॥ महिषासुरवधो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥
ॐ ऋषिरुवाच ॥1॥
oṃ ṛṣiruvāca ||1||
ऋषि बोले।
निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः । सेनानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्धुमथाम्बिकाम् ॥2॥
nihanyamānaṃ tatsainyamavalokya mahāsuraḥ | senānīścikṣuraḥ kopādyayau yoddhumathāmbikām ||2||
अपनी सेना को इस तरह नष्ट होते देखकर महिषासुर का सेनापति, महान असुर चिक्षुर, क्रोध से अम्बिका से लड़ने आगे बढ़ा।
स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः । यथा मेरुगिरेः शृङ्गं तोयवर्षेण तोयदः ॥3॥
sa devīṃ śaravarṣeṇa vavarṣa samare'suraḥ | yathā merugireḥ śṛṅgaṃ toyavarṣeṇa toyadaḥ ||3||
उस असुर ने रण में देवी पर बाणों की ऐसी वर्षा की, जैसे बादल सुमेरु पर्वत की चोटी पर जल बरसाता है।
तस्यच्छित्त्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान् । जघान तुरगान् बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम् ॥4॥
tasyacchittvā tato devī līlayaiva śarotkarān | jaghāna turagān bāṇairyantāraṃ caiva vājinām ||4||
तब देवी ने खेल-खेल में उसके बाणों के झुंड काट डाले, और अपने बाणों से उसके घोड़ों और सारथी को मार गिराया।
चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छ्रितम् । विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः ॥5॥
ciccheda ca dhanuḥ sadyo dhvajaṃ cātisamucchritam | vivyādha caiva gātreṣu chinnadhanvānamāśugaiḥ ||5||
फिर तुरंत उसका धनुष और बहुत ऊँची ध्वजा काट दी, और टूटे धनुष वाले उस असुर के अंगों को तेज़ बाणों से बींध दिया।
सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । अभ्यधावत तां देवीं खड्गचर्मधरोऽसुरः ॥6॥
sacchinnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ | abhyadhāvata tāṃ devīṃ khaḍgacarmadharo'suraḥ ||6||
धनुष टूट जाने, रथ बेकार होने, घोड़ों और सारथी के मारे जाने पर वह असुर तलवार और ढाल लेकर देवी की ओर दौड़ा।
सिंहमाहत्य खड्गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि । आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान् ॥7॥
siṃhamāhatya khaḍgena tīkṣṇadhāreṇa mūrdhani | ājaghāna bhuje savye devīmapyativegavān ||7||
बड़ी तेज़ी से उसने तेज़ धार वाली तलवार से सिंह के सिर पर वार किया, और देवी की बाईं भुजा पर भी प्रहार किया।
तस्याः खड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन । ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः ॥8॥
tasyāḥ khaḍgo bhujaṃ prāpya paphāla nṛpanandana | tato jagrāha śūlaṃ sa kopādaruṇalocanaḥ ||8||
हे राजकुमार! देवी की भुजा से टकराते ही उसकी तलवार टुकड़े-टुकड़े हो गई। तब क्रोध से लाल आँखें किए उसने शूल उठाया…
चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः । जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात् ॥9॥
cikṣepa ca tatastattu bhadrakālyāṃ mahāsuraḥ | jājvalyamānaṃ tejobhī ravibimbamivāmbarāt ||9||
…और उस महान असुर ने वह शूल भद्रकाली पर फेंका, जो अपने तेज से ऐसे जल रहा था जैसे आकाश से सूर्य का बिंब गिर रहा हो।
दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत । तच्छूलं शतधा तेन नीतं स च महासुरः ॥10॥
dṛṣṭvā tadāpatacchūlaṃ devī śūlamamuñcata | tacchūlaṃ śatadhā tena nītaṃ sa ca mahāsuraḥ ||10||
उस शूल को अपनी ओर आते देखकर देवी ने अपना शूल चलाया। उससे वह शूल सौ टुकड़ों में बिखर गया, और वह महान असुर भी मारा गया।
हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ । आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः ॥11॥
hate tasminmahāvīrye mahiṣasya camūpatau | ājagāma gajārūḍhaścāmarastridaśārdanaḥ ||11||
महिषासुर के उस महापराक्रमी सेनापति के मारे जाने पर, देवताओं को सताने वाला चामर हाथी पर चढ़कर आया।
सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम् । हुङ्काराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम् ॥12॥
so'pi śaktiṃ mumocātha devyāstāmambikā drutam | huṅkārābhihatāṃ bhūmau pātayāmāsa niṣprabhām ||12||
उसने भी देवी पर शक्ति चलाई। अम्बिका ने अपने हुंकार से उसे तेजहीन करके तुरंत धरती पर गिरा दिया।
भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः । चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत् ॥13॥
bhagnāṃ śaktiṃ nipatitāṃ dṛṣṭvā krodhasamanvitaḥ | cikṣepa cāmaraḥ śūlaṃ bāṇaistadapi sācchinat ||13||
अपनी शक्ति को टूटकर गिरी देखकर चामर ने क्रोध में भरकर शूल फेंका, पर देवी ने उसे भी बाणों से काट दिया।
ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः । बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा ॥14॥
tataḥ siṃhaḥ samutpatya gajakumbhāntare sthitaḥ | bāhuyuddhena yuyudhe tenoccaistridaśāriṇā ||14||
तब सिंह उछलकर हाथी के मस्तक के बीच जा बैठा, और देवताओं के उस शत्रु से ऊपर ही हाथापाई करने लगा।
युद्ध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ । युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः ॥15॥
yuddhyamānau tatastau tu tasmānnāgānmahīṃ gatau | yuyudhāte'tisaṃrabdhau prahārairatidāruṇaiḥ ||15||
लड़ते-लड़ते वे दोनों उस हाथी से धरती पर आ गिरे, और अत्यंत क्रोध में भरकर भयानक प्रहारों से लड़ने लगे।
ततो वेगात् खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा । करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक्कृतम् ॥16॥
tato vegāt khamutpatya nipatya ca mṛgāriṇā | karaprahāreṇa śiraścāmarasya pṛthakkṛtam ||16||
फिर सिंह ने तेज़ी से आकाश में उछलकर, नीचे आते हुए पंजे के प्रहार से चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया।
उदग्रश्च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः । दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च निपातितः ॥17॥
udagraśca raṇe devyā śilāvṛkṣādibhirhataḥ | dantamuṣṭitalaiścaiva karālaśca nipātitaḥ ||17||
रण में देवी ने उदग्र को शिलाओं और वृक्षों आदि से मार डाला, और कराल को भी दाँतों, मुक्कों और थप्पड़ों से गिरा दिया।
देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम् । बाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम् ॥18॥
devī kruddhā gadāpātaiścūrṇayāmāsa coddhatam | bāṣkalaṃ bhindipālena bāṇaistāmraṃ tathāndhakam ||18||
क्रोधित देवी ने गदा के प्रहारों से उद्धत को चूर-चूर कर दिया, भिंदिपाल से बाष्कल को, और बाणों से ताम्र और अंधक को मार डाला।
उग्रास्यमुग्रवीर्यं च तथैव च महाहनुम् । त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी ॥19॥
ugrāsyamugravīryaṃ ca tathaiva ca mahāhanum | trinetrā ca triśūlena jaghāna parameśvarī ||19||
तीन नेत्रों वाली परमेश्वरी ने उग्रास्य, उग्रवीर्य और महाहनु को भी त्रिशूल से मार डाला।
बिडालस्यासिना कायात्पातयामास वै शिरः । दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥20॥
biḍālasyāsinā kāyātpātayāmāsa vai śiraḥ | durdharaṃ durmukhaṃ cobhau śarairninye yamakṣayam ||20||
तलवार से बिडाल का सिर धड़ से गिरा दिया, और दुर्धर तथा दुर्मुख — दोनों को बाणों से यमलोक पहुँचा दिया।
एवं संक्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः । माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान् ॥21॥
evaṃ saṃkṣīyamāṇe tu svasainye mahiṣāsuraḥ | māhiṣeṇa svarūpeṇa trāsayāmāsa tān gaṇān ||21||
इस प्रकार अपनी सेना को नष्ट होते देखकर महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण करके देवी के गणों को भयभीत करना शुरू किया।
कांश्चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान् । लाङ्गूलताडितांश्चान्याञ्छृङ्गाभ्यां च विदारितान् ॥22॥
kāṃścittuṇḍaprahāreṇa khurakṣepaistathāparān | lāṅgūlatāḍitāṃścānyāñchṛṅgābhyāṃ ca vidāritān ||22||
किसी को थूथन के प्रहार से, किसी को खुरों की ठोकर से, किसी को पूँछ की मार से, और किसी को सींगों से चीरकर…
वेगेन कांश्चिदपरान्नादेन भ्रमणेन च । निश्वासपवनेनान्यान् पातयामास भूतले ॥23॥
vegena kāṃścidaparānnādena bhramaṇena ca | niśvāsapavanenānyān pātayāmāsa bhūtale ||23||
…किसी को वेग से, किसी को गर्जना और चक्कर लगाने से, और किसी को साँस की आँधी से — उसने धरती पर गिरा दिया।
निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः । सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका ॥24॥
nipātya pramathānīkamabhyadhāvata so'suraḥ | siṃhaṃ hantuṃ mahādevyāḥ kopaṃ cakre tato'mbikā ||24||
गणों की सेना को गिराकर वह असुर महादेवी के सिंह को मारने दौड़ा। इस पर अम्बिका को क्रोध आया।
सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः । शृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च ॥25॥
so'pi kopānmahāvīryaḥ khurakṣuṇṇamahītalaḥ | śṛṅgābhyāṃ parvatānuccāṃścikṣepa ca nanāda ca ||25||
वह महापराक्रमी भी क्रोध से खुरों से धरती को रौंदता हुआ, सींगों से ऊँचे पर्वतों को उछालने और गरजने लगा।
वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत । लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः ॥26॥
vegabhramaṇavikṣuṇṇā mahī tasya vyaśīryata | lāṅgūlenāhataścābdhiḥ plāvayāmāsa sarvataḥ ||26||
उसके वेग से चक्कर काटने से धरती कुचलकर बिखरने लगी, और पूँछ की मार से समुद्र चारों ओर उमड़ पड़ा।
धुतशृङ्गविभिन्नाश्च खण्डं खण्डं ययुर्घनाः । श्वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः ॥27॥
dhutaśṛṅgavibhinnāśca khaṇḍaṃ khaṇḍaṃ yayurghanāḥ | śvāsānilāstāḥ śataśo nipeturnabhaso'calāḥ ||27||
हिलते सींगों से बिंधकर बादल टुकड़े-टुकड़े हो गए, और उसकी साँस की आँधी से उड़े सैकड़ों पर्वत आकाश से गिरने लगे।
इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम् । दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत् ॥28॥
iti krodhasamādhmātamāpatantaṃ mahāsuram | dṛṣṭvā sā caṇḍikā kopaṃ tadvadhāya tadākarot ||28||
क्रोध से फूले उस महान असुर को इस प्रकार आते देखकर चण्डिका ने उसके वध के लिए क्रोध किया।
सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम् । तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे ॥29॥
sā kṣiptvā tasya vai pāśaṃ taṃ babandha mahāsuram | tatyāja māhiṣaṃ rūpaṃ so'pi baddho mahāmṛdhe ||29||
देवी ने उस पर पाश फेंककर उस महान असुर को बाँध लिया। उस महासंग्राम में बँध जाने पर उसने भैंसे का रूप छोड़ दिया…
ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः । छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत ॥30॥
tataḥ siṃho'bhavatsadyo yāvattasyāmbikā śiraḥ | chinatti tāvatpuruṣaḥ khaḍgapāṇiradṛśyata ||30||
…और तुरंत सिंह बन गया। जैसे ही अम्बिका उसका सिर काटने लगीं, वह हाथ में तलवार लिए एक पुरुष के रूप में दिखाई दिया।
तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः । तं खड्गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः ॥31॥
tata evāśu puruṣaṃ devī ciccheda sāyakaiḥ | taṃ khaḍgacarmaṇā sārdhaṃ tataḥ so'bhūnmahāgajaḥ ||31||
देवी ने तुरंत बाणों से उस पुरुष को उसकी तलवार और ढाल समेत बींध दिया। तब वह एक विशाल हाथी बन गया…
करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च । कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत ॥32॥
kareṇa ca mahāsiṃhaṃ taṃ cakarṣa jagarja ca | karṣatastu karaṃ devī khaḍgena nirakṛntata ||32||
…और सूँड़ से देवी के महान सिंह को खींचने और गरजने लगा। खींचते समय देवी ने तलवार से उसकी सूँड़ काट डाली।
ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः । तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥33॥
tato mahāsuro bhūyo māhiṣaṃ vapurāsthitaḥ | tathaiva kṣobhayāmāsa trailokyaṃ sacarācaram ||33||
तब वह महान असुर फिर भैंसे के रूप में आ गया, और पहले की तरह चर-अचर सहित तीनों लोकों को क्षुब्ध करने लगा।
ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम् । पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना ॥34॥
tataḥ kruddhā jaganmātā caṇḍikā pānamuttamam | papau punaḥ punaścaiva jahāsāruṇalocanā ||34||
तब क्रोधित जगन्माता चण्डिका बार-बार उत्तम पेय पीने लगीं, और लाल आँखें करके हँसने लगीं।
ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः । विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान् ॥35॥
nanarda cāsuraḥ so'pi balavīryamadoddhataḥ | viṣāṇābhyāṃ ca cikṣepa caṇḍikāṃ prati bhūdharān ||35||
बल, पराक्रम और मद से उन्मत्त वह असुर भी गरजा, और अपने सींगों से चण्डिका की ओर पर्वत फेंकने लगा।
सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः । उवाच तं मदोद्धूतमुखरागाकुलाक्षरम् ॥36॥
sā ca tān prahitāṃstena cūrṇayantī śarotkaraiḥ | uvāca taṃ madoddhūtamukharāgākulākṣaram ||36||
उसके फेंके पर्वतों को बाणों की बौछार से चूर करती हुई देवी, मद से लाल मुख और लड़खड़ाते शब्दों में उससे बोलीं।
देव्युवाच ॥37॥
devyuvāca ||37||
देवी बोलीं।
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् । मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥38॥
garja garja kṣaṇaṃ mūḍha madhu yāvatpibāmyaham | mayā tvayi hate'traiva garjiṣyantyāśu devatāḥ ||38||
अरे मूढ़! जब तक मैं यह मधु पीती हूँ, तब तक क्षण भर तू गरज ले। मेरे हाथों यहीं तेरे मारे जाने पर शीघ्र ही देवता गरजेंगे।
ऋषिरुवाच ॥39॥
ṛṣiruvāca ||39||
ऋषि बोले।
एवमुक्त्वा समुत्पत्य सारूढा तं महासुरम् । पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत् ॥40॥
evamuktvā samutpatya sārūḍhā taṃ mahāsuram | pādenākramya kaṇṭhe ca śūlenainamatāḍayat ||40||
ऐसा कहकर देवी उछलकर उस महान असुर पर चढ़ गईं, और पैर से उसका गला दबाकर शूल से उस पर प्रहार किया।
ततः सोऽपि पदाक्रान्तस्तया निजमुखात्ततः । अर्धनिष्क्रान्त एवासीद् देव्या वीर्येण संवृतः ॥41॥
tataḥ so'pi padākrāntastayā nijamukhāttataḥ | ardhaniṣkrānta evāsīd devyā vīryeṇa saṃvṛtaḥ ||41||
देवी के पैर से दबे होने पर वह अपने ही मुख से आधा ही बाहर निकल पाया, क्योंकि देवी के पराक्रम ने उसे घेर रखा था।
अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः । तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः ॥42॥
ardhaniṣkrānta evāsau yudhyamāno mahāsuraḥ | tayā mahāsinā devyā śiraśchittvā nipātitaḥ ||42||
आधा निकला हुआ ही वह महान असुर लड़ता रहा, और देवी ने अपनी बड़ी तलवार से उसका सिर काटकर उसे गिरा दिया।
ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत् । प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः ॥43॥
tato hāhākṛtaṃ sarvaṃ daityasainyaṃ nanāśa tat | praharṣaṃ ca paraṃ jagmuḥ sakalā devatāgaṇāḥ ||43||
तब हाहाकार करती हुई दैत्यों की सारी सेना नष्ट हो गई, और सब देवता अत्यंत आनंदित हुए।
तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सह दिव्यैर्महर्षिभिः । जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॐ ॥44॥
tuṣṭuvustāṃ surā devīṃ saha divyairmaharṣibhiḥ | jagurgandharvapatayo nanṛtuścāpsarogaṇāḥ oṃ ||44||
देवताओं ने दिव्य महर्षियों के साथ देवी की स्तुति की। गंधर्वराज गाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं।
