॥ नारायणीस्तुतिर्नामैकादशोऽध्यायः ॥
ॐ ऋषिरुवाच ॥1॥
oṃ ṛṣiruvāca ||1||
ऋषि बोले।
देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम् । कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद् विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः ॥2॥
devyā hate tatra mahāsurendre sendrāḥ surā vahnipurogamāstām | kātyāyanīṃ tuṣṭuvuriṣṭalābhād vikāśivaktrābjavikāśitāśāḥ ||2||
देवी द्वारा वहाँ उस महान असुरराज के मारे जाने पर, इंद्र सहित देवता अग्नि को आगे करके कात्यायनी की स्तुति करने लगे। मनचाहा फल मिलने से उनके मुख-कमल खिल उठे थे और उनसे दिशाएँ प्रकाशित हो रही थीं।
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥3॥
devi prapannārtihare prasīda prasīda mātarjagato'khilasya | prasīda viśveśvari pāhi viśvaṃ tvamīśvarī devi carācarasya ||3||
शरणागतों की पीड़ा हरने वाली देवी, प्रसन्न होओ! सारे जगत की माता, प्रसन्न होओ! विश्वेश्वरी, प्रसन्न होओ और विश्व की रक्षा करो। हे देवी, तुम्हीं चर-अचर की ईश्वरी हो।
आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि । अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत दाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥4॥
ādhārabhūtā jagatastvamekā mahīsvarūpeṇa yataḥ sthitāsi | apāṃ svarūpasthitayā tvayaita dāpyāyate kṛtsnamalaṅghyavīrye ||4||
तुम अकेली ही जगत का आधार हो, क्योंकि तुम पृथ्वी के रूप में स्थित हो। हे अलंघ्य पराक्रम वाली! जल के रूप में स्थित होकर तुम्हीं इस सारे जगत को तृप्त करती हो।
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया । संमोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥5॥
tvaṃ vaiṣṇavī śaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā | saṃmohitaṃ devi samastametat tvaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ ||5||
तुम अनंत पराक्रम वाली वैष्णवी शक्ति हो, विश्व का बीज और परम माया हो। हे देवी, तुमने ही यह सारा जगत मोहित कर रखा है, और प्रसन्न होने पर तुम्हीं पृथ्वी पर मुक्ति का कारण बनती हो।
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु । त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ॥6॥
vidyāḥ samastāstava devi bhedāḥ striyaḥ samastāḥ sakalā jagatsu | tvayaikayā pūritamambayaitat kā te stutiḥ stavyaparā paroktiḥ ||6||
हे देवी! सारी विद्याएँ तुम्हारे ही भेद हैं, और जगत की सारी स्त्रियाँ भी। हे माता, तुम अकेली ने ही यह जगत भर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो? तुम तो स्तुति के योग्य वाणी से भी परे हो।
सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी । त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः ॥7॥
sarvabhūtā yadā devī svargamuktipradāyinī | tvaṃ stutā stutaye kā vā bhavantu paramoktayaḥ ||7||
जब तुम सर्वस्वरूपा, स्वर्ग और मोक्ष देने वाली देवी के रूप में स्तुति की जाती हो, तो तुम्हारी स्तुति के लिए कौन-से उत्तम वचन पर्याप्त हो सकते हैं?
सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते । स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥8॥
sarvasya buddhirūpeṇa janasya hṛdi saṃsthite | svargāpavargade devi nārāyaṇi namo'stu te ||8||
बुद्धि के रूप में सब लोगों के हृदय में स्थित, स्वर्ग और मोक्ष देने वाली हे नारायणी देवी, तुम्हें नमस्कार है।
कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि । विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥9॥
kalākāṣṭhādirūpeṇa pariṇāmapradāyini | viśvasyoparatau śakte nārāyaṇi namo'stu te ||9||
कला, काष्ठा आदि (समय के भागों) के रूप में परिवर्तन लाने वाली, विश्व के संहार में समर्थ हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥10॥
sarvamaṅgalamāṅgalye śive sarvārthasādhike | śaraṇye tryambake gauri nārāyaṇi namo'stu te ||10||
सब मंगलों का मंगल करने वाली, कल्याणमयी शिवा, सब कामनाएँ सिद्ध करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
पाठ-भेद — गीता प्रेस / द्रिक पाठ: सर्वमङ्गलमङ्गल्ये
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि । गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥11॥
sṛṣṭisthitivināśānāṃ śaktibhūte sanātani | guṇāśraye guṇamaye nārāyaṇi namo'stu te ||11||
सृष्टि, स्थिति और संहार की शक्ति-स्वरूपा, सनातनी, गुणों का आश्रय और गुणमयी हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥12॥
śaraṇāgatadīnārtaparitrāṇaparāyaṇe | sarvasyārtihare devi nārāyaṇi namo'stu te ||12||
शरण में आए दीनों और दुखियों की रक्षा में सदा तत्पर, सबकी पीड़ा हरने वाली हे नारायणी देवी, तुम्हें नमस्कार है।
हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि । कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥13॥
haṃsayuktavimānasthe brahmāṇīrūpadhāriṇi | kauśāmbhaḥkṣarike devi nārāyaṇi namo'stu te ||13||
हंसों से जुते विमान पर बैठने वाली, ब्रह्माणी का रूप धारण करने वाली, कुश से जल छिड़कने वाली हे नारायणी देवी, तुम्हें नमस्कार है।
त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि । माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तु ते ॥14॥
triśūlacandrāhidhare mahāvṛṣabhavāhini | māheśvarīsvarūpeṇa nārāyaṇi namo'stu te ||14||
त्रिशूल, चंद्रमा और सर्प धारण करने वाली, बड़े बैल पर सवार होने वाली, माहेश्वरी-स्वरूपा हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे । कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥15॥
mayūrakukkuṭavṛte mahāśaktidhare'naghe | kaumārīrūpasaṃsthāne nārāyaṇi namo'stu te ||15||
मोर और मुर्गे से घिरी रहने वाली, बड़ी शक्ति धारण करने वाली, निष्पाप, कौमारी-रूप में स्थित हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गगृहीतपरमायुधे । प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥16॥
śaṅkhacakragadāśārṅgagṛhītaparamāyudhe | prasīda vaiṣṇavīrūpe nārāyaṇi namo'stu te ||16||
शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष जैसे उत्तम अस्त्र धारण करने वाली वैष्णवी-रूपा, प्रसन्न होओ। हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे । वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥17॥
gṛhītogramahācakre daṃṣṭroddhṛtavasundhare | varāharūpiṇi śive nārāyaṇi namo'stu te ||17||
हाथ में उग्र महाचक्र लेने वाली, दाढ़ों पर पृथ्वी को उठाने वाली, वराह-रूपिणी कल्याणमयी हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे । त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥18॥
nṛsiṃharūpeṇogreṇa hantuṃ daityān kṛtodyame | trailokyatrāṇasahite nārāyaṇi namo'stu te ||18||
उग्र नृसिंह-रूप से दैत्यों को मारने का उद्यम करने वाली, तीनों लोकों की रक्षा में लगी हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले । वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥19॥
kirīṭini mahāvajre sahasranayanojjvale | vṛtraprāṇahare caindri nārāyaṇi namo'stu te ||19||
मुकुट और बड़ा वज्र धारण करने वाली, हज़ार नेत्रों से दीप्त, वृत्रासुर के प्राण हरने वाली ऐन्द्री हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले । घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥20॥
śivadūtīsvarūpeṇa hatadaityamahābale | ghorarūpe mahārāve nārāyaṇi namo'stu te ||20||
शिवदूती के रूप में दैत्यों की विशाल सेना को मारने वाली, घोर रूप वाली, भारी गर्जना करने वाली हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे । चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥21॥
daṃṣṭrākarālavadane śiromālāvibhūṣaṇe | cāmuṇḍe muṇḍamathane nārāyaṇi namo'stu te ||21||
दाढ़ों से विकराल मुख वाली, मुंडमाला से सजी, मुंड का मर्दन करने वाली चामुण्डा हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टिस्वधे ध्रुवे । महारात्रि महामाये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥22॥
lakṣmi lajje mahāvidye śraddhe puṣṭisvadhe dhruve | mahārātri mahāmāye nārāyaṇi namo'stu te ||22||
हे लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवा, महारात्रि और महामाया! हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि । नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥23॥
medhe sarasvati vare bhūti bābhravi tāmasi | niyate tvaṃ prasīdeśe nārāyaṇi namo'stu te ||23||
हे मेधा, सरस्वती, श्रेष्ठा, भूति (ऐश्वर्य), बाभ्रवी, तामसी, नियता और ईशा — प्रसन्न होओ। हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते । भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥24॥
sarvasvarūpe sarveśe sarvaśaktisamanvite | bhayebhyastrāhi no devi durge devi namo'stu te ||24||
हे सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी, सब शक्तियों से युक्त देवी! भयों से हमारी रक्षा करो। हे दुर्गा देवी, तुम्हें नमस्कार है।
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम् । पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥25॥
etatte vadanaṃ saumyaṃ locanatrayabhūṣitam | pātu naḥ sarvabhītibhyaḥ kātyāyani namo'stu te ||25||
तीन नेत्रों से सजा तुम्हारा यह सौम्य मुख सब भयों से हमारी रक्षा करे। हे कात्यायनी, तुम्हें नमस्कार है।
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम् । त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते ॥26॥
jvālākarālamatyugramaśeṣāsurasūdanam | triśūlaṃ pātu no bhīterbhadrakāli namo'stu te ||26||
ज्वालाओं से विकराल, अत्यंत उग्र, सब असुरों का संहार करने वाला तुम्हारा त्रिशूल हमें भय से बचाए। हे भद्रकाली, तुम्हें नमस्कार है।
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् । सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽनः सुतानिव ॥27॥
hinasti daityatejāṃsi svanenāpūrya yā jagat | sā ghaṇṭā pātu no devi pāpebhyo'naḥ sutāniva ||27||
हे देवी! जो अपनी ध्वनि से जगत को भरकर दैत्यों का तेज नष्ट कर देता है, वह तुम्हारा घंटा हमारी पापों से वैसे ही रक्षा करे, जैसे माता पुत्रों की करती है।
असुरासृग्वसापङ्कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः । शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम् ॥28॥
asurāsṛgvasāpaṅkacarcitaste karojjvalaḥ | śubhāya khaḍgo bhavatu caṇḍike tvāṃ natā vayam ||28||
हे चण्डिके! असुरों के रक्त और चर्बी के कीचड़ से सना, तुम्हारे हाथ में चमकता खड्ग हमारा कल्याण करे। हम तुम्हें प्रणाम करते हैं।
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥29॥
rogānaśeṣānapahaṃsi tuṣṭā ruṣṭā tu kāmān sakalānabhīṣṭān | tvāmāśritānāṃ na vipannarāṇāṃ tvāmāśritā hyāśrayatāṃ prayānti ||29||
प्रसन्न होने पर तुम सब रोग नष्ट कर देती हो, और रुष्ट होने पर सारी मनचाही कामनाएँ नष्ट कर देती हो। जो तुम्हारी शरण में हैं, उन पर विपत्ति नहीं आती — तुम्हारी शरण लेने वाले स्वयं दूसरों को शरण देने वाले बन जाते हैं।
एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य धर्मद्विषां देवि महासुराणाम् । रूपैरनेकैर्बहुधाऽऽत्ममूर्तिं कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या ॥30॥
etatkṛtaṃ yatkadanaṃ tvayādya dharmadviṣāṃ devi mahāsurāṇām | rūpairanekairbahudhā''tmamūrtiṃ kṛtvāmbike tatprakaroti kānyā ||30||
हे अम्बिके! आज धर्म से द्वेष करने वाले महान असुरों का जो संहार तुमने अपने शरीर को अनेक रूपों में बाँटकर किया है, वह दूसरी कौन देवी कर सकती है?
विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपे ष्वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या । ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम् ॥31॥
vidyāsu śāstreṣu vivekadīpe ṣvādyeṣu vākyeṣu ca kā tvadanyā | mamatvagarte'timahāndhakāre vibhrāmayatyetadatīva viśvam ||31||
विद्याओं में, विवेक का दीपक जलाने वाले शास्त्रों में और आदि वचनों (वेदों) में तुम्हारे सिवा और कौन है? और ममता के अत्यंत अंधकारमय गड्ढे में इस विश्व को तुम्हीं तो घुमाती रहती हो।
रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र । दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम् ॥32॥
rakṣāṃsi yatrograviṣāśca nāgā yatrārayo dasyubalāni yatra | dāvānalo yatra tathābdhimadhye tatra sthitā tvaṃ paripāsi viśvam ||32||
जहाँ राक्षस हों, जहाँ भयंकर विष वाले नाग हों, जहाँ शत्रु हों, जहाँ लुटेरों की सेना हो, जहाँ दावानल हो और जहाँ समुद्र के बीच (संकट) हो — वहाँ रहकर तुम विश्व की रक्षा करती हो।
विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम् । विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥33॥
viśveśvari tvaṃ paripāsi viśvaṃ viśvātmikā dhārayasīti viśvam | viśveśavandyā bhavatī bhavanti viśvāśrayā ye tvayi bhaktinamrāḥ ||33||
हे विश्वेश्वरी! तुम विश्व की रक्षा करती हो, विश्व-रूपा होकर विश्व को धारण करती हो। तुम विश्व के स्वामी द्वारा भी वंदनीय हो। जो भक्ति से तुम्हारे आगे झुकते हैं, वे विश्व के आश्रय बन जाते हैं।
देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः । पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान् ॥34॥
devi prasīda paripālaya no'ribhīte rnityaṃ yathāsuravadhādadhunaiva sadyaḥ | pāpāni sarvajagatāṃ praśamaṃ nayāśu utpātapākajanitāṃśca mahopasargān ||34||
हे देवी, प्रसन्न होओ! जैसे इस समय असुरों का वध करके तुमने तुरंत हमारी रक्षा की, वैसे ही सदा शत्रुओं के भय से हमारी रक्षा करो। सारे जगत के पापों को और उत्पातों के फल से उत्पन्न बड़ी विपत्तियों को शीघ्र शांत कर दो।
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि । त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥35॥
praṇatānāṃ prasīda tvaṃ devi viśvārtihāriṇi | trailokyavāsināmīḍye lokānāṃ varadā bhava ||35||
हे विश्व की पीड़ा हरने वाली देवी! हम शरणागतों पर प्रसन्न होओ। तीनों लोकों के निवासियों द्वारा पूजनीय देवी! सब लोकों को वर दो।
देव्युवाच ॥36॥
devyuvāca ||36||
देवी बोलीं।
वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ । तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम् ॥37॥
varadāhaṃ suragaṇā varaṃ yanmanasecchatha | taṃ vṛṇudhvaṃ prayacchāmi jagatāmupakārakam ||37||
हे देवताओ! मैं वर देने को तैयार हूँ। तुम्हारे मन में जो वर हो, जो जगत के लिए उपकारी हो, वह माँग लो — मैं दूँगी।
देवा ऊचुः ॥38॥
devā ūcuḥ ||38||
देवता बोले।
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि । एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥39॥
sarvābādhāpraśamanaṃ trailokyasyākhileśvari | evameva tvayā kāryamasmadvairivināśanam ||39||
हे सर्वेश्वरी! इसी प्रकार तुम तीनों लोकों की सारी बाधाएँ शांत करती रहो, और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।
देव्युवाच ॥40॥
devyuvāca ||40||
देवी बोलीं।
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे । शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ ॥41॥
vaivasvate'ntare prāpte aṣṭāviṃśatime yuge | śumbho niśumbhaścaivānyāvutpatsyete mahāsurau ||41||
वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें युग में शुंभ और निशुंभ नाम के दो दूसरे महान असुर पैदा होंगे।
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा । ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी ॥42॥
nandagopagṛhe jātā yaśodāgarbhasambhavā | tatastau nāśayiṣyāmi vindhyācalanivāsinī ||42||
तब मैं नंद गोप के घर में यशोदा के गर्भ से जन्म लूँगी, और विंध्याचल पर रहकर उन दोनों का नाश करूँगी।
पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले । अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांस्तु दानवान् ॥43॥
punarapyatiraudreṇa rūpeṇa pṛthivītale | avatīrya haniṣyāmi vaipracittāṃstu dānavān ||43||
फिर अत्यंत रौद्र रूप में पृथ्वी पर अवतार लेकर मैं वैप्रचित्त नाम के दानवों को मारूँगी।
भक्षयन्त्याश्च तानुग्रान् वैप्रचित्तान्महासुरान् । रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः ॥44॥
bhakṣayantyāśca tānugrān vaipracittānmahāsurān | raktā dantā bhaviṣyanti dāḍimīkusumopamāḥ ||44||
उन उग्र वैप्रचित्त महान असुरों को खाते समय मेरे दाँत अनार के फूल जैसे लाल हो जाएँगे।
ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः । स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम् ॥45॥
tato māṃ devatāḥ svarge martyaloke ca mānavāḥ | stuvanto vyāhariṣyanti satataṃ raktadantikām ||45||
इसलिए स्वर्ग में देवता और मृत्युलोक में मनुष्य मेरी स्तुति करते हुए मुझे सदा "रक्तदन्तिका" कहेंगे।
भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि । मुनिभिः संस्तुता भूमौ संभविष्याम्ययोनिजा ॥46॥
bhūyaśca śatavārṣikyāmanāvṛṣṭyāmanambhasi | munibhiḥ saṃstutā bhūmau saṃbhaviṣyāmyayonijā ||46||
फिर जब सौ वर्षों तक वर्षा नहीं होगी और जल का अभाव होगा, तब मुनियों की स्तुति से मैं पृथ्वी पर अयोनिजा (बिना माता के गर्भ के) प्रकट होऊँगी।
ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्मुनीन् । कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः ॥47॥
tataḥ śatena netrāṇāṃ nirīkṣiṣyāmi yanmunīn | kīrtayiṣyanti manujāḥ śatākṣīmiti māṃ tataḥ ||47||
तब मैं सौ नेत्रों से मुनियों को देखूँगी, इसलिए मनुष्य मुझे "शताक्षी" नाम से गाएँगे।
ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः । भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः ॥48॥
tato'hamakhilaṃ lokamātmadehasamudbhavaiḥ | bhariṣyāmi surāḥ śākairāvṛṣṭeḥ prāṇadhārakaiḥ ||48||
फिर हे देवताओ! वर्षा होने तक मैं अपने ही शरीर से उत्पन्न प्राण-रक्षक शाकों से सारे संसार का पालन करूँगी।
शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि । तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम् ॥49॥
śākambharīti vikhyātiṃ tadā yāsyāmyahaṃ bhuvi | tatraiva ca vadhiṣyāmi durgamākhyaṃ mahāsuram ||49||
तब मैं पृथ्वी पर "शाकम्भरी" नाम से प्रसिद्ध होऊँगी, और उसी समय दुर्गम नाम के महान असुर का वध करूँगी।
दुर्गा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति । पुनश्चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले ॥50॥
durgā devīti vikhyātaṃ tanme nāma bhaviṣyati | punaścāhaṃ yadā bhīmaṃ rūpaṃ kṛtvā himācale ||50||
इससे मेरा "दुर्गा देवी" नाम प्रसिद्ध होगा। फिर जब मैं हिमालय पर भीम (भयानक) रूप धारण करके…
रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात् । तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः ॥51॥
rakṣāṃsi bhakṣayiṣyāmi munīnāṃ trāṇakāraṇāt | tadā māṃ munayaḥ sarve stoṣyantyānamramūrtayaḥ ||51||
…मुनियों की रक्षा के लिए राक्षसों को खाऊँगी, तब सब मुनि झुककर मेरी स्तुति करेंगे।
भीमा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति । यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति ॥52॥
bhīmā devīti vikhyātaṃ tanme nāma bhaviṣyati | yadāruṇākhyastrailokye mahābādhāṃ kariṣyati ||52||
तब मेरा "भीमा देवी" नाम प्रसिद्ध होगा। जब अरुण नाम का असुर तीनों लोकों में बड़ा उपद्रव करेगा…
तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वासंख्येयषट्पदम् । त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम् ॥53॥
tadāhaṃ bhrāmaraṃ rūpaṃ kṛtvāsaṃkhyeyaṣaṭpadam | trailokyasya hitārthāya vadhiṣyāmi mahāsuram ||53||
…तब मैं असंख्य भौंरों वाला भ्रामर (भौंरे का) रूप धारण करके तीनों लोकों के हित के लिए उस महान असुर का वध करूँगी।
भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः । इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति ॥54॥
bhrāmarīti ca māṃ lokāstadā stoṣyanti sarvataḥ | itthaṃ yadā yadā bādhā dānavotthā bhaviṣyati ||54||
तब सब ओर लोग मुझे "भ्रामरी" कहकर मेरी स्तुति करेंगे। इस प्रकार जब-जब दानवों से बाधा उत्पन्न होगी…
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम् ॐ ॥55॥
tadā tadāvatīryāhaṃ kariṣyāmyarisaṃkṣayam oṃ ||55||
…तब-तब मैं अवतार लेकर शत्रुओं का संहार करूँगी।
