॥ महिषासुरसैन्यवधो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥
ॐ ह्रीं ऋषिरुवाच ॥1॥
oṃ hrīṃ ṛṣiruvāca ||1||
ऋषि बोले।
देवासुरमभूद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा । महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे ॥2॥
devāsuramabhūdyuddhaṃ pūrṇamabdaśataṃ purā | mahiṣe'surāṇāmadhipe devānāṃ ca purandare ||2||
पहले देवताओं और असुरों में पूरे सौ वर्ष तक युद्ध हुआ। उस समय असुरों का स्वामी महिषासुर था और देवताओं के स्वामी इंद्र।
तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम् । जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः ॥3॥
tatrāsurairmahāvīryairdevasainyaṃ parājitam | jitvā ca sakalān devānindro'bhūnmahiṣāsuraḥ ||3||
उस युद्ध में महापराक्रमी असुरों ने देवताओं की सेना को हरा दिया, और सब देवताओं को जीतकर महिषासुर स्वयं इंद्र बन बैठा।
ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम् । पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ ॥4॥
tataḥ parājitā devāḥ padmayoniṃ prajāpatim | puraskṛtya gatāstatra yatreśagaruḍadhvajau ||4||
तब हारे हुए देवता प्रजापति ब्रह्मा जी को आगे करके वहाँ गए, जहाँ भगवान शिव और गरुड़ध्वज विष्णु विराजते थे।
यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम् । त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम् ॥5॥
yathāvṛttaṃ tayostadvanmahiṣāsuraceṣṭitam | tridaśāḥ kathayāmāsurdevābhibhavavistaram ||5||
देवताओं ने उन दोनों को महिषासुर के कार्य और अपनी पराजय का सारा वृत्तांत ज्यों का त्यों विस्तार से सुनाया।
सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च । अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति ॥6॥
sūryendrāgnyanilendūnāṃ yamasya varuṇasya ca | anyeṣāṃ cādhikārān sa svayamevādhitiṣṭhati ||6||
"वह महिषासुर सूर्य, इंद्र, अग्नि, वायु, चंद्रमा, यम, वरुण और दूसरे देवताओं के अधिकार स्वयं ही भोग रहा है।
स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि । विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना ॥7॥
svargānnirākṛtāḥ sarve tena devagaṇā bhuvi | vicaranti yathā martyā mahiṣeṇa durātmanā ||7||
उस दुरात्मा महिषासुर ने सब देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया है, और वे मनुष्यों की तरह पृथ्वी पर भटक रहे हैं।
एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम् । शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ॥8॥
etadvaḥ kathitaṃ sarvamamarāriviceṣṭitam | śaraṇaṃ vaḥ prapannāḥ smo vadhastasya vicintyatām ||8||
देवताओं के शत्रु की सारी करतूत हमने आपको बता दी। हम आपकी शरण में आए हैं — उसके वध का उपाय सोचिए।"
इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः । चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ ॥9॥
itthaṃ niśamya devānāṃ vacāṃsi madhusūdanaḥ | cakāra kopaṃ śambhuśca bhrukuṭīkuṭilānanau ||9||
देवताओं की ये बातें सुनकर भगवान मधुसूदन और शंभु को बड़ा क्रोध आया, और उनकी भौंहें तन गईं।
ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः । निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शङ्करस्य च ॥10॥
tato'tikopapūrṇasya cakriṇo vadanāttataḥ | niścakrāma mahattejo brahmaṇaḥ śaṅkarasya ca ||10||
तब अत्यंत क्रोध से भरे चक्रधारी विष्णु के मुख से महान तेज निकला, और ब्रह्मा तथा शंकर के मुख से भी।
अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः । निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥11॥
anyeṣāṃ caiva devānāṃ śakrādīnāṃ śarīrataḥ | nirgataṃ sumahattejastaccaikyaṃ samagacchata ||11||
इंद्र आदि दूसरे देवताओं के शरीरों से भी बहुत बड़ा तेज निकला, और वह सब तेज एक होकर मिल गया।
अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् । ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥12॥
atīva tejasaḥ kūṭaṃ jvalantamiva parvatam | dadṛśuste surāstatra jvālāvyāptadigantaram ||12||
देवताओं ने देखा कि तेज का वह पुंज जलते हुए पर्वत जैसा है, और उसकी ज्वालाएँ सब दिशाओं में फैल रही हैं।
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् । एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥13॥
atulaṃ tatra tattejaḥ sarvadevaśarīrajam | ekasthaṃ tadabhūnnārī vyāptalokatrayaṃ tviṣā ||13||
सब देवताओं के शरीरों से निकला वह अनुपम तेज एक जगह इकट्ठा होकर एक नारी बन गया, जिसकी प्रभा से तीनों लोक भर गए।
यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम् । याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥14॥
yadabhūcchāmbhavaṃ tejastenājāyata tanmukham | yāmyena cābhavan keśā bāhavo viṣṇutejasā ||14||
शिव के तेज से देवी का मुख बना, यम के तेज से केश और विष्णु के तेज से भुजाएँ।
सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत् । वारुणेन च जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः ॥15॥
saumyena stanayoryugmaṃ madhyaṃ caindreṇa cābhavat | vāruṇena ca jaṅghorū nitambastejasā bhuvaḥ ||15||
चंद्रमा के तेज से दोनों स्तन, इंद्र के तेज से कमर, वरुण के तेज से जाँघें और पिंडलियाँ, और पृथ्वी के तेज से नितंब बने।
ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा । वसूनां च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका ॥16॥
brahmaṇastejasā pādau tadaṅgulyo'rkatejasā | vasūnāṃ ca karāṅgulyaḥ kaubereṇa ca nāsikā ||16||
ब्रह्मा के तेज से दोनों चरण, सूर्य के तेज से पैरों की उँगलियाँ, वसुओं के तेज से हाथों की उँगलियाँ और कुबेर के तेज से नासिका बनी।
तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा । नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥17॥
tasyāstu dantāḥ sambhūtāḥ prājāpatyena tejasā | nayanatritayaṃ jajñe tathā pāvakatejasā ||17||
प्रजापति के तेज से देवी के दाँत बने, और अग्नि के तेज से तीनों नेत्र प्रकट हुए।
भ्रुवौ च सन्ध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च । अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥18॥
bhruvau ca sandhyayostejaḥ śravaṇāvanilasya ca | anyeṣāṃ caiva devānāṃ sambhavastejasāṃ śivā ||18||
दोनों संध्याओं के तेज से भौंहें और वायु के तेज से कान बने। दूसरे देवताओं के तेज से भी वे कल्याणमयी देवी प्रकट हुईं।
ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम् । तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः ॥19॥
tataḥ samastadevānāṃ tejorāśisamudbhavām | tāṃ vilokya mudaṃ prāpuramarā mahiṣārditāḥ ||19||
सब देवताओं के तेज-पुंज से प्रकट हुई उन देवी को देखकर, महिषासुर से पीड़ित देवता बहुत आनंदित हुए।
शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक् । चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाद्य स्वचक्रतः ॥20॥
śūlaṃ śūlādviniṣkṛṣya dadau tasyai pinākadhṛk | cakraṃ ca dattavān kṛṣṇaḥ samutpādya svacakrataḥ ||20||
पिनाकधारी शिव ने अपने त्रिशूल से एक त्रिशूल निकालकर उन्हें दिया, और भगवान विष्णु ने अपने चक्र से एक चक्र उत्पन्न करके दिया।
शङ्खं च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः । मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी ॥21॥
śaṅkhaṃ ca varuṇaḥ śaktiṃ dadau tasyai hutāśanaḥ | māruto dattavāṃścāpaṃ bāṇapūrṇe tatheṣudhī ||21||
वरुण ने शंख दिया, अग्नि ने शक्ति, और वायु ने धनुष तथा बाणों से भरे दो तरकश दिए।
वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य कुलिशादमराधिपः । ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात् ॥22॥
vajramindraḥ samutpādya kuliśādamarādhipaḥ | dadau tasyai sahasrākṣo ghaṇṭāmairāvatād gajāt ||22||
देवराज सहस्राक्ष इंद्र ने अपने वज्र से एक वज्र उत्पन्न करके दिया, और ऐरावत हाथी से उतारकर एक घंटा भी दिया।
कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ । प्रजापतिश्चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ॥23॥
kāladaṇḍādyamo daṇḍaṃ pāśaṃ cāmbupatirdadau | prajāpatiścākṣamālāṃ dadau brahmā kamaṇḍalum ||23||
यम ने कालदंड से एक दंड दिया, जल के स्वामी वरुण ने पाश, प्रजापति ने अक्षमाला और ब्रह्मा जी ने कमंडलु दिया।
समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः । कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म च निर्मलम् ॥24॥
samastaromakūpeṣu nijaraśmīn divākaraḥ | kālaśca dattavān khaḍgaṃ tasyāścarma ca nirmalam ||24||
सूर्य ने देवी के सब रोमकूपों में अपनी किरणें भर दीं। काल ने चमकती तलवार और निर्मल ढाल दी।
क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे । चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च ॥25॥
kṣīrodaścāmalaṃ hāramajare ca tathāmbare | cūḍāmaṇiṃ tathā divyaṃ kuṇḍale kaṭakāni ca ||25||
क्षीरसागर ने निर्मल हार और कभी न पुराने होने वाले दो वस्त्र दिए, साथ ही दिव्य चूड़ामणि, दो कुंडल और कड़े दिए।
अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु । नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम् ॥26॥
ardhacandraṃ tathā śubhraṃ keyūrān sarvabāhuṣu | nūpurau vimalau tadvad graiveyakamanuttamam ||26||
उज्ज्वल अर्धचंद्र, सब भुजाओं के लिए केयूर, दो निर्मल नूपुर और गले का सुंदर हार भी दिया।
अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु च । विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम् ॥27॥
aṅgulīyakaratnāni samastāsvaṅgulīṣu ca | viśvakarmā dadau tasyai paraśuṃ cātinirmalam ||27||
सब उँगलियों के लिए रत्नजड़ित अँगूठियाँ दीं। विश्वकर्मा ने उन्हें अत्यंत निर्मल फरसा दिया…
अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम् । अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम् ॥28॥
astrāṇyanekarūpāṇi tathābhedyaṃ ca daṃśanam | amlānapaṅkajāṃ mālāṃ śirasyurasi cāparām ||28||
…अनेक प्रकार के अस्त्र और अभेद्य कवच भी दिया। समुद्र ने सिर और वक्ष के लिए कभी न मुरझाने वाले कमलों की मालाएँ…
अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम् । हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च ॥29॥
adadajjaladhistasyai paṅkajaṃ cātiśobhanam | himavān vāhanaṃ siṃhaṃ ratnāni vividhāni ca ||29||
…और एक अत्यंत सुंदर कमल दिया। हिमालय ने सवारी के लिए सिंह और तरह-तरह के रत्न दिए।
ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः । शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम् ॥30॥
dadāvaśūnyaṃ surayā pānapātraṃ dhanādhipaḥ | śeṣaśca sarvanāgeśo mahāmaṇivibhūṣitam ||30||
धन के स्वामी कुबेर ने मधु से भरा पानपात्र दिया। और सब नागों के राजा शेषनाग ने, जो इस पृथ्वी को धारण करते हैं…
नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम् । अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा ॥31॥
nāgahāraṃ dadau tasyai dhatte yaḥ pṛthivīmimām | anyairapi surairdevī bhūṣaṇairāyudhaistathā ||31||
…बड़ी-बड़ी मणियों से सजा नागहार उन्हें दिया। दूसरे देवताओं ने भी आभूषणों और अस्त्रों से देवी का सम्मान किया।
संमानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः । तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः ॥32॥
saṃmānitā nanādoccaiḥ sāṭṭahāsaṃ muhurmuhuḥ | tasyā nādena ghoreṇa kṛtsnamāpūritaṃ nabhaḥ ||32||
इस प्रकार सम्मानित होकर देवी ने बार-बार अट्टहास के साथ ऊँचे स्वर में गर्जना की। उस भयानक नाद से सारा आकाश भर गया।
अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत् । चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे ॥33॥
amāyatātimahatā pratiśabdo mahānabhūt | cukṣubhuḥ sakalā lokāḥ samudrāśca cakampire ||33||
उस अत्यंत महान नाद की बहुत बड़ी प्रतिध्वनि हुई, जो आकाश में समा नहीं पाई। सारे लोक क्षुब्ध हो उठे और समुद्र काँपने लगे।
चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः । जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम् ॥34॥
cacāla vasudhā celuḥ sakalāśca mahīdharāḥ | jayeti devāśca mudā tāmūcuḥ siṃhavāhinīm ||34||
पृथ्वी डोलने लगी और सब पर्वत हिल उठे। देवताओं ने आनंद से सिंहवाहिनी देवी से कहा — "आपकी जय हो!"
तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः । दृष्ट्वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः ॥35॥
tuṣṭuvurmunayaścaināṃ bhaktinamrātmamūrtayaḥ | dṛṣṭvā samastaṃ saṃkṣubdhaṃ trailokyamamarārayaḥ ||35||
मुनियों ने भक्ति से झुककर उनकी स्तुति की। तीनों लोकों को क्षुब्ध देखकर देवताओं के शत्रु…
सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः । आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः ॥36॥
sannaddhākhilasainyāste samuttasthurudāyudhāḥ | āḥ kimetaditi krodhādābhāṣya mahiṣāsuraḥ ||36||
…अपनी सारी सेनाएँ सजाकर, अस्त्र उठाए खड़े हो गए। "अरे, यह क्या है?" — क्रोध से यह कहकर महिषासुर…
अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः । स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा ॥37॥
abhyadhāvata taṃ śabdamaśeṣairasurairvṛtaḥ | sa dadarśa tato devīṃ vyāptalokatrayāṃ tviṣā ||37||
…सब असुरों को साथ लेकर उस नाद की ओर दौड़ा। तब उसने देवी को देखा, जो अपनी प्रभा से तीनों लोकों में व्याप्त थीं।
पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम् । क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम् ॥38॥
pādākrāntyā natabhuvaṃ kirīṭollikhitāmbarām | kṣobhitāśeṣapātālāṃ dhanurjyāniḥsvanena tām ||38||
उनके चरणों के भार से पृथ्वी झुकी जा रही थी, मुकुट आकाश को छू रहा था, और धनुष की टंकार से सारा पाताल काँप रहा था।
दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद् व्याप्य संस्थिताम् । ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम् ॥39॥
diśo bhujasahasreṇa samantād vyāpya saṃsthitām | tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tayā devyā suradviṣām ||39||
वे अपनी हज़ार भुजाओं से सब दिशाओं को घेरकर खड़ी थीं। तब उन देवी के साथ देवताओं के शत्रुओं का युद्ध छिड़ गया।
शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् । महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः ॥40॥
śastrāstrairbahudhā muktairādīpitadigantaram | mahiṣāsurasenānīścikṣurākhyo mahāsuraḥ ||40||
चारों ओर फेंके गए अस्त्र-शस्त्रों से दिशाएँ जगमगा उठीं। महिषासुर का सेनापति चिक्षुर नाम का महान असुर…
युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः । रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः ॥41॥
yuyudhe cāmaraścānyaiścaturaṅgabalānvitaḥ | rathānāmayutaiḥ ṣaḍbhirudagrākhyo mahāsuraḥ ||41||
…युद्ध करने लगा, और चामर भी चतुरंगिणी सेना के साथ दूसरों को लेकर लड़ा। उदग्र नाम का महान असुर साठ हज़ार रथों के साथ…
अयुध्यतायुतानां च सहस्रेण महाहनुः । पञ्चाशद्भिश्च नियुतैरसिलोमा महासुरः ॥42॥
ayudhyatāyutānāṃ ca sahasreṇa mahāhanuḥ | pañcāśadbhiśca niyutairasilomā mahāsuraḥ ||42||
…लड़ा। महाहनु एक करोड़ की सेना के साथ और असिलोमा नाम का महान असुर पाँच करोड़ सैनिकों के साथ युद्ध करने लगा।
अयुतानां शतैः षड्भिर्बाष्कलो युयुधे रणे । गजवाजिसहस्रौघैरनेकैः परिवारितः ॥43॥
ayutānāṃ śataiḥ ṣaḍbhirbāṣkalo yuyudhe raṇe | gajavājisahasraughairanekaiḥ parivāritaḥ ||43||
बाष्कल साठ लाख की सेना लेकर रण में लड़ा। एक और असुर हाथियों और घोड़ों के हज़ारों झुंडों से घिरा हुआ…
वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत । बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतैः ॥44॥
vṛto rathānāṃ koṭyā ca yuddhe tasminnayudhyata | biḍālākhyo'yutānāṃ ca pañcāśadbhirathāyutaiḥ ||44||
…और एक करोड़ रथों से घिरा उस युद्ध में लड़ा। बिडाल नाम का असुर पचास अयुत-अयुत (पाँच सौ करोड़) रथों से घिरकर…
युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः । अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः ॥45॥
yuyudhe saṃyuge tatra rathānāṃ parivāritaḥ | anye ca tatrāyutaśo rathanāgahayairvṛtāḥ ||45||
…वहाँ रण में युद्ध करने लगा। दूसरे हज़ारों महान असुर भी रथों, हाथियों और घोड़ों से घिरे हुए…
युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः । कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा ॥46॥
yuyudhuḥ saṃyuge devyā saha tatra mahāsurāḥ | koṭikoṭisahasraistu rathānāṃ dantināṃ tathā ||46||
…वहाँ रणभूमि में देवी से लड़ने लगे। और स्वयं महिषासुर करोड़ों-करोड़ों रथों, हाथियों…
हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः । तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा ॥47॥
hayānāṃ ca vṛto yuddhe tatrābhūnmahiṣāsuraḥ | tomarairbhindipālaiśca śaktibhirmusalaistathā ||47||
…और घोड़ों से घिरा उस युद्ध में खड़ा था। तोमर, भिंदिपाल, शक्ति और मूसलों से…
युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परशुपट्टिशैः । केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित्पाशांस्तथापरे ॥48॥
yuyudhuḥ saṃyuge devyā khaḍgaiḥ paraśupaṭṭiśaiḥ | kecicca cikṣipuḥ śaktīḥ kecitpāśāṃstathāpare ||48||
…तलवारों, फरसों और पट्टिशों से वे रण में देवी से लड़ने लगे। किसी ने शक्ति फेंकी, किसी ने पाश।
देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः । सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका ॥49॥
devīṃ khaḍgaprahāraistu te tāṃ hantuṃ pracakramuḥ | sāpi devī tatastāni śastrāṇyastrāṇi caṇḍikā ||49||
वे तलवारों के वार से देवी को मारने का प्रयत्न करने लगे। तब उन चण्डिका देवी ने उन अस्त्र-शस्त्रों को…
लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी । अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः ॥50॥
līlayaiva praciccheda nijaśastrāstravarṣiṇī | anāyastānanā devī stūyamānā surarṣibhiḥ ||50||
…अपने अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करते हुए खेल-खेल में ही काट डाला। देवी के मुख पर थकान का ज़रा भी चिह्न नहीं था, और देवता व ऋषि उनकी स्तुति कर रहे थे।
मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी । सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेशरी ॥51॥
mumocāsuradeheṣu śastrāṇyastrāṇi ceśvarī | so'pi kruddho dhutasaṭo devyā vāhanakeśarī ||51||
परमेश्वरी देवी ने असुरों के शरीरों पर अस्त्र-शस्त्र चलाए। देवी का वाहन सिंह भी क्रोध से अयाल झटकता हुआ…
चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः । निःश्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका ॥52॥
cacārāsurasainyeṣu vaneṣviva hutāśanaḥ | niḥśvāsān mumuce yāṃśca yudhyamānā raṇe'mbikā ||52||
…असुरों की सेनाओं में ऐसे विचरने लगा, जैसे वन में आग। युद्ध करती हुई अम्बिका ने जो-जो साँसें छोड़ीं…
त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः । युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः ॥53॥
ta eva sadyaḥ sambhūtā gaṇāḥ śatasahasraśaḥ | yuyudhuste paraśubhirbhindipālāsipaṭṭiśaiḥ ||53||
…वे तुरंत सैकड़ों-हज़ारों गणों के रूप में प्रकट हो गईं। वे गण फरसों, भिंदिपालों, तलवारों और पट्टिशों से लड़ने लगे।
नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्त्युपबृंहिताः । अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्खांस्तथापरे ॥54॥
nāśayanto'suragaṇān devīśaktyupabṛṃhitāḥ | avādayanta paṭahān gaṇāḥ śaṅkhāṃstathāpare ||54||
देवी की शक्ति से बलवान होकर वे असुरों के झुंडों का नाश करने लगे। कुछ गण नगाड़े बजाने लगे, कुछ शंख…
मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे । ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः ॥55॥
mṛdaṅgāṃśca tathaivānye tasmin yuddhamahotsave | tato devī triśūlena gadayā śaktivṛṣṭibhiḥ ||55||
…और कुछ मृदंग — उस युद्ध-महोत्सव में। तब देवी ने त्रिशूल, गदा, शक्ति की वर्षा…
खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान् । पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान् ॥56॥
khaḍgādibhiśca śataśo nijaghāna mahāsurān | pātayāmāsa caivānyān ghaṇṭāsvanavimohitān ||56||
…और तलवार आदि से सैकड़ों महान असुरों को मार गिराया, और घंटे की ध्वनि से मोहित दूसरों को धरती पर गिरा दिया।
असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत् । केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे ॥57॥
asurān bhuvi pāśena baddhvā cānyānakarṣayat | kecid dvidhā kṛtāstīkṣṇaiḥ khaḍgapātaistathāpare ||57||
कुछ असुरों को पाश से बाँधकर धरती पर घसीटा। कुछ तेज़ तलवार के वार से दो टुकड़े हो गए…
विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते । वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः ॥58॥
vipothitā nipātena gadayā bhuvi śerate | vemuśca kecidrudhiraṃ musalena bhṛśaṃ hatāḥ ||58||
…कुछ गदा की चोट से चूर होकर धरती पर पड़ गए, और कुछ मूसल की भारी चोट से खून उगलने लगे।
केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि । निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे ॥59॥
kecinnipatitā bhūmau bhinnāḥ śūlena vakṣasi | nirantarāḥ śaraugheṇa kṛtāḥ kecidraṇājire ||59||
कुछ शूल से छाती बिंधकर धरती पर गिर पड़े, और कुछ बाणों की झड़ी से रणभूमि में ढेर हो गए।
श्येनानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः । केषाञ्चिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे ॥60॥
śyenānukāriṇaḥ prāṇān mumucustridaśārdanāḥ | keṣāñcid bāhavaśchinnāśchinnagrīvāstathāpare ||60||
बाज़ की तरह झपटने वाले देवताओं के वे शत्रु प्राण छोड़ने लगे। किसी की भुजाएँ कट गईं, किसी की गर्दन।
शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः । विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः ॥61॥
śirāṃsi peturanyeṣāmanye madhye vidāritāḥ | vicchinnajaṅghāstvapare petururvyāṃ mahāsurāḥ ||61||
किसी के सिर गिर पड़े, कोई बीच से चीर दिए गए, और कई महान असुर पिंडलियाँ कटने से धरती पर गिर पड़े।
एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः । छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः ॥62॥
ekabāhvakṣicaraṇāḥ keciddevyā dvidhā kṛtāḥ | chinne'pi cānye śirasi patitāḥ punarutthitāḥ ||62||
देवी ने कुछ को दो भागों में ऐसे चीर दिया कि हर भाग में एक भुजा, एक आँख और एक पैर रह गया। कुछ सिर कटने पर भी गिरकर फिर उठ खड़े हुए।
कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः । ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः ॥63॥
kabandhā yuyudhurdevyā gṛhītaparamāyudhāḥ | nanṛtuścāpare tatra yuddhe tūryalayāśritāḥ ||63||
बिना सिर के धड़ श्रेष्ठ अस्त्र लिए देवी से लड़ते रहे, और कुछ धड़ वहाँ युद्ध के बाजों की लय पर नाचने लगे।
कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः । तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः ॥64॥
kabandhāśchinnaśirasaḥ khaḍgaśaktyṛṣṭipāṇayaḥ | tiṣṭha tiṣṭheti bhāṣanto devīmanye mahāsurāḥ ||64||
सिर कटे धड़ हाथों में तलवार, शक्ति और ऋष्टि लिए खड़े थे, और दूसरे महान असुर देवी से कह रहे थे — "ठहर, ठहर!"
पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुन्धरा । अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत्स महारणः ॥65॥
pātitai rathanāgāśvairasuraiśca vasundharā | agamyā sābhavattatra yatrābhūtsa mahāraṇaḥ ||65||
जहाँ वह महान युद्ध हुआ, वहाँ गिरे हुए रथों, हाथियों, घोड़ों और असुरों से धरती पर चलना असंभव हो गया।
शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः । मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम् ॥66॥
śoṇitaughā mahānadyaḥ sadyastatra prasusruvuḥ | madhye cāsurasainyasya vāraṇāsuravājinām ||66||
असुर-सेना के बीच, हाथियों, असुरों और घोड़ों के बीच, तुरंत रक्त की बड़ी-बड़ी नदियाँ बह चलीं।
क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका । निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम् ॥67॥
kṣaṇena tanmahāsainyamasurāṇāṃ tathāmbikā | ninye kṣayaṃ yathā vahnistṛṇadārumahācayam ||67||
जैसे आग घास और लकड़ी के बड़े ढेर को जला डालती है, वैसे ही अम्बिका ने असुरों की उस विशाल सेना को क्षण भर में नष्ट कर दिया।
स च सिंहो महानादमुत्सृजन्धुतकेसरः । शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति ॥68॥
sa ca siṃho mahānādamutsṛjandhutakesaraḥ | śarīrebhyo'marārīṇāmasūniva vicinvati ||68||
और वह सिंह भी अयाल झटकता हुआ ज़ोर से गर्जना करता, मानो देवताओं के शत्रुओं के शरीरों से उनके प्राण खोज रहा हो।
देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं तथासुरैः । यथैषां तुतुषुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि ॐ ॥69॥
devyā gaṇaiśca taistatra kṛtaṃ yuddhaṃ tathāsuraiḥ | yathaiṣāṃ tutuṣurdevāḥ puṣpavṛṣṭimuco divi oṃ ||69||
देवी के गणों ने वहाँ असुरों से ऐसा युद्ध किया कि आकाश में देवता प्रसन्न होकर फूलों की वर्षा करने लगे।
पाठ-भेद — गीता प्रेस / द्रिक पाठ: महासुरैः
