देवी कवच

श्रीदुर्गासप्तशती का अंग · पाठ से पहले

56 श्लोक — मूल संस्कृत, IAST और सरल हिंदी अर्थ के साथ।

देवी कवच में

मार्कण्डेय ऋषि के पूछने पर ब्रह्मा जी देवी का गोपनीय कवच बताते हैं — पहले नवदुर्गा के नौ नाम और मातृकाओं के वाहन, फिर हर दिशा और शरीर के हर अंग की रक्षा के लिए देवी के अलग-अलग रूपों का आवाहन। अंत में कवच की फलश्रुति है।

पाठ-विधि के अनुसार तेरह अध्यायों से पहले ये अंग इस क्रम में पढ़े जाते हैं: देवी कवच → अर्गला स्तोत्र → कीलक स्तोत्र → वेदोक्त रात्रिसूक्त → तन्त्रोक्त रात्रिसूक्त → देव्यथर्वशीर्ष। देवी कवच इनमें पहला है।

॥ अथ देव्याः कवचम् ॥

विनियोग / ध्यान

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः चामुण्डा देवता अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम् दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम् श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः । ॐ नमश्चण्डिकायै

oṃ asya śrīcaṇḍīkavacasya brahmā ṛṣiḥ anuṣṭup chandaḥ cāmuṇḍā devatā aṅganyāsoktamātaro bījam digbandhadevatāstattvam śrījagadambāprītyarthe saptaśatīpāṭhāṅgatvena jape viniyogaḥ | oṃ namaścaṇḍikāyai

इस श्रीचण्डी-कवच के ऋषि ब्रह्मा हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता चामुण्डा हैं। अंगन्यास में कही गई माताएँ इसका बीज हैं और दिग्बन्ध के देवता इसका तत्त्व। श्री जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए सप्तशती-पाठ के अंग के रूप में इसका जप किया जाता है — यह विनियोग है। ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार।

मार्कण्डेय उवाच

ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् । यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥1॥

oṃ yadguhyaṃ paramaṃ loke sarvarakṣākaraṃ nṛṇām | yanna kasyacidākhyātaṃ tanme brūhi pitāmaha ||1||

हे पितामह! जो इस लोक में परम गोपनीय है, मनुष्यों की हर प्रकार से रक्षा करता है, और जो आपने अब तक किसी को नहीं बताया — वह मुझे बताइए।

ब्रह्मोवाच

अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् । देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ॥2॥

asti guhyatamaṃ vipra sarvabhūtopakārakam | devyāstu kavacaṃ puṇyaṃ tacchṛṇuṣva mahāmune ||2||

हे विप्र! देवी का पवित्र कवच अत्यंत गोपनीय है और सब प्राणियों का उपकार करने वाला है। हे महामुने, उसे सुनो।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी । तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥3॥

prathamaṃ śailaputrī ca dvitīyaṃ brahmacāriṇī | tṛtīyaṃ candraghaṇṭeti kūṣmāṇḍeti caturthakam ||3||

पहली शैलपुत्री हैं, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघण्टा और चौथी कूष्माण्डा।

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च । सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥4॥

pañcamaṃ skandamāteti ṣaṣṭhaṃ kātyāyanīti ca | saptamaṃ kālarātrīti mahāgaurīti cāṣṭamam ||4||

पाँचवीं स्कन्दमाता हैं, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि और आठवीं महागौरी।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः । उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥5॥

navamaṃ siddhidātrī ca navadurgāḥ prakīrtitāḥ | uktānyetāni nāmāni brahmaṇaiva mahātmanā ||5||

नौवीं सिद्धिदात्री हैं — ये नवदुर्गा कही गई हैं। ये नाम स्वयं महात्मा ब्रह्मा ने ही बताए हैं।

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे । विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥6॥

agninā dahyamānastu śatrumadhye gato raṇe | viṣame durgame caiva bhayārtāḥ śaraṇaṃ gatāḥ ||6||

जो आग में जल रहा हो, युद्ध में शत्रुओं के बीच घिर गया हो, या किसी कठिन और दुर्गम स्थिति में भय से व्याकुल हो — ऐसे जो लोग देवी की शरण में आते हैं…

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे । नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ॥7॥

na teṣāṃ jāyate kiṃcidaśubhaṃ raṇasaṃkaṭe | nāpadaṃ tasya paśyāmi śokaduḥkhabhayaṃ na hi ||7||

…युद्ध की विपत्ति में भी उनका कुछ अशुभ नहीं होता। मैं उन पर कोई आपदा नहीं देखता; उन्हें शोक, दुःख और भय नहीं होता।

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते । ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः ॥8॥

yaistu bhaktyā smṛtā nūnaṃ teṣāṃ vṛddhiḥ prajāyate | ye tvāṃ smaranti deveśi rakṣase tānna saṃśayaḥ ||8||

जिन्होंने भक्ति से देवी का स्मरण किया, उनकी निश्चय ही उन्नति होती है। हे देवेश्वरी! जो तुम्हारा स्मरण करते हैं, तुम निःसंदेह उनकी रक्षा करती हो।

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना । ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ॥9॥

pretasaṃsthā tu cāmuṇḍā vārāhī mahiṣāsanā | aindrī gajasamārūḍhā vaiṣṇavī garuḍāsanā ||9||

चामुण्डा प्रेत (शव) पर आसीन हैं, वाराही भैंसे पर, ऐन्द्री हाथी पर सवार हैं और वैष्णवी गरुड़ पर।

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना । लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ॥10॥

māheśvarī vṛṣārūḍhā kaumārī śikhivāhanā | lakṣmīḥ padmāsanā devī padmahastā haripriyā ||10||

माहेश्वरी बैल पर सवार हैं और कौमारी का वाहन मोर है। हरि की प्रिया लक्ष्मी देवी कमल पर आसीन हैं और हाथ में कमल लिए हैं।

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना । ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ॥11॥

śvetarūpadharā devī īśvarī vṛṣavāhanā | brāhmī haṃsasamārūḍhā sarvābharaṇabhūṣitā ||11||

श्वेत रूप धारण करने वाली ईश्वरी देवी बैल पर सवार हैं, और सब आभूषणों से सजी ब्राह्मी हंस पर आरूढ़ हैं।

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः । नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥12॥

ityetā mātaraḥ sarvāḥ sarvayogasamanvitāḥ | nānābharaṇaśobhāḍhyā nānāratnopaśobhitāḥ ||12||

ये सभी माताएँ सब प्रकार की योग-शक्तियों से संपन्न हैं, अनेक आभूषणों से शोभित हैं और अनेक रत्नों से सुशोभित हैं।

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः । शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ॥13॥

dṛśyante rathamārūḍhā devyaḥ krodhasamākulāḥ | śaṅkhaṃ cakraṃ gadāṃ śaktiṃ halaṃ ca musalāyudham ||13||

ये देवियाँ रथों पर सवार और क्रोध से भरी दिखाई देती हैं। वे शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल…

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च । कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ॥14॥

kheṭakaṃ tomaraṃ caiva paraśuṃ pāśameva ca | kuntāyudhaṃ triśūlaṃ ca śārṅgamāyudhamuttamam ||14||

…ढाल, तोमर, फरसा, पाश, भाला, त्रिशूल और उत्तम शार्ङ्ग धनुष धारण करती हैं।

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च । धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥15॥

daityānāṃ dehanāśāya bhaktānāmabhayāya ca | dhārayantyāyudhānītthaṃ devānāṃ ca hitāya vai ||15||

दैत्यों के शरीर का नाश करने, भक्तों को अभय देने और देवताओं के हित के लिए वे इस प्रकार आयुध धारण करती हैं।

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे । महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥16॥

namaste'stu mahāraudre mahāghoraparākrame | mahābale mahotsāhe mahābhayavināśini ||16||

हे महारौद्रे! हे महाघोर पराक्रम वाली, महाबलशालिनी, महान उत्साह वाली और बड़े-बड़े भय दूर करने वाली देवी — तुम्हें नमस्कार है।

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि । प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ॥17॥

trāhi māṃ devi duṣprekṣye śatrūṇāṃ bhayavardhini | prācyāṃ rakṣatu māmaindrī āgneyyāmagnidevatā ||17||

हे देवी! तुम्हारी ओर देख पाना भी कठिन है, तुम शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली हो — मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऐन्द्री मेरी रक्षा करें, और आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) में अग्नि-देवता।

दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी । प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी ॥18॥

dakṣiṇe'vatu vārāhī nairṛtyāṃ khaḍgadhāriṇī | pratīcyāṃ vāruṇī rakṣed vāyavyāṃ mṛgavāhinī ||18||

दक्षिण में वाराही, नैर्ऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में खड्ग धारण करने वाली, पश्चिम में वारुणी और वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) में मृग पर सवार देवी रक्षा करें।

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी । ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा ॥19॥

udīcyāṃ pātu kaumārī aiśānyāṃ śūladhāriṇī | ūrdhvaṃ brahmāṇi me rakṣedadhastād vaiṣṇavī tathā ||19||

उत्तर में कौमारी और ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में शूल धारण करने वाली रक्षा करें। ऊपर ब्रह्माणी और नीचे वैष्णवी मेरी रक्षा करें।

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना । जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ॥20॥

evaṃ daśa diśo rakṣeccāmuṇḍā śavavāhanā | jayā me cāgrataḥ pātu vijayā pātu pṛṣṭhataḥ ||20||

इस प्रकार शव पर सवार चामुण्डा दसों दिशाओं में रक्षा करें। जया आगे से और विजया पीछे से मेरी रक्षा करें।

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता । शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता ॥21॥

ajitā vāmapārśve tu dakṣiṇe cāparājitā | śikhāmudyotinī rakṣedumā mūrdhni vyavasthitā ||21||

बाईं ओर अजिता और दाईं ओर अपराजिता रक्षा करें। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करें, और उमा मस्तक पर स्थित होकर रक्षा करें।

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी । त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ॥22॥

mālādharī lalāṭe ca bhruvau rakṣed yaśasvinī | trinetrā ca bhruvormadhye yamaghaṇṭā ca nāsike ||22||

मालाधरी ललाट की, यशस्विनी भौंहों की, त्रिनेत्रा भौंहों के बीच की और यमघण्टा नाक की रक्षा करें।

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी । कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी ॥23॥

śaṅkhinī cakṣuṣormadhye śrotrayordvāravāsinī | kapolau kālikā rakṣetkarṇamūle tu śāṅkarī ||23||

शंखिनी दोनों आँखों के बीच, द्वारवासिनी दोनों कानों की, कालिका दोनों गालों की और शांकरी कानों की जड़ की रक्षा करें।

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका । अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ॥24॥

nāsikāyāṃ sugandhā ca uttaroṣṭhe ca carcikā | adhare cāmṛtakalā jihvāyāṃ ca sarasvatī ||24||

सुगन्धा नासिका में, चर्चिका ऊपर के होंठ में, अमृतकला नीचे के होंठ में और सरस्वती जीभ में रक्षा करें।

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका । घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥25॥

dantān rakṣatu kaumārī kaṇṭhadeśe tu caṇḍikā | ghaṇṭikāṃ citraghaṇṭā ca mahāmāyā ca tāluke ||25||

कौमारी दाँतों की, चण्डिका कंठ-प्रदेश की, चित्रघण्टा गले की घंटी की और महामाया तालु की रक्षा करें।

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला । ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ॥26॥

kāmākṣī cibukaṃ rakṣed vācaṃ me sarvamaṅgalā | grīvāyāṃ bhadrakālī ca pṛṣṭhavaṃśe dhanurdharī ||26||

कामाक्षी ठोड़ी की, सर्वमंगला मेरी वाणी की, भद्रकाली गर्दन की और धनुर्धरी रीढ़ की रक्षा करें।

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी । स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी ॥27॥

nīlagrīvā bahiḥkaṇṭhe nalikāṃ nalakūbarī | skandhayoḥ khaḍginī rakṣed bāhū me vajradhāriṇī ||27||

नीलग्रीवा गले के बाहरी भाग की, नलकूबरी कंठ-नली की, खड्गिनी दोनों कंधों की और वज्रधारिणी मेरी दोनों भुजाओं की रक्षा करें।

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च । नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ॥28॥

hastayordaṇḍinī rakṣedambikā cāṅgulīṣu ca | nakhāñchūleśvarī rakṣetkukṣau rakṣetkuleśvarī ||28||

दण्डिनी दोनों हाथों की, अम्बिका उँगलियों की, शूलेश्वरी नाखूनों की और कुलेश्वरी पेट की रक्षा करें।

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी । हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ॥29॥

stanau rakṣenmahādevī manaḥ śokavināśinī | hṛdaye lalitā devī udare śūladhāriṇī ||29||

महादेवी वक्ष की, शोकविनाशिनी मन की, ललिता देवी हृदय की और शूलधारिणी उदर की रक्षा करें।

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा । पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥30॥

nābhau ca kāminī rakṣed guhyaṃ guhyeśvarī tathā | pūtanā kāmikā meḍhraṃ gude mahiṣavāhinī ||30||

कामिनी नाभि की, गुह्येश्वरी गुप्त अंग की, पूतना और कामिका जननेंद्रिय की, और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें।

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी । जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥31॥

kaṭyāṃ bhagavatī rakṣejjānunī vindhyavāsinī | jaṅghe mahābalā rakṣetsarvakāmapradāyinī ||31||

भगवती कमर की, विन्ध्यवासिनी घुटनों की, और सब कामनाएँ पूरी करने वाली महाबला पिंडलियों की रक्षा करें।

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी । पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ॥32॥

gulphayornārasiṃhī ca pādapṛṣṭhe tu taijasī | pādāṅgulīṣu śrī rakṣetpādādhastalavāsinī ||32||

नारसिंही टखनों की, तैजसी पैरों के ऊपरी भाग की, श्री पैरों की उँगलियों की और तलवासिनी तलवों की रक्षा करें।

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी । रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा ॥33॥

nakhān daṃṣṭrākarālī ca keśāṃścaivordhvakeśinī | romakūpeṣu kauberī tvacaṃ vāgīśvarī tathā ||33||

दंष्ट्राकराली नाखूनों की, ऊर्ध्वकेशिनी बालों की, कौबेरी रोमकूपों की और वागीश्वरी त्वचा की रक्षा करें।

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती । अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ॥34॥

raktamajjāvasāmāṃsānyasthimedāṃsi pārvatī | antrāṇi kālarātriśca pittaṃ ca mukuṭeśvarī ||34||

पार्वती रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की रक्षा करें; कालरात्रि आँतों की और मुकुटेश्वरी पित्त की।

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा । ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु ॥35॥

padmāvatī padmakośe kaphe cūḍāmaṇistathā | jvālāmukhī nakhajvālāmabhedyā sarvasandhiṣu ||35||

पद्मावती पद्मकोश (हृदय-कमल) में, चूडामणि कफ में, ज्वालामुखी नखों के तेज में और अभेद्या सब जोड़ों में रक्षा करें।

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा । अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ॥36॥

śukraṃ brahmāṇi me rakṣecchāyāṃ chatreśvarī tathā | ahaṃkāraṃ mano buddhiṃ rakṣenme dharmadhāriṇī ||36||

ब्रह्माणी मेरे वीर्य की, छत्रेश्वरी छाया की, और धर्मधारिणी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करें।

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् । वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ॥37॥

prāṇāpānau tathā vyānamudānaṃ ca samānakam | vajrahastā ca me rakṣetprāṇaṃ kalyāṇaśobhanā ||37||

वज्रहस्ता प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करें, और कल्याणशोभना मेरे प्राण (जीवन) की।

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी । सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ॥38॥

rase rūpe ca gandhe ca śabde sparśe ca yoginī | sattvaṃ rajastamaścaiva rakṣennārāyaṇī sadā ||38||

योगिनी रस, रूप, गंध, शब्द और स्पर्श में रक्षा करें, और नारायणी सदा सत्त्व, रज और तम की रक्षा करें।

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी । यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ॥39॥

āyū rakṣatu vārāhī dharmaṃ rakṣatu vaiṣṇavī | yaśaḥ kīrtiṃ ca lakṣmīṃ ca dhanaṃ vidyāṃ ca cakriṇī ||39||

वाराही आयु की, वैष्णवी धर्म की, और चक्रिणी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन और विद्या की रक्षा करें।

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके । पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ॥40॥

gotramindrāṇi me rakṣetpaśūnme rakṣa caṇḍike | putrān rakṣenmahālakṣmīrbhāryāṃ rakṣatu bhairavī ||40||

इन्द्राणी मेरे गोत्र (कुल) की रक्षा करें; हे चण्डिके, मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की और भैरवी पत्नी की रक्षा करें।

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा । राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ॥41॥

panthānaṃ supathā rakṣenmārgaṃ kṣemakarī tathā | rājadvāre mahālakṣmīrvijayā sarvataḥ sthitā ||41||

सुपथा यात्रा में और क्षेमकरी मार्ग में रक्षा करें। राजा के द्वार पर महालक्ष्मी और सब ओर स्थित विजया रक्षा करें।

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु । तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ॥42॥

rakṣāhīnaṃ tu yatsthānaṃ varjitaṃ kavacena tu | tatsarvaṃ rakṣa me devi jayantī pāpanāśinī ||42||

हे देवी! जो स्थान रक्षा से रहित रह गया हो और कवच में न आया हो, उस सबकी — हे पापों का नाश करने वाली जयन्ती — तुम रक्षा करो।

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः । कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ॥43॥

padamekaṃ na gacchettu yadīcchecchubhamātmanaḥ | kavacenāvṛto nityaṃ yatra yatraiva gacchati ||43||

जो अपना कल्याण चाहे, वह कवच के बिना एक पग भी न चले। कवच से ढका हुआ मनुष्य जहाँ-जहाँ जाता है…

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः । यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् । परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ॥44॥

tatra tatrārthalābhaśca vijayaḥ sārvakāmikaḥ | yaṃ yaṃ cintayate kāmaṃ taṃ taṃ prāpnoti niścitam | paramaiśvaryamatulaṃ prāpsyate bhūtale pumān ||44||

…वहाँ-वहाँ उसे धन का लाभ और सब कामनाएँ पूरी करने वाली विजय मिलती है। वह जिस-जिस कामना का चिंतन करता है, उसे निश्चय ही पाता है। ऐसा मनुष्य पृथ्वी पर अतुलनीय परम ऐश्वर्य पाता है।

निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः । त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ॥45॥

nirbhayo jāyate martyaḥ saṃgrāmeṣvaparājitaḥ | trailokye tu bhavetpūjyaḥ kavacenāvṛtaḥ pumān ||45||

कवच से ढका हुआ मनुष्य निर्भय हो जाता है, युद्धों में पराजित नहीं होता और तीनों लोकों में पूजनीय होता है।

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् । यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ॥46॥

idaṃ tu devyāḥ kavacaṃ devānāmapi durlabham | yaḥ paṭhetprayato nityaṃ trisandhyaṃ śraddhayānvitaḥ ||46||

देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। जो प्रतिदिन तीनों संध्याओं में पवित्र होकर श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है…

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः । जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ॥47॥

daivī kalā bhavettasya trailokyeṣvaparājitaḥ | jīved varṣaśataṃ sāgramapamṛtyuvivarjitaḥ ||47||

…उसे दैवी शक्ति प्राप्त होती है, वह तीनों लोकों में अपराजित रहता है, और अकाल मृत्यु से बचकर सौ से अधिक वर्ष जीता है।

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः । स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ॥48॥

naśyanti vyādhayaḥ sarve lūtāvisphoṭakādayaḥ | sthāvaraṃ jaṅgamaṃ caiva kṛtrimaṃ cāpi yadviṣam ||48||

मकड़ी के विष से होने वाले रोग, फोड़े-फुंसी आदि सब व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। स्थावर (पौधों-खनिजों का), जंगम (जीवों का) और बनाया हुआ — जो भी विष हो…

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले । भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः ॥49॥

abhicārāṇi sarvāṇi mantrayantrāṇi bhūtale | bhūcarāḥ khecarāścaiva jalajāścopadeśikāḥ ||49||

…पृथ्वी पर होने वाले सब अभिचार-प्रयोग और मन्त्र-यन्त्र; धरती पर, आकाश में और जल में विचरने वाले, और उपदेश से सिद्ध किए गए उपद्रव…

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा । अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ॥50॥

sahajā kulajā mālā ḍākinī śākinī tathā | antarikṣacarā ghorā ḍākinyaśca mahābalāḥ ||50||

…सहजा, कुलजा, माला, डाकिनी, शाकिनी, और आकाश में घूमने वाली घोर व महाबली डाकिनियाँ…

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः । ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥51॥

grahabhūtapiśācāśca yakṣagandharvarākṣasāḥ | brahmarākṣasavetālāḥ kūṣmāṇḍā bhairavādayaḥ ||51||

…ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि…

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते । मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ॥52॥

naśyanti darśanāttasya kavace hṛdi saṃsthite | mānonnatirbhaved rājñastejovṛddhikaraṃ param ||52||

…हृदय में कवच स्थित होने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। राजा से उसका सम्मान बढ़ता है; यह कवच परम तेज बढ़ाने वाला है।

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले । जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ॥53॥

yaśasā vardhate so'pi kīrtimaṇḍitabhūtale | japetsaptaśatīṃ caṇḍīṃ kṛtvā tu kavacaṃ purā ||53||

वह मनुष्य कीर्ति से सुशोभित पृथ्वी पर यश से बढ़ता है। पहले कवच का पाठ करके फिर चण्डी सप्तशती का जप करना चाहिए।

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् । तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी ॥54॥

yāvadbhūmaṇḍalaṃ dhatte saśailavanakānanam | tāvattiṣṭhati medinyāṃ santatiḥ putrapautrikī ||54||

जब तक पर्वतों, वनों और जंगलों सहित यह भूमण्डल टिका है, तब तक पृथ्वी पर उसकी पुत्र-पौत्रों वाली संतान-परंपरा बनी रहती है।

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् । प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ॥55॥

dehānte paramaṃ sthānaṃ yatsurairapi durlabham | prāpnoti puruṣo nityaṃ mahāmāyāprasādataḥ ||55||

देह छूटने पर वह मनुष्य महामाया की कृपा से वह परम धाम पाता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॐ ॥56॥

labhate paramaṃ rūpaṃ śivena saha modate oṃ ||56||

वह परम दिव्य रूप पाता है और भगवान शिव के साथ आनंद करता है।

फलश्रुति (पाठ का फल बताने वाले श्लोक) इस स्तोत्र का अपना कथन है — अर्थ में हमने वही भाव रखा है। यह परंपरा की श्रद्धा है, किसी परिणाम की गारंटी नहीं।

पाठ और अर्थ का स्रोत

मूल पाठ: संस्कृत विकिस्रोत (CC BY-SA 4.0) के आधार पर; श्लोकों का क्रम और विभाजन द्रिक पंचांग के पाठ से (जो गीता प्रेस का क्रम मानता है), और जहाँ उपलब्ध हो वहाँ sanskritdocuments.org से भी शब्द-दर-शब्द मिलाया गया है; तीनों रहस्यों में द्रिक, वाचस्पत्यम् (विकिस्रोत) और स्तोत्रनिधि का बहुमत लिया गया है। स्रोतों में जो भी अंतर मिला, वह हाथ से जाँचा गया है। अर्थ: मूल संस्कृत से; ऋग्वेद के सूक्तों में R. T. H. Griffith (1896) के अनुवाद से मिलाकर। CC BY-SA 4.0

देवी कवच — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न