वाले हैं, या बुरे मार्ग पर चल रहे हैं?
राजोवाच ॥26॥
rājovāca ||26||
राजा बोले।
यैर्निरस्तो भवांल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः ॥27॥
yairnirasto bhavāṃllubdhaiḥ putradārādibhirdhanaiḥ ||27||
जिन लोभी पुत्र-पत्नी आदि ने धन के कारण आपको निकाल दिया…
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥28॥
teṣu kiṃ bhavataḥ snehamanubadhnāti mānasam ||28||
…उन्हीं के प्रति आपका मन स्नेह से क्यों बँधा हुआ है?
वैश्य उवाच ॥29॥ — वैश्य बोला।
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः ॥30॥
evametadyathā prāha bhavānasmadgataṃ vacaḥ ||30||
आपने मेरे बारे में जो कहा, वह बिलकुल ऐसा ही है।
किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः । यैः सन्त्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः ॥31॥
kiṃ karomi na badhnāti mama niṣṭhuratāṃ manaḥ | yaiḥ santyajya pitṛsnehaṃ dhanalubdhairnirākṛtaḥ ||31||
पर मैं क्या करूँ? मेरा मन कठोर नहीं हो पाता। जिन्होंने धन के लोभ में पिता का स्नेह त्यागकर मुझे निकाल दिया…
पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः । किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ॥32॥
patisvajanahārdaṃ ca hārdi teṣveva me manaḥ | kimetannābhijānāmi jānannapi mahāmate ||32||
…उन्हीं के प्रति, जैसे स्वामी का अपने परिवार पर होता है, मेरे मन में प्रेम बना हुआ है। हे महामति, यह जानते हुए भी मैं नहीं समझ पाता कि ऐसा क्यों है…
यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु । तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥33॥
yatpremapravaṇaṃ cittaṃ viguṇeṣvapi bandhuṣu | teṣāṃ kṛte me niḥśvāso daurmanasyaṃ ca jāyate ||33||
…कि गुणहीन बंधुओं के प्रति भी मन प्रेम की ओर झुका रहता है। उनके लिए ही मेरी आहें निकलती हैं और मन उदास होता है।
करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥34॥
karomi kiṃ yanna manasteṣvaprītiṣu niṣṭhuram ||34||
मैं क्या करूँ, जब उन प्रेमहीन लोगों के प्रति भी मेरा मन कठोर नहीं होता?
मार्कण्डेय उवाच ॥35॥ — मार्कण्डेय जी बोले।
ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ॥36॥
tatastau sahitau vipra taṃ muniṃ samupasthitau ||36||
हे ब्राह्मण! तब वे दोनों साथ-साथ उन मेधा मुनि के पास गए —
समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः । कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम् ॥37॥
samādhirnāma vaiśyo'sau sa ca pārthivasattamaḥ | kṛtvā tu tau yathānyāyaṃ yathārhaṃ tena saṃvidam ||37||
समाधि नाम का वह वैश्य और वह श्रेष्ठ राजा। मुनि के साथ यथोचित शिष्टाचार करके…
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ ॥38॥
upaviṣṭau kathāḥ kāściccakraturvaiśyapārthivau ||38||
…वैश्य और राजा दोनों बैठ गए और कुछ बातें करने लगे।
राजोवाच ॥39॥
rājovāca ||39||
राजा बोले।
भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् ॥40॥
bhagavaṃstvāmahaṃ praṣṭumicchāmyekaṃ vadasva tat ||40||
भगवन्! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, कृपया उसे बताइए।
दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना । ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि ॥41॥
duḥkhāya yanme manasaḥ svacittāyattatāṃ vinā | mamatvaṃ gatarājyasya rājyāṅgeṣvakhileṣvapi ||41||
मेरा मन मेरे वश में नहीं है, और यही मेरे दुख का कारण है। राज्य छिन जाने पर भी राज्य की सब चीज़ों में मेरी ममता बनी हुई है।
जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम । अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥42॥
jānato'pi yathājñasya kimetanmunisattama | ayaṃ ca nikṛtaḥ putrairdārairbhṛtyaistathojjhitaḥ ||42||
हे मुनिश्रेष्ठ, जानते हुए भी मैं अज्ञानी की तरह क्यों हूँ? और यह वैश्य भी पुत्रों, पत्नी और सेवकों द्वारा अपमानित और त्यागा गया है…
स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति । एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ ॥43॥
svajanena ca saṃtyaktasteṣu hārdī tathāpyati | evameṣa tathāhaṃ ca dvāvapyatyantaduḥkhitau ||43||
…अपने लोगों ने छोड़ दिया है, फिर भी यह उनसे बहुत प्रेम करता है। इस तरह यह और मैं — दोनों ही अत्यंत दुखी हैं।
दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ । तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥44॥
dṛṣṭadoṣe'pi viṣaye mamatvākṛṣṭamānasau | tatkimetanmahābhāga yanmoho jñāninorapi ||44||
विषय में दोष देखकर भी हमारा मन ममता से उसी की ओर खिंचता है। हे महाभाग, ज्ञानी होते हुए भी हमें यह मोह क्यों होता है?
ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता ॥45॥
mamāsya ca bhavatyeṣā vivekāndhasya mūḍhatā ||45||
मुझमें और इसमें यह मूढ़ता क्यों है, मानो विवेक की दृष्टि से हम अंधे हों?
ऋषिरुवाच ॥46॥
ṛṣiruvāca ||46||
ऋषि बोले।
ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे ॥47॥
jñānamasti samastasya jantorviṣayagocare ||47||
हे महाभाग! इंद्रियों से जाने जाने वाले विषयों का ज्ञान सब प्राणियों को होता है।
विषयश्च महाभाग याति चैवं पृथक् पृथक् । दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे ॥48॥
viṣayaśca mahābhāga yāti caivaṃ pṛthak pṛthak | divāndhāḥ prāṇinaḥ kecidrātrāvandhāstathāpare ||48||
और विषय भी हर प्राणी तक अलग-अलग ढंग से पहुँचते हैं। कुछ प्राणी दिन में नहीं देख पाते, कुछ रात में नहीं देख पाते।
केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः । ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम् ॥49॥
keciddivā tathā rātrau prāṇinastulyadṛṣṭayaḥ | jñānino manujāḥ satyaṃ kiṃ tu te na hi kevalam ||49||
कुछ प्राणी दिन और रात में समान देखते हैं। मनुष्य ज्ञानी हैं, यह सच है — पर केवल वही ज्ञानी नहीं हैं…
यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः । ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम् ॥50॥
yato hi jñāninaḥ sarve paśupakṣimṛgādayaḥ | jñānaṃ ca tanmanuṣyāṇāṃ yatteṣāṃ mṛgapakṣiṇām ||50||
…क्योंकि पशु, पक्षी, मृग आदि सभी प्राणी ज्ञान रखते हैं। जो ज्ञान मनुष्यों का है, वही उन मृगों और पक्षियों का भी है।
मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः । ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु ॥51॥
manuṣyāṇāṃ ca yatteṣāṃ tulyamanyattathobhayoḥ | jñāne'pi sati paśyaitān pataṅgāñchāvacañcuṣu ||51||
और जो उनका है, वही मनुष्यों का — इसमें दोनों समान हैं। ज्ञान होते हुए भी इन पक्षियों को देखो, जो बच्चों की चोंच में…
कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा । मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति ॥52॥
kaṇamokṣādṛtānmohātpīḍyamānānapi kṣudhā | mānuṣā manujavyāghra sābhilāṣāḥ sutān prati ||52||
…दाना डालने में लगे रहते हैं, स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी — यह मोह के कारण है। हे नरश्रेष्ठ, मनुष्य भी संतान के प्रति लालसा रखते हैं…
लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि । तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः ॥53॥
lobhātpratyupakārāya nanvetān kiṃ na paśyasi | tathāpi mamatāvartte mohagarte nipātitāḥ ||53||
…इस आशा में कि वे बदले में उपकार करेंगे — क्या तुम यह नहीं देखते? फिर भी वे ममता के भँवर और मोह के गड्ढे में गिरे रहते हैं।
महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा । तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः ॥54॥
mahāmāyāprabhāveṇa saṃsārasthitikāriṇā | tannātra vismayaḥ kāryo yoganidrā jagatpateḥ ||54||
यह महामाया का प्रभाव है, जो संसार को बनाए रखती है। इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। यह जगत्पति भगवान विष्णु की योगनिद्रा है।
महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत् । ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ॥55॥
mahāmāyā hareścaiṣā tayā sammohyate jagat | jñānināmapi cetāṃsi devī bhagavatī hi sā ||55||
यही भगवान हरि की महामाया है, जिससे सारा जगत मोहित होता है। वे भगवती देवी ज्ञानियों के मन को भी…
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति । तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् ॥56॥
balādākṛṣya mohāya mahāmāyā prayacchati | tayā visṛjyate viśvaṃ jagadetaccarācaram ||56||
…बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। उन्हीं से यह सारा चर-अचर जगत रचा जाता है।
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये । सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ॥57॥
saiṣā prasannā varadā nṛṇāṃ bhavati muktaye | sā vidyā paramā mukterhetubhūtā sanātanī ||57||
वही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिए वर देती हैं। वही परम विद्या हैं, मुक्ति का सनातन कारण हैं…
संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥58॥
saṃsārabandhahetuśca saiva sarveśvareśvarī ||58||
…और संसार के बंधन का कारण भी वही हैं। वे सब ईश्वरों की भी ईश्वरी हैं।
राजोवाच ॥59॥
rājovāca ||59||
राजा बोले।
भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान् ॥60॥
bhagavan kā hi sā devī mahāmāyeti yāṃ bhavān ||60||
भगवन्! आप जिन्हें महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं?
ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज । यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा ॥61॥
bravīti kathamutpannā sā karmāsyāśca kiṃ dvija | yatprabhāvā ca sā devī yatsvarūpā yadudbhavā ||61||
हे ब्राह्मण, वे कैसे प्रकट हुईं, और उनका कर्म क्या है? उन देवी का प्रभाव कैसा है, स्वरूप कैसा है, और वे कहाँ से उत्पन्न हुईं…
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥62॥
tatsarvaṃ śrotumicchāmi tvatto brahmavidāṃ vara ||62||
…हे ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ, यह सब मैं आपसे सुनना चाहता हूँ।
ऋषिरुवाच ॥63॥
ṛṣiruvāca ||63||
ऋषि बोले।
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् ॥64॥
nityaiva sā jaganmūrtistayā sarvamidaṃ tatam ||64||
वे देवी नित्य हैं, सारा जगत उन्हीं का रूप है, और उन्हीं से यह सब व्याप्त है।
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम । देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा ॥65॥
tathāpi tatsamutpattirbahudhā śrūyatāṃ mama | devānāṃ kāryasiddhyarthamāvirbhavati sā yadā ||65||
फिर भी उनका प्रकट होना अनेक प्रकार से होता है — मुझसे सुनो। जब वे देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए प्रकट होती हैं…
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते । योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ॥66॥
utpanneti tadā loke sā nityāpyabhidhīyate | yoganidrāṃ yadā viṣṇurjagatyekārṇavīkṛte ||66||
…तब नित्य होते हुए भी संसार में वे "उत्पन्न हुईं" कहलाती हैं। कल्प के अंत में जब सारा जगत एक समुद्र बन गया था…
आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः । तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥67॥
āstīrya śeṣamabhajatkalpānte bhagavān prabhuḥ | tadā dvāvasurau ghorau vikhyātau madhukaiṭabhau ||67||
…और भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा में लीन थे, तब मधु और कैटभ नाम के दो भयानक असुर…
विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ । स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥68॥
viṣṇukarṇamalodbhūtau hantuṃ brahmāṇamudyatau | sa nābhikamale viṣṇoḥ sthito brahmā prajāpatiḥ ||68||
…विष्णु के कानों के मैल से उत्पन्न होकर ब्रह्मा जी को मारने को तैयार हुए। प्रजापति ब्रह्मा विष्णु के नाभि-कमल पर बैठे थे।
दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् । तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः ॥69॥
dṛṣṭvā tāvasurau cograu prasuptaṃ ca janārdanam | tuṣṭāva yoganidrāṃ tāmekāgrahṛdayasthitaḥ ||69||
उन दोनों उग्र असुरों को और सोए हुए जनार्दन को देखकर, ब्रह्मा जी ने एकाग्र मन से उस योगनिद्रा की स्तुति की…
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम् । विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ॥70॥
vibodhanārthāya harerharinetrakṛtālayām | viśveśvarīṃ jagaddhātrīṃ sthitisaṃhārakāriṇīm ||70||
…भगवान हरि को जगाने के लिए — जो हरि के नेत्रों में निवास करती हैं, जो विश्व की ईश्वरी, जगत को धारण करने वाली और स्थिति-संहार करने वाली हैं…
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥71॥
nidrāṃ bhagavatīṃ viṣṇoratulāṃ tejasaḥ prabhuḥ ||71||
…विष्णु की उन अनुपम निद्रा-रूपी भगवती की, तेज के स्वामी ब्रह्मा जी ने स्तुति की।
ब्रह्मोवाच ॥72॥
brahmovāca ||72||
ब्रह्मा जी बोले।
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारःस्वरात्मिका ॥73॥
tvaṃ svāhā tvaṃ svadhā tvaṃ hi vaṣaṭkāraḥsvarātmikā ||73||
तुम्हीं स्वाहा हो, तुम्हीं स्वधा हो, तुम्हीं वषट्कार हो; स्वर भी तुम्हारा ही रूप है।
पाठ-भेद — गीता प्रेस / द्रिक पाठ: स्वधां
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता । अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ॥74॥
sudhā tvamakṣare nitye tridhā mātrātmikā sthitā | ardhamātrāsthitā nityā yānuccāryā viśeṣataḥ ||74||
तुम्हीं अमृत हो, नित्य अक्षर (ॐ) में तीन मात्राओं के रूप में स्थित हो, और उस नित्य अर्धमात्रा में भी हो, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं हो सकता।
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा । त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत् ॥75॥
tvameva sandhyā sāvitrī tvaṃ devi jananī parā | tvayaitaddhāryate viśvaṃ tvayaitatsṛjyate jagat ||75||
तुम्हीं संध्या, सावित्री और परम जननी हो। हे देवी, तुम्हीं से यह विश्व धारण होता है और तुम्हीं से यह जगत रचा जाता है।
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा । विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ॥76॥
tvayaitatpālyate devi tvamatsyante ca sarvadā | visṛṣṭau sṛṣṭirūpā tvaṃ sthitirūpā ca pālane ||76||
हे देवी, तुम्हीं इसका पालन करती हो, और अंत में सदा तुम्हीं इसे अपने में लीन कर लेती हो। रचना के समय तुम सृष्टि-रूपा हो, पालन में स्थिति-रूपा…
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये । महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ॥77॥
tathā saṃhṛtirūpānte jagato'sya jaganmaye | mahāvidyā mahāmāyā mahāmedhā mahāsmṛtiḥ ||77||
…और इस जगत के अंत में संहार-रूपा हो, हे जगन्मयी! तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा और महास्मृति हो।
महामोहा च भवती महादेवी महेश्वरी । प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ॥78॥
mahāmohā ca bhavatī mahādevī maheśvarī | prakṛtistvaṃ ca sarvasya guṇatrayavibhāvinī ||78||
तुम्हीं महामोहा, महादेवी और महेश्वरी हो। तुम्हीं सबकी मूल प्रकृति हो, जो तीनों गुणों को प्रकट करती है।
पाठ-भेद — गीता प्रेस / द्रिक पाठ: महासुरी प्रकृतिस्त्वं च
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा । त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ॥79॥
kālarātrirmahārātrirmoharātriśca dāruṇā | tvaṃ śrīstvamīśvarī tvaṃ hrīstvaṃ buddhirbodhalakṣaṇā ||79||
तुम्हीं कालरात्रि, महारात्रि और दारुण मोहरात्रि हो। तुम्हीं श्री, ईश्वरी, लज्जा (ह्री) और ज्ञान-स्वरूपा बुद्धि हो।
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च । खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥80॥
lajjā puṣṭistathā tuṣṭistvaṃ śāntiḥ kṣāntireva ca | khaḍginī śūlinī ghorā gadinī cakriṇī tathā ||80||
लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शांति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्ग, शूल, गदा और चक्र धारण करने वाली घोर रूपा हो।
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा । सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ॥81॥
śaṅkhinī cāpinī bāṇabhuśuṇḍīparighāyudhā | saumyā saumyatarāśeṣasaumyebhyastvatisundarī ||81||
शंख, धनुष, बाण, भुशुंडी और परिघ भी तुम्हारे आयुध हैं। तुम सौम्य हो, सौम्य से भी सौम्य हो, और सब सुंदर वस्तुओं से अधिक सुंदर हो।
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी । यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥82॥
parāparāṇāṃ paramā tvameva parameśvarī | yacca kiñcitkvacidvastu sadasadvākhilātmike ||82||
पर और अपर — सबसे परे परम तुम्हीं हो, तुम्हीं परमेश्वरी हो। हे सर्वात्मिके, कहीं भी जो कुछ भी सत् या असत् वस्तु है…
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा । यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् ॥83॥
tasya sarvasya yā śaktiḥ sā tvaṃ kiṃ stūyase tadā | yayā tvayā jagatsraṣṭā jagatpātyatti yo jagat ||83||
…उस सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। तब तुम्हारी स्तुति कैसे की जाए? जो जगत को रचते, पालते और अंत में लीन करते हैं…
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः । विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ॥84॥
so'pi nidrāvaśaṃ nītaḥ kastvāṃ stotumiheśvaraḥ | viṣṇuḥ śarīragrahaṇamahamīśāna eva ca ||84||
…उन्हें भी तुमने निद्रा के वश में कर दिया है — तो यहाँ तुम्हारी स्तुति करने में कौन समर्थ है? विष्णु, मैं और शिव…
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् । सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ॥85॥
kāritāste yato'tastvāṃ kaḥ stotuṃ śaktimān bhavet | sā tvamitthaṃ prabhāvaiḥ svairudārairdevi saṃstutā ||85||
…तुम्हीं ने हमें शरीर धारण कराया है, इसलिए तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है? हे देवी, अपने इन उदार प्रभावों से स्तुति की गई तुम…
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ । प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ॥86॥
mohayaitau durādharṣāvasurau madhukaiṭabhau | prabodhaṃ ca jagatsvāmī nīyatāmacyuto laghu ||86||
…इन दोनों दुर्जेय असुरों, मधु और कैटभ को मोहित करो, और जगत के स्वामी अच्युत भगवान को शीघ्र जगा दो।
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥87॥
bodhaśca kriyatāmasya hantumetau mahāsurau ||87||
और इन दोनों महान असुरों को मारने के लिए इनमें चेतना जगा दो।
ऋषिरुवाच ॥88॥
ṛṣiruvāca ||88||
ऋषि बोले।
एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा ॥89॥
evaṃ stutā tadā devī tāmasī tatra vedhasā ||89||
इस प्रकार ब्रह्मा जी द्वारा स्तुति किए जाने पर तामसी देवी…
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ । नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ॥90॥
viṣṇoḥ prabodhanārthāya nihantuṃ madhukaiṭabhau | netrāsyanāsikābāhuhṛdayebhyastathorasaḥ ||90||
…विष्णु को जगाने और मधु-कैटभ के वध के लिए, भगवान के नेत्र, मुख, नासिका, भुजाओं, हृदय और वक्ष से निकलकर…
निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः ॥91॥
nirgamya darśane tasthau brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ | uttasthau ca jagannāthastayā mukto janārdanaḥ ||91||
…अव्यक्त-जन्मा ब्रह्मा जी के सामने आकर खड़ी हो गईं। उनसे मुक्त होते ही जगन्नाथ जनार्दन उठ खड़े हुए।
एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ । मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ॥92॥
ekārṇave'hiśayanāttataḥ sa dadṛśe ca tau | madhukaiṭabhau durātmānāvativīryaparākramau ||92||
एकार्णव में शेषनाग की शय्या से उठकर उन्होंने उन दोनों — अत्यंत बलवान और पराक्रमी दुरात्मा मधु-कैटभ को देखा…
क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ । समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः ॥93॥
krodharaktekṣaṇāvattuṃ brahmāṇaṃ janitodyamau | samutthāya tatastābhyāṃ yuyudhe bhagavān hariḥ ||93||
…जो क्रोध से लाल आँखें किए ब्रह्मा जी को खा जाने को तैयार थे। तब भगवान हरि उठकर उनसे युद्ध करने लगे।
पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः । तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ ॥94॥
pañcavarṣasahasrāṇi bāhupraharaṇo vibhuḥ | tāvapyatibalonmattau mahāmāyāvimohitau ||94||
सर्वव्यापी भगवान पाँच हज़ार वर्ष तक भुजाओं से उनसे लड़ते रहे। वे दोनों भी अपने बल के मद में चूर और महामाया से मोहित थे…
उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम् ॥95॥
uktavantau varo'smatto vriyatāmiti keśavam ||95||
…सो उन्होंने केशव से कहा — "हमसे कोई वर माँग लो।"
श्रीभगवानुवाच ॥96॥
śrībhagavānuvāca ||96||
श्री भगवान बोले।
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि ॥97॥
bhavetāmadya me tuṣṭau mama vadhyāvubhāvapi ||97||
यदि तुम दोनों मुझसे प्रसन्न हो, तो अब तुम दोनों मेरे हाथों मारे जाओ।
किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम ॥98॥
kimanyena vareṇātra etāvaddhi vṛtaṃ mama ||98||
यहाँ किसी और वर का क्या काम? मेरा माँगा हुआ वर बस इतना ही है।
ऋषिरुवाच ॥99॥
ṛṣiruvāca ||99||
ऋषि बोले।
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत् ॥100॥
vañcitābhyāmiti tadā sarvamāpomayaṃ jagat ||100||
इस प्रकार ठगे जाने पर, और यह देखकर कि सारा जगत जल ही जल है…
विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः । आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥101॥
vilokya tābhyāṃ gadito bhagavān kamalekṣaṇaḥ | āvāṃ jahi na yatrorvī salilena pariplutā ||101||
…उन दोनों ने कमल-नयन भगवान से कहा — "हमें वहाँ मारो, जहाँ धरती जल में डूबी न हो।"
ऋषिरुवाच ॥102॥
ṛṣiruvāca ||102||
ऋषि बोले।
तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता । कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥103॥
tathetyuktvā bhagavatā śaṅkhacakragadābhṛtā | kṛtvā cakreṇa vai cchinne jaghane śirasī tayoḥ ||103||
तब शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान ने "तथास्तु" कहकर, उनके सिरों को अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से काट डाला।
एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम् । प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः शृणु वदामि ते ऐं ॐ ॥104॥
evameṣā samutpannā brahmaṇā saṃstutā svayam | prabhāvamasyā devyāstu bhūyaḥ śṛṇu vadāmi te aiṃ oṃ ||104||
इस प्रकार ब्रह्मा जी की स्तुति से ये देवी स्वयं प्रकट हुईं। अब इन देवी का प्रभाव फिर से सुनो, मैं कहता हूँ।
