सप्तम अध्याय — चण्डमुण्डवध

श्रीदुर्गासप्तशती · उत्तम चरित्र

27 मंत्र — मूल संस्कृत, IAST और सरल हिंदी अर्थ के साथ।

इस अध्याय में

देवी के ललाट से प्रकट काली असुर सेना और चंड-मुंड का संहार करती हैं। प्रसन्न होकर चण्डिका उन्हें "चामुण्डा" नाम देती हैं।

॥ चण्डमुण्डवधो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥

ॐ ऋषिरुवाच ॥1॥

oṃ ṛṣiruvāca ||1||

ऋषि बोले।

आज्ञप्तास्ते ततो दैत्याश्चण्डमुण्डपुरोगमाः । चतुरङ्गबलोपेता ययुरभ्युद्यतायुधाः ॥2॥

ājñaptāste tato daityāścaṇḍamuṇḍapurogamāḥ | caturaṅgabalopetā yayurabhyudyatāyudhāḥ ||2||

शुंभ की आज्ञा पाकर चंड और मुंड के नेतृत्व में दैत्य चतुरंगिणी सेना के साथ अस्त्र उठाए चल पड़े।

ददृशुस्ते ततो देवीमीषद्धासां व्यवस्थिताम् । सिंहस्योपरि शैलेन्द्रशृङ्गे महति काञ्चने ॥3॥

dadṛśuste tato devīmīṣaddhāsāṃ vyavasthitām | siṃhasyopari śailendraśṛṅge mahati kāñcane ||3||

उन्होंने देवी को पर्वतराज हिमालय के विशाल सुनहरे शिखर पर सिंह के ऊपर मंद-मंद मुस्कुराती हुई बैठे देखा।

ते दृष्ट्वा तां समादातुमुद्यमं चक्रुरुद्यताः । आकृष्टचापासिधरास्तथान्ये तत्समीपगाः ॥4॥

te dṛṣṭvā tāṃ samādātumudyamaṃ cakrurudyatāḥ | ākṛṣṭacāpāsidharāstathānye tatsamīpagāḥ ||4||

उन्हें देखकर कुछ दैत्य उन्हें पकड़ने का प्रयत्न करने लगे, और कुछ धनुष ताने और तलवार लिए उनके पास आ गए।

ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन् प्रति । कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा ॥5॥

tataḥ kopaṃ cakāroccairambikā tānarīn prati | kopena cāsyā vadanaṃ maṣīvarṇamabhūttadā ||5||

तब अम्बिका को उन शत्रुओं पर बड़ा क्रोध आया, और क्रोध से उनका मुख उस समय स्याही जैसा काला पड़ गया।

भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम् । काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी ॥6॥

bhrukuṭīkuṭilāttasyā lalāṭaphalakāddrutam | kālī karālavadanā viniṣkrāntāsipāśinī ||6||

भौंहें तनी होने से टेढ़े हुए उनके ललाट से तुरंत विकराल मुख वाली काली प्रकट हुईं, जिनके हाथों में तलवार और पाश था।

विचित्रखट्वाङ्गधरा नरमालाविभूषणा । द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्कमांसातिभैरवा ॥7॥

vicitrakhaṭvāṅgadharā naramālāvibhūṣaṇā | dvīpicarmaparīdhānā śuṣkamāṃsātibhairavā ||7||

वे विचित्र खट्वांग लिए, नरमुंडों की माला पहने, बाघ की खाल ओढ़े थीं, और सूखे मांस के कारण अत्यंत भयानक दिखती थीं।

अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा । निमग्नारक्तनयना नादापूरितदिङ्मुखा ॥8॥

ativistāravadanā jihvālalanabhīṣaṇā | nimagnāraktanayanā nādāpūritadiṅmukhā ||8||

उनका मुख बहुत फैला हुआ था, लपलपाती जीभ से वे डरावनी लगती थीं, उनकी आँखें धँसी हुई और लाल थीं, और उनकी गर्जना से दिशाएँ भर गई थीं।

सा वेगेनाभिपतिता घातयन्ती महासुरान् । सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्बलम् ॥9॥

sā vegenābhipatitā ghātayantī mahāsurān | sainye tatra surārīṇāmabhakṣayata tadbalam ||9||

वे वेग से महान असुरों पर टूट पड़ीं और उन्हें मारते हुए देवताओं के शत्रुओं की उस सेना को खाने लगीं।

पार्ष्णिग्राहाङ्कुशग्राहियोधघण्टासमन्वितान् । समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान् ॥10॥

pārṣṇigrāhāṅkuśagrāhiyodhaghaṇṭāsamanvitān | samādāyaikahastena mukhe cikṣepa vāraṇān ||10||

पीछे के रक्षकों, अंकुशधारी महावतों, योद्धाओं और घंटों सहित हाथियों को एक हाथ से उठाकर वे मुँह में डालने लगीं।

तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह । निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयन्त्यतिभैरवम् ॥11॥

tathaiva yodhaṃ turagai rathaṃ sārathinā saha | nikṣipya vaktre daśanaiścarvayantyatibhairavam ||11||

इसी तरह घोड़ों सहित योद्धा को और सारथी सहित रथ को मुँह में डालकर वे दाँतों से बड़े भयानक ढंग से चबाने लगीं।

एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामथ चापरम् । पादेनाक्रम्य चैवान्यमुरसान्यमपोथयत् ॥12॥

ekaṃ jagrāha keśeṣu grīvāyāmatha cāparam | pādenākramya caivānyamurasānyamapothayat ||12||

किसी को बाल पकड़कर, किसी को गर्दन पकड़कर, किसी को पैर से दबाकर और किसी को छाती से धक्का देकर उन्होंने मार गिराया।

तैर्मुक्तानि च शस्त्राणि महास्त्राणि तथासुरैः । मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि ॥13॥

tairmuktāni ca śastrāṇi mahāstrāṇi tathāsuraiḥ | mukhena jagrāha ruṣā daśanairmathitānyapi ||13||

उन असुरों द्वारा छोड़े गए शस्त्रों और बड़े-बड़े अस्त्रों को भी उन्होंने क्रोध से मुँह में पकड़कर दाँतों से चबा डाला।

बलिनां तद् बलं सर्वमसुराणां दुरात्मनाम् । ममर्दाभक्षयच्चान्यानन्यांश्चाताडयत्तथा ॥14॥

balināṃ tad balaṃ sarvamasurāṇāṃ durātmanām | mamardābhakṣayaccānyānanyāṃścātāḍayattathā ||14||

उन्होंने बलवान और दुरात्मा असुरों की उस सारी सेना को रौंद डाला — कुछ को खा गईं और कुछ को मार गिराया।

असिना निहताः केचित्केचित्खट्वाङ्गताडिताः । जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहतास्तथा ॥15॥

asinā nihatāḥ kecitkecitkhaṭvāṅgatāḍitāḥ | jagmurvināśamasurā dantāgrābhihatāstathā ||15||

कुछ असुर तलवार से मारे गए, कुछ खट्वांग की चोट से, और कुछ दाँतों की नोक से घायल होकर नष्ट हो गए।

क्षणेन तद् बलं सर्वमसुराणां निपातितम् । दृष्ट्वा चण्डोऽभिदुद्राव तां कालीमतिभीषणाम् ॥16॥

kṣaṇena tad balaṃ sarvamasurāṇāṃ nipātitam | dṛṣṭvā caṇḍo'bhidudrāva tāṃ kālīmatibhīṣaṇām ||16||

असुरों की उस सारी सेना को क्षण भर में गिरी देखकर चंड उन अत्यंत भयानक काली की ओर दौड़ा।

शरवर्षैर्महाभीमैर्भीमाक्षीं तां महासुरः । छादयामास चक्रैश्च मुण्डः क्षिप्तैः सहस्रशः ॥17॥

śaravarṣairmahābhīmairbhīmākṣīṃ tāṃ mahāsuraḥ | chādayāmāsa cakraiśca muṇḍaḥ kṣiptaiḥ sahasraśaḥ ||17||

महान असुर मुंड ने भी भयानक नेत्रों वाली उन देवी को अत्यंत भीषण बाणों की वर्षा और हज़ारों चक्रों से ढक दिया।

तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम् । बभुर्यथार्कबिम्बानि सुबहूनि घनोदरम् ॥18॥

tāni cakrāṇyanekāni viśamānāni tanmukham | babhuryathārkabimbāni subahūni ghanodaram ||18||

उनके मुख में समाते हुए वे अनेक चक्र ऐसे लगे, जैसे बहुत-से सूर्य-बिंब बादल के भीतर समा रहे हों।

ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी । कालीकरालवक्त्रान्तर्दुर्दर्शदशनोज्ज्वला ॥19॥

tato jahāsātiruṣā bhīmaṃ bhairavanādinī | kālīkarālavaktrāntardurdarśadaśanojjvalā ||19||

तब भयानक गर्जना करने वाली काली अत्यंत क्रोध से भीषण हँसी हँसीं, और उनके विकराल मुख के भीतर न देखे जा सकने वाले दाँत चमक उठे।

उत्थाय च महासिं हं देवी चण्डमधावत । गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत् ॥20॥

utthāya ca mahāsiṃ haṃ devī caṇḍamadhāvata | gṛhītvā cāsya keśeṣu śirastenāsinācchinat ||20||

तब देवी बड़ी तलवार उठाकर, "हं" का नाद करती हुई चंड पर झपटीं, और उसके बाल पकड़कर उसी तलवार से उसका सिर काट डाला। (कुछ पाठों में: महान सिंह पर चढ़कर चंड की ओर दौड़ीं।)

अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् । तमप्यपातयद्भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा ॥21॥

atha muṇḍo'bhyadhāvattāṃ dṛṣṭvā caṇḍaṃ nipātitam | tamapyapātayadbhūmau sā khaḍgābhihataṃ ruṣā ||21||

चंड को गिरा देखकर मुंड भी उनकी ओर दौड़ा। उसे भी देवी ने क्रोध से तलवार का प्रहार करके धरती पर गिरा दिया।

हतशेषं ततः सैन्यं दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् । मुण्डं च सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम् ॥22॥

hataśeṣaṃ tataḥ sainyaṃ dṛṣṭvā caṇḍaṃ nipātitam | muṇḍaṃ ca sumahāvīryaṃ diśo bheje bhayāturam ||22||

चंड को गिरा हुआ और महापराक्रमी मुंड को भी मारा गया देखकर, बची हुई सेना भय से व्याकुल होकर दिशाओं में भाग गई।

शिरश्चण्डस्य काली च गृहीत्वा मुण्डमेव च । प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम् ॥23॥

śiraścaṇḍasya kālī ca gṛhītvā muṇḍameva ca | prāha pracaṇḍāṭṭahāsamiśramabhyetya caṇḍikām ||23||

तब काली चंड और मुंड के सिर लेकर चण्डिका के पास गईं, और प्रचंड अट्टहास के साथ बोलीं —

मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू । युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं च हनिष्यसि ॥24॥

mayā tavātropahṛtau caṇḍamuṇḍau mahāpaśū | yuddhayajñe svayaṃ śumbhaṃ niśumbhaṃ ca haniṣyasi ||24||

"मैंने यहाँ चंड और मुंड नाम के ये दो महापशु तुम्हें भेंट किए हैं। अब युद्ध-यज्ञ में शुंभ और निशुंभ को तुम स्वयं मारोगी।"

ऋषिरुवाच ॥25॥

ṛṣiruvāca ||25||

ऋषि बोले।

तावानीतौ ततो दृष्ट्वा चण्डमुण्डौ महासुरौ । उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः ॥26॥

tāvānītau tato dṛṣṭvā caṇḍamuṇḍau mahāsurau | uvāca kālīṃ kalyāṇī lalitaṃ caṇḍikā vacaḥ ||26||

वहाँ लाए गए उन महान असुरों चंड और मुंड को देखकर कल्याणमयी चण्डिका ने काली से यह मधुर वचन कहा —

यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता । चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि ॐ ॥27॥

yasmāccaṇḍaṃ ca muṇḍaṃ ca gṛhītvā tvamupāgatā | cāmuṇḍeti tato loke khyātā devi bhaviṣyasi oṃ ||27||

"क्योंकि तुम चंड और मुंड को पकड़कर लाई हो, इसलिए हे देवी, संसार में तुम चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होओगी।"

पाठ और अर्थ का स्रोत

मूल पाठ: संस्कृत विकिस्रोत के "मार्कण्डेयपुराणम्" (अध्याय 81–93, CC BY-SA 4.0) के आधार पर, sanskritdocuments.org और द्रिक पंचांग के पाठ से शब्द-दर-शब्द मिलाकर — जहाँ स्रोत अलग थे, वहाँ कम से कम दो स्रोतों वाला पाठ लिया गया है। अर्थ: F. E. Pargiter के अंग्रेज़ी अनुवाद (1904) के आधार पर। CC BY-SA 4.0

एक नज़र में

अध्यायसप्तम (7/13)
चरित्रउत्तम चरित्र
देवतामहासरस्वती
ऋषिरुद्र
छन्दअनुष्टुप्
मंत्र27

सप्तम अध्याय — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न