॥ शुम्भनिशुम्भसेनानीधूम्रलोचनवधो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥
ॐ ऋषिरुवाच ॥1॥
oṃ ṛṣiruvāca ||1||
ऋषि बोले।
इत्याकर्ण्य वचो देव्याः स दूतोऽमर्षपूरितः । समाचष्ट समागम्य दैत्यराजाय विस्तरात् ॥2॥
ityākarṇya vaco devyāḥ sa dūto'marṣapūritaḥ | samācaṣṭa samāgamya daityarājāya vistarāt ||2||
देवी की यह बात सुनकर वह दूत क्रोध से भर गया, और लौटकर दैत्यराज को सारी बात विस्तार से सुनाई।
तस्य दूतस्य तद्वाक्यमाकर्ण्यासुरराट् ततः । सक्रोधः प्राह दैत्यानामधिपं धूम्रलोचनम् ॥3॥
tasya dūtasya tadvākyamākarṇyāsurarāṭ tataḥ | sakrodhaḥ prāha daityānāmadhipaṃ dhūmralocanam ||3||
दूत की वह बात सुनकर असुरराज शुंभ क्रोधित हो गया, और दैत्यों के सेनापति धूम्रलोचन से बोला —
हे धूम्रलोचनाशु त्वं स्वसैन्यपरिवारितः । तामानय बलाद् दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम् ॥4॥
he dhūmralocanāśu tvaṃ svasainyaparivāritaḥ | tāmānaya balād duṣṭāṃ keśākarṣaṇavihvalām ||4||
"हे धूम्रलोचन! तुम अपनी सेना लेकर तुरंत जाओ, और उस दुष्टा को बलपूर्वक, बाल पकड़कर घसीटते हुए ले आओ।
तत्परित्राणदः कश्चिद्यदि वोत्तिष्ठतेऽपरः । स हन्तव्योऽमरो वापि यक्षो गन्धर्व एव वा ॥5॥
tatparitrāṇadaḥ kaścidyadi vottiṣṭhate'paraḥ | sa hantavyo'maro vāpi yakṣo gandharva eva vā ||5||
यदि उसकी रक्षा के लिए कोई दूसरा खड़ा हो — चाहे वह देवता हो, यक्ष हो या गंधर्व — तो उसे मार डालना।"
ऋषिरुवाच ॥6॥
ṛṣiruvāca ||6||
ऋषि बोले।
तेनाज्ञप्तस्ततः शीघ्रं स दैत्यो धूम्रलोचनः । वृतः षष्ट्या सहस्राणामसुराणां द्रुतं ययौ ॥7॥
tenājñaptastataḥ śīghraṃ sa daityo dhūmralocanaḥ | vṛtaḥ ṣaṣṭyā sahasrāṇāmasurāṇāṃ drutaṃ yayau ||7||
शुंभ की आज्ञा पाकर वह दैत्य धूम्रलोचन साठ हज़ार असुरों को साथ लेकर तुरंत चल पड़ा।
स दृष्ट्वा तां ततो देवीं तुहिनाचलसंस्थिताम् । जगादोच्चैः प्रयाहीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः ॥8॥
sa dṛṣṭvā tāṃ tato devīṃ tuhinācalasaṃsthitām | jagādoccaiḥ prayāhīti mūlaṃ śumbhaniśumbhayoḥ ||8||
हिमालय पर विराजमान देवी को देखकर वह ज़ोर से बोला — "शुंभ-निशुंभ के पास चलो।
न चेत्प्रीत्याद्य भवती मद्भर्तारमुपैष्यति । ततो बलान्नयाम्येष केशाकर्षणविह्वलाम् ॥9॥
na cetprītyādya bhavatī madbhartāramupaiṣyati | tato balānnayāmyeṣa keśākarṣaṇavihvalām ||9||
यदि तुम इस समय प्रेम से मेरे स्वामी के पास नहीं चलोगी, तो मैं तुम्हें बाल पकड़कर घसीटते हुए बलपूर्वक ले जाऊँगा।"
देव्युवाच ॥10॥
devyuvāca ||10||
देवी बोलीं।
दैत्येश्वरेण प्रहितो बलवान् बलसंवृतः । बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम् ॥11॥
daityeśvareṇa prahito balavān balasaṃvṛtaḥ | balānnayasi māmevaṃ tataḥ kiṃ te karomyaham ||11||
तुम्हें दैत्यराज ने भेजा है, तुम स्वयं बलवान हो और सेना से घिरे हो। यदि तुम इस प्रकार मुझे बलपूर्वक ले जाते हो, तो मैं तुम्हारा क्या कर सकती हूँ?
ऋषिरुवाच ॥12॥
ṛṣiruvāca ||12||
ऋषि बोले।
इत्युक्तः सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः । हुङ्कारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः ॥13॥
ityuktaḥ so'bhyadhāvattāmasuro dhūmralocanaḥ | huṅkāreṇaiva taṃ bhasma sā cakārāmbikā tataḥ ||13||
यह सुनकर असुर धूम्रलोचन देवी की ओर दौड़ा, और अम्बिका ने केवल हुंकार से ही उसे भस्म कर दिया।
अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका । ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्वधैः ॥14॥
atha kruddhaṃ mahāsainyamasurāṇāṃ tathāmbikā | vavarṣa sāyakaistīkṣṇaistathā śaktiparaśvadhaiḥ ||14||
तब असुरों की विशाल सेना क्रोधित होकर अम्बिका पर तेज़ बाणों, शक्तियों और फरसों की वर्षा करने लगी।
ततो धुतसटः कोपात्कृत्वा नादं सुभैरवम् । पपातासुरसेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहनः ॥15॥
tato dhutasaṭaḥ kopātkṛtvā nādaṃ subhairavam | papātāsurasenāyāṃ siṃho devyāḥ svavāhanaḥ ||15||
तब देवी का वाहन सिंह क्रोध से अयाल झटकता हुआ, अत्यंत भयानक गर्जना करके असुरों की सेना पर टूट पड़ा।
कांश्चित् करप्रहारेण दैत्यानास्येन चापरान् । आक्रम्य चाधरेणान्यान् स जघान महासुरान् ॥16॥
kāṃścit karaprahāreṇa daityānāsyena cāparān | ākramya cādhareṇānyān sa jaghāna mahāsurān ||16||
उसने कुछ दैत्यों को पंजे के प्रहार से, कुछ को मुँह से, और दूसरे महान असुरों को पैरों तले दबाकर मार डाला।
केषाञ्चित्पाटयामास नखैः कोष्ठानि केसरी । तथा तलप्रहारेण शिरांसि कृतवान् पृथक् ॥17॥
keṣāñcitpāṭayāmāsa nakhaiḥ koṣṭhāni kesarī | tathā talaprahāreṇa śirāṃsi kṛtavān pṛthak ||17||
सिंह ने नखों से कुछ के पेट फाड़ डाले, और थप्पड़ के प्रहार से कुछ के सिर धड़ से अलग कर दिए।
विच्छिन्नबाहुशिरसः कृतास्तेन तथापरे । पपौ च रुधिरं कोष्ठादन्येषां धुतकेसरः ॥18॥
vicchinnabāhuśirasaḥ kṛtāstena tathāpare | papau ca rudhiraṃ koṣṭhādanyeṣāṃ dhutakesaraḥ ||18||
कुछ की भुजाएँ और सिर काट डाले, और अयाल झटकते हुए दूसरों के पेट से निकलता रक्त पी लिया।
क्षणेन तद्बलं सर्वं क्षयं नीतं महात्मना । तेन केसरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना ॥19॥
kṣaṇena tadbalaṃ sarvaṃ kṣayaṃ nītaṃ mahātmanā | tena kesariṇā devyā vāhanenātikopinā ||19||
अत्यंत क्रोधित, देवी के उस महाबली वाहन सिंह ने क्षण भर में वह सारी सेना नष्ट कर दी।
श्रुत्वा तमसुरं देव्या निहतं धूम्रलोचनम् । बलं च क्षयितं कृत्स्नं देवीकेसरिणा ततः ॥20॥
śrutvā tamasuraṃ devyā nihataṃ dhūmralocanam | balaṃ ca kṣayitaṃ kṛtsnaṃ devīkesariṇā tataḥ ||20||
जब शुंभ ने सुना कि देवी ने असुर धूम्रलोचन को मार डाला और देवी के सिंह ने उसकी सारी सेना नष्ट कर दी…
चुकोप दैत्याधिपतिः शुम्भः प्रस्फुरिताधरः । आज्ञापयामास च तौ चण्डमुण्डौ महासुरौ ॥21॥
cukopa daityādhipatiḥ śumbhaḥ prasphuritādharaḥ | ājñāpayāmāsa ca tau caṇḍamuṇḍau mahāsurau ||21||
…तो दैत्यराज शुंभ क्रोध से भर गया, उसके होंठ फड़कने लगे, और उसने चंड और मुंड नाम के दो महान असुरों को आज्ञा दी —
हे चण्ड हे मुण्ड बलैर्बहुभिः परिवारितौ । तत्र गच्छत गत्वा च सा समानीयतां लघु ॥22॥
he caṇḍa he muṇḍa balairbahubhiḥ parivāritau | tatra gacchata gatvā ca sā samānīyatāṃ laghu ||22||
"हे चंड! हे मुंड! तुम बहुत बड़ी सेना लेकर वहाँ जाओ, और जाकर उसे शीघ्र यहाँ ले आओ।
केशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वः संशयो युधि । तदाशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विनिहन्यताम् ॥23॥
keśeṣvākṛṣya baddhvā vā yadi vaḥ saṃśayo yudhi | tadāśeṣāyudhaiḥ sarvairasurairvinihanyatām ||23||
उसे बाल पकड़कर खींचते हुए या बाँधकर लाना। यदि युद्ध में तुम्हें कोई संदेह हो, तो सब असुर मिलकर अपने सारे अस्त्रों से उसे मार डालें।
तस्यां हतायां दुष्टायां सिंहे च विनिपातिते । शीघ्रमागम्यतां बद्ध्वा गृहीत्वा तामथाम्बिकाम् ॐ ॥24॥
tasyāṃ hatāyāṃ duṣṭāyāṃ siṃhe ca vinipātite | śīghramāgamyatāṃ baddhvā gṛhītvā tāmathāmbikām oṃ ||24||
उस दुष्टा के परास्त हो जाने और सिंह के मारे जाने पर, उस अम्बिका को पकड़कर, बाँधकर शीघ्र यहाँ ले आना।"
