तृतीय अध्याय — महिषासुरवध

श्रीदुर्गासप्तशती · मध्यम चरित्र

44 मंत्र — मूल संस्कृत, IAST और सरल हिंदी अर्थ के साथ।

इस अध्याय में

युद्ध आगे बढ़ता है। देवी एक-एक करके असुर सेनापतियों को हराती हैं, और अंत में महिषासुर का वध करती हैं।

॥ महिषासुरवधो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥

ॐ ऋषिरुवाच ॥1॥

oṃ ṛṣiruvāca ||1||

ऋषि बोले।

निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः । सेनानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्धुमथाम्बिकाम् ॥2॥

nihanyamānaṃ tatsainyamavalokya mahāsuraḥ | senānīścikṣuraḥ kopādyayau yoddhumathāmbikām ||2||

अपनी सेना को इस तरह नष्ट होते देखकर महिषासुर का सेनापति, महान असुर चिक्षुर, क्रोध से अम्बिका से लड़ने आगे बढ़ा।

स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः । यथा मेरुगिरेः शृङ्गं तोयवर्षेण तोयदः ॥3॥

sa devīṃ śaravarṣeṇa vavarṣa samare'suraḥ | yathā merugireḥ śṛṅgaṃ toyavarṣeṇa toyadaḥ ||3||

उस असुर ने रण में देवी पर बाणों की ऐसी वर्षा की, जैसे बादल सुमेरु पर्वत की चोटी पर जल बरसाता है।

तस्यच्छित्त्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान् । जघान तुरगान् बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम् ॥4॥

tasyacchittvā tato devī līlayaiva śarotkarān | jaghāna turagān bāṇairyantāraṃ caiva vājinām ||4||

तब देवी ने खेल-खेल में उसके बाणों के झुंड काट डाले, और अपने बाणों से उसके घोड़ों और सारथी को मार गिराया।

चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छ्रितम् । विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः ॥5॥

ciccheda ca dhanuḥ sadyo dhvajaṃ cātisamucchritam | vivyādha caiva gātreṣu chinnadhanvānamāśugaiḥ ||5||

फिर तुरंत उसका धनुष और बहुत ऊँची ध्वजा काट दी, और टूटे धनुष वाले उस असुर के अंगों को तेज़ बाणों से बींध दिया।

सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । अभ्यधावत तां देवीं खड्गचर्मधरोऽसुरः ॥6॥

sacchinnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ | abhyadhāvata tāṃ devīṃ khaḍgacarmadharo'suraḥ ||6||

धनुष टूट जाने, रथ बेकार होने, घोड़ों और सारथी के मारे जाने पर वह असुर तलवार और ढाल लेकर देवी की ओर दौड़ा।

सिंहमाहत्य खड्गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि । आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान् ॥7॥

siṃhamāhatya khaḍgena tīkṣṇadhāreṇa mūrdhani | ājaghāna bhuje savye devīmapyativegavān ||7||

बड़ी तेज़ी से उसने तेज़ धार वाली तलवार से सिंह के सिर पर वार किया, और देवी की बाईं भुजा पर भी प्रहार किया।

तस्याः खड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन । ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः ॥8॥

tasyāḥ khaḍgo bhujaṃ prāpya paphāla nṛpanandana | tato jagrāha śūlaṃ sa kopādaruṇalocanaḥ ||8||

हे राजकुमार! देवी की भुजा से टकराते ही उसकी तलवार टुकड़े-टुकड़े हो गई। तब क्रोध से लाल आँखें किए उसने शूल उठाया…

चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः । जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात् ॥9॥

cikṣepa ca tatastattu bhadrakālyāṃ mahāsuraḥ | jājvalyamānaṃ tejobhī ravibimbamivāmbarāt ||9||

…और उस महान असुर ने वह शूल भद्रकाली पर फेंका, जो अपने तेज से ऐसे जल रहा था जैसे आकाश से सूर्य का बिंब गिर रहा हो।

दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत । तच्छूलं शतधा तेन नीतं स च महासुरः ॥10॥

dṛṣṭvā tadāpatacchūlaṃ devī śūlamamuñcata | tacchūlaṃ śatadhā tena nītaṃ sa ca mahāsuraḥ ||10||

उस शूल को अपनी ओर आते देखकर देवी ने अपना शूल चलाया। उससे वह शूल सौ टुकड़ों में बिखर गया, और वह महान असुर भी मारा गया।

हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ । आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः ॥11॥

hate tasminmahāvīrye mahiṣasya camūpatau | ājagāma gajārūḍhaścāmarastridaśārdanaḥ ||11||

महिषासुर के उस महापराक्रमी सेनापति के मारे जाने पर, देवताओं को सताने वाला चामर हाथी पर चढ़कर आया।

सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम् । हुङ्काराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम् ॥12॥

so'pi śaktiṃ mumocātha devyāstāmambikā drutam | huṅkārābhihatāṃ bhūmau pātayāmāsa niṣprabhām ||12||

उसने भी देवी पर शक्ति चलाई। अम्बिका ने अपने हुंकार से उसे तेजहीन करके तुरंत धरती पर गिरा दिया।

भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः । चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत् ॥13॥

bhagnāṃ śaktiṃ nipatitāṃ dṛṣṭvā krodhasamanvitaḥ | cikṣepa cāmaraḥ śūlaṃ bāṇaistadapi sācchinat ||13||

अपनी शक्ति को टूटकर गिरी देखकर चामर ने क्रोध में भरकर शूल फेंका, पर देवी ने उसे भी बाणों से काट दिया।

ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः । बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा ॥14॥

tataḥ siṃhaḥ samutpatya gajakumbhāntare sthitaḥ | bāhuyuddhena yuyudhe tenoccaistridaśāriṇā ||14||

तब सिंह उछलकर हाथी के मस्तक के बीच जा बैठा, और देवताओं के उस शत्रु से ऊपर ही हाथापाई करने लगा।

युद्ध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ । युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः ॥15॥

yuddhyamānau tatastau tu tasmānnāgānmahīṃ gatau | yuyudhāte'tisaṃrabdhau prahārairatidāruṇaiḥ ||15||

लड़ते-लड़ते वे दोनों उस हाथी से धरती पर आ गिरे, और अत्यंत क्रोध में भरकर भयानक प्रहारों से लड़ने लगे।

ततो वेगात् खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा । करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक्कृतम् ॥16॥

tato vegāt khamutpatya nipatya ca mṛgāriṇā | karaprahāreṇa śiraścāmarasya pṛthakkṛtam ||16||

फिर सिंह ने तेज़ी से आकाश में उछलकर, नीचे आते हुए पंजे के प्रहार से चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया।

उदग्रश्च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः । दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च निपातितः ॥17॥

udagraśca raṇe devyā śilāvṛkṣādibhirhataḥ | dantamuṣṭitalaiścaiva karālaśca nipātitaḥ ||17||

रण में देवी ने उदग्र को शिलाओं और वृक्षों आदि से मार डाला, और कराल को भी दाँतों, मुक्कों और थप्पड़ों से गिरा दिया।

देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम् । बाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम् ॥18॥

devī kruddhā gadāpātaiścūrṇayāmāsa coddhatam | bāṣkalaṃ bhindipālena bāṇaistāmraṃ tathāndhakam ||18||

क्रोधित देवी ने गदा के प्रहारों से उद्धत को चूर-चूर कर दिया, भिंदिपाल से बाष्कल को, और बाणों से ताम्र और अंधक को मार डाला।

उग्रास्यमुग्रवीर्यं च तथैव च महाहनुम् । त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी ॥19॥

ugrāsyamugravīryaṃ ca tathaiva ca mahāhanum | trinetrā ca triśūlena jaghāna parameśvarī ||19||

तीन नेत्रों वाली परमेश्वरी ने उग्रास्य, उग्रवीर्य और महाहनु को भी त्रिशूल से मार डाला।

बिडालस्यासिना कायात्पातयामास वै शिरः । दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥20॥

biḍālasyāsinā kāyātpātayāmāsa vai śiraḥ | durdharaṃ durmukhaṃ cobhau śarairninye yamakṣayam ||20||

तलवार से बिडाल का सिर धड़ से गिरा दिया, और दुर्धर तथा दुर्मुख — दोनों को बाणों से यमलोक पहुँचा दिया।

एवं संक्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः । माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान् ॥21॥

evaṃ saṃkṣīyamāṇe tu svasainye mahiṣāsuraḥ | māhiṣeṇa svarūpeṇa trāsayāmāsa tān gaṇān ||21||

इस प्रकार अपनी सेना को नष्ट होते देखकर महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण करके देवी के गणों को भयभीत करना शुरू किया।

कांश्चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान् । लाङ्गूलताडितांश्चान्याञ्छृङ्गाभ्यां च विदारितान् ॥22॥

kāṃścittuṇḍaprahāreṇa khurakṣepaistathāparān | lāṅgūlatāḍitāṃścānyāñchṛṅgābhyāṃ ca vidāritān ||22||

किसी को थूथन के प्रहार से, किसी को खुरों की ठोकर से, किसी को पूँछ की मार से, और किसी को सींगों से चीरकर…

वेगेन कांश्चिदपरान्नादेन भ्रमणेन च । निश्वासपवनेनान्यान् पातयामास भूतले ॥23॥

vegena kāṃścidaparānnādena bhramaṇena ca | niśvāsapavanenānyān pātayāmāsa bhūtale ||23||

…किसी को वेग से, किसी को गर्जना और चक्कर लगाने से, और किसी को साँस की आँधी से — उसने धरती पर गिरा दिया।

निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः । सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका ॥24॥

nipātya pramathānīkamabhyadhāvata so'suraḥ | siṃhaṃ hantuṃ mahādevyāḥ kopaṃ cakre tato'mbikā ||24||

गणों की सेना को गिराकर वह असुर महादेवी के सिंह को मारने दौड़ा। इस पर अम्बिका को क्रोध आया।

सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः । शृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च ॥25॥

so'pi kopānmahāvīryaḥ khurakṣuṇṇamahītalaḥ | śṛṅgābhyāṃ parvatānuccāṃścikṣepa ca nanāda ca ||25||

वह महापराक्रमी भी क्रोध से खुरों से धरती को रौंदता हुआ, सींगों से ऊँचे पर्वतों को उछालने और गरजने लगा।

वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत । लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः ॥26॥

vegabhramaṇavikṣuṇṇā mahī tasya vyaśīryata | lāṅgūlenāhataścābdhiḥ plāvayāmāsa sarvataḥ ||26||

उसके वेग से चक्कर काटने से धरती कुचलकर बिखरने लगी, और पूँछ की मार से समुद्र चारों ओर उमड़ पड़ा।

धुतशृङ्गविभिन्नाश्च खण्डं खण्डं ययुर्घनाः । श्वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः ॥27॥

dhutaśṛṅgavibhinnāśca khaṇḍaṃ khaṇḍaṃ yayurghanāḥ | śvāsānilāstāḥ śataśo nipeturnabhaso'calāḥ ||27||

हिलते सींगों से बिंधकर बादल टुकड़े-टुकड़े हो गए, और उसकी साँस की आँधी से उड़े सैकड़ों पर्वत आकाश से गिरने लगे।

इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम् । दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत् ॥28॥

iti krodhasamādhmātamāpatantaṃ mahāsuram | dṛṣṭvā sā caṇḍikā kopaṃ tadvadhāya tadākarot ||28||

क्रोध से फूले उस महान असुर को इस प्रकार आते देखकर चण्डिका ने उसके वध के लिए क्रोध किया।

सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम् । तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे ॥29॥

sā kṣiptvā tasya vai pāśaṃ taṃ babandha mahāsuram | tatyāja māhiṣaṃ rūpaṃ so'pi baddho mahāmṛdhe ||29||

देवी ने उस पर पाश फेंककर उस महान असुर को बाँध लिया। उस महासंग्राम में बँध जाने पर उसने भैंसे का रूप छोड़ दिया…

ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः । छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत ॥30॥

tataḥ siṃho'bhavatsadyo yāvattasyāmbikā śiraḥ | chinatti tāvatpuruṣaḥ khaḍgapāṇiradṛśyata ||30||

…और तुरंत सिंह बन गया। जैसे ही अम्बिका उसका सिर काटने लगीं, वह हाथ में तलवार लिए एक पुरुष के रूप में दिखाई दिया।

तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः । तं खड्गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः ॥31॥

tata evāśu puruṣaṃ devī ciccheda sāyakaiḥ | taṃ khaḍgacarmaṇā sārdhaṃ tataḥ so'bhūnmahāgajaḥ ||31||

देवी ने तुरंत बाणों से उस पुरुष को उसकी तलवार और ढाल समेत बींध दिया। तब वह एक विशाल हाथी बन गया…

करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च । कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत ॥32॥

kareṇa ca mahāsiṃhaṃ taṃ cakarṣa jagarja ca | karṣatastu karaṃ devī khaḍgena nirakṛntata ||32||

…और सूँड़ से देवी के महान सिंह को खींचने और गरजने लगा। खींचते समय देवी ने तलवार से उसकी सूँड़ काट डाली।

ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः । तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥33॥

tato mahāsuro bhūyo māhiṣaṃ vapurāsthitaḥ | tathaiva kṣobhayāmāsa trailokyaṃ sacarācaram ||33||

तब वह महान असुर फिर भैंसे के रूप में आ गया, और पहले की तरह चर-अचर सहित तीनों लोकों को क्षुब्ध करने लगा।

ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम् । पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना ॥34॥

tataḥ kruddhā jaganmātā caṇḍikā pānamuttamam | papau punaḥ punaścaiva jahāsāruṇalocanā ||34||

तब क्रोधित जगन्माता चण्डिका बार-बार उत्तम पेय पीने लगीं, और लाल आँखें करके हँसने लगीं।

ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः । विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान् ॥35॥

nanarda cāsuraḥ so'pi balavīryamadoddhataḥ | viṣāṇābhyāṃ ca cikṣepa caṇḍikāṃ prati bhūdharān ||35||

बल, पराक्रम और मद से उन्मत्त वह असुर भी गरजा, और अपने सींगों से चण्डिका की ओर पर्वत फेंकने लगा।

सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः । उवाच तं मदोद्धूतमुखरागाकुलाक्षरम् ॥36॥

sā ca tān prahitāṃstena cūrṇayantī śarotkaraiḥ | uvāca taṃ madoddhūtamukharāgākulākṣaram ||36||

उसके फेंके पर्वतों को बाणों की बौछार से चूर करती हुई देवी, मद से लाल मुख और लड़खड़ाते शब्दों में उससे बोलीं।

देव्युवाच ॥37॥

devyuvāca ||37||

देवी बोलीं।

गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् । मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥38॥

garja garja kṣaṇaṃ mūḍha madhu yāvatpibāmyaham | mayā tvayi hate'traiva garjiṣyantyāśu devatāḥ ||38||

अरे मूढ़! जब तक मैं यह मधु पीती हूँ, तब तक क्षण भर तू गरज ले। मेरे हाथों यहीं तेरे मारे जाने पर शीघ्र ही देवता गरजेंगे।

ऋषिरुवाच ॥39॥

ṛṣiruvāca ||39||

ऋषि बोले।

एवमुक्त्वा समुत्पत्य सारूढा तं महासुरम् । पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत् ॥40॥

evamuktvā samutpatya sārūḍhā taṃ mahāsuram | pādenākramya kaṇṭhe ca śūlenainamatāḍayat ||40||

ऐसा कहकर देवी उछलकर उस महान असुर पर चढ़ गईं, और पैर से उसका गला दबाकर शूल से उस पर प्रहार किया।

ततः सोऽपि पदाक्रान्तस्तया निजमुखात्ततः । अर्धनिष्क्रान्त एवासीद् देव्या वीर्येण संवृतः ॥41॥

tataḥ so'pi padākrāntastayā nijamukhāttataḥ | ardhaniṣkrānta evāsīd devyā vīryeṇa saṃvṛtaḥ ||41||

देवी के पैर से दबे होने पर वह अपने ही मुख से आधा ही बाहर निकल पाया, क्योंकि देवी के पराक्रम ने उसे घेर रखा था।

अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः । तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः ॥42॥

ardhaniṣkrānta evāsau yudhyamāno mahāsuraḥ | tayā mahāsinā devyā śiraśchittvā nipātitaḥ ||42||

आधा निकला हुआ ही वह महान असुर लड़ता रहा, और देवी ने अपनी बड़ी तलवार से उसका सिर काटकर उसे गिरा दिया।

ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत् । प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः ॥43॥

tato hāhākṛtaṃ sarvaṃ daityasainyaṃ nanāśa tat | praharṣaṃ ca paraṃ jagmuḥ sakalā devatāgaṇāḥ ||43||

तब हाहाकार करती हुई दैत्यों की सारी सेना नष्ट हो गई, और सब देवता अत्यंत आनंदित हुए।

तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सह दिव्यैर्महर्षिभिः । जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॐ ॥44॥

tuṣṭuvustāṃ surā devīṃ saha divyairmaharṣibhiḥ | jagurgandharvapatayo nanṛtuścāpsarogaṇāḥ oṃ ||44||

देवताओं ने दिव्य महर्षियों के साथ देवी की स्तुति की। गंधर्वराज गाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं।

पाठ और अर्थ का स्रोत

मूल पाठ: संस्कृत विकिस्रोत के "मार्कण्डेयपुराणम्" (अध्याय 81–93, CC BY-SA 4.0) के आधार पर, sanskritdocuments.org और द्रिक पंचांग के पाठ से शब्द-दर-शब्द मिलाकर — जहाँ स्रोत अलग थे, वहाँ कम से कम दो स्रोतों वाला पाठ लिया गया है। अर्थ: F. E. Pargiter के अंग्रेज़ी अनुवाद (1904) के आधार पर। CC BY-SA 4.0

एक नज़र में

अध्यायतृतीय (3/13)
चरित्रमध्यम चरित्र
देवतामहालक्ष्मी
ऋषिविष्णु
छन्दउष्णिक्
मंत्र44

तृतीय अध्याय — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न