क्षमा-प्रार्थना

श्रीदुर्गासप्तशती का अंग · पाठ के बाद

8 श्लोक — मूल संस्कृत, IAST और सरल हिंदी अर्थ के साथ।

क्षमा-प्रार्थना में

पाठ के अंत में पढ़ी जाने वाली आठ श्लोकों की प्रार्थना — "आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्" — जिसमें पूजा और पाठ में हुई हर भूल के लिए देवी से क्षमा माँगी जाती है।

तेरह अध्यायों के बाद ये अंग पढ़े जाते हैं: ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त → प्राधानिक रहस्य → वैकृतिक रहस्य → मूर्ति रहस्य → क्षमा-प्रार्थना। क्षमा-प्रार्थना इनमें पाँचवाँ है।

॥ अथ क्षमाप्रार्थना ॥

अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया । दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि ॥1॥

aparādhasahasrāṇi kriyante'harniśaṃ mayā | dāso'yamiti māṃ matvā kṣamasva parameśvari ||1||

मुझसे दिन-रात हज़ारों अपराध होते रहते हैं। "यह मेरा दास है" — ऐसा मानकर, हे परमेश्वरी, मुझे क्षमा करो।

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥2॥

āvāhanaṃ na jānāmi na jānāmi visarjanam | pūjāṃ caiva na jānāmi kṣamyatāṃ parameśvari ||2||

मैं आवाहन करना नहीं जानता, विसर्जन करना नहीं जानता, और पूजा करना भी नहीं जानता। हे परमेश्वरी, मुझे क्षमा करो।

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि । यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे ॥3॥

mantrahīnaṃ kriyāhīnaṃ bhaktihīnaṃ sureśvari | yatpūjitaṃ mayā devi paripūrṇaṃ tadastu me ||3||

हे सुरेश्वरी! मंत्र, क्रिया और भक्ति से रहित होकर भी मैंने जो पूजा की है, हे देवी, वह मेरे लिए पूर्ण हो जाए।

अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् । यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः ॥4॥

aparādhaśataṃ kṛtvā jagadambeti coccaret | yāṃ gatiṃ samavāpnoti na tāṃ brahmādayaḥ surāḥ ||4||

सैकड़ों अपराध करके भी जो "जगदम्बा" कहकर पुकारता है, उसे जो गति मिलती है, वह ब्रह्मा आदि देवताओं को भी नहीं मिलती।

सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके । इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ॥5॥

sāparādho'smi śaraṇaṃ prāptastvāṃ jagadambike | idānīmanukampyo'haṃ yathecchasi tathā kuru ||5||

हे जगदम्बिके! मैं अपराधी हूँ, पर तुम्हारी शरण में आया हूँ। अब मैं तुम्हारी दया का पात्र हूँ — जैसा तुम चाहो, वैसा करो।

अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम् । तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥6॥

ajñānādvismṛterbhrāntyā yannyūnamadhikaṃ kṛtam | tatsarvaṃ kṣamyatāṃ devi prasīda parameśvari ||6||

हे देवी! अज्ञान से, भूल से या भ्रम से पूजा में जो कुछ कम या अधिक हो गया हो, वह सब क्षमा करो। हे परमेश्वरी, प्रसन्न होओ।

कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे । गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि ॥7॥

kāmeśvari jaganmātaḥ saccidānandavigrahe | gṛhāṇārcāmimāṃ prītyā prasīda parameśvari ||7||

हे कामेश्वरी! हे जगन्माता! हे सच्चिदानंद-स्वरूपा! प्रेम से मेरी यह पूजा स्वीकार करो। हे परमेश्वरी, प्रसन्न होओ।

गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि ॥8॥

guhyātiguhyagoptrī tvaṃ gṛhāṇāsmatkṛtaṃ japam | siddhirbhavatu me devi tvatprasādātsureśvari ||8||

तुम गोपनीय से भी गोपनीय की रक्षा करने वाली हो। मेरे किए हुए इस जप को ग्रहण करो। हे सुरेश्वरी, तुम्हारी कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्त हो।

पाठ और अर्थ का स्रोत

मूल पाठ: संस्कृत विकिस्रोत (CC BY-SA 4.0) के आधार पर; श्लोकों का क्रम और विभाजन द्रिक पंचांग के पाठ से (जो गीता प्रेस का क्रम मानता है), और जहाँ उपलब्ध हो वहाँ sanskritdocuments.org से भी शब्द-दर-शब्द मिलाया गया है; तीनों रहस्यों में द्रिक, वाचस्पत्यम् (विकिस्रोत) और स्तोत्रनिधि का बहुमत लिया गया है। स्रोतों में जो भी अंतर मिला, वह हाथ से जाँचा गया है। अर्थ: मूल संस्कृत से; ऋग्वेद के सूक्तों में R. T. H. Griffith (1896) के अनुवाद से मिलाकर। CC BY-SA 4.0

क्षमा-प्रार्थना — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न