सिद्धकुञ्जिका स्तोत्र

श्रीदुर्गासप्तशती का अंग · परिशिष्ट

12 श्लोक — मूल संस्कृत, IAST और सरल हिंदी अर्थ के साथ।

सिद्धकुञ्जिका स्तोत्र में

भगवान शिव पार्वती को यह स्तोत्र बताते हैं, जिसके बारे में कहा गया है कि इसके पाठ से सप्तशती-पाठ का फल मिलता है। इसमें नवार्ण मन्त्र, बीजाक्षरों वाला मूल मन्त्र और देवी को नमस्कार के आठ श्लोक हैं। अंतिम पंक्ति इसे रुद्रयामल के गौरीतन्त्र का बताती है।

सिद्धकुञ्जिका स्तोत्र पाठ-विधि के संकल्प में गिनाए गए अंगों में नहीं है, पर सप्तशती की पुस्तकों में परिशिष्ट के रूप में साथ छपता और पढ़ा जाता है।

॥ अथ सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥

शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् । येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ॥1॥

śṛṇu devi pravakṣyāmi kuñjikāstotramuttamam | yena mantraprabhāveṇa caṇḍījāpaḥ śubho bhavet ||1||

हे देवी! सुनो, मैं उत्तम कुञ्जिका-स्तोत्र बताता हूँ, जिस मन्त्र के प्रभाव से चण्डी (सप्तशती) का पाठ शुभ और सफल होता है।

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् । न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥2॥

na kavacaṃ nārgalāstotraṃ kīlakaṃ na rahasyakam | na sūktaṃ nāpi dhyānaṃ ca na nyāso na ca vārcanam ||2||

(इसके पाठ के बाद) न कवच, न अर्गला-स्तोत्र, न कीलक, न रहस्य; न सूक्त, न ध्यान, न न्यास और न अर्चन की ही आवश्यकता रहती है।

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् । अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥3॥

kuñjikāpāṭhamātreṇa durgāpāṭhaphalaṃ labhet | ati guhyataraṃ devi devānāmapi durlabham ||3||

केवल कुञ्जिका के पाठ से दुर्गा-पाठ (सप्तशती) का फल मिल जाता है। हे देवी, यह अत्यंत गोपनीय है और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति । मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् । पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥4॥

gopanīyaṃ prayatnena svayoniriva pārvati | māraṇaṃ mohanaṃ vaśyaṃ stambhanoccāṭanādikam | pāṭhamātreṇa saṃsiddhyet kuñjikāstotramuttamam ||4||

हे पार्वती! इसे प्रयत्नपूर्वक वैसे ही गुप्त रखना चाहिए, जैसे कोई अपना सबसे निजी अंग ढककर रखता है। मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन, उच्चाटन आदि (तंत्र के कर्म) — स्तोत्र कहता है कि ये सब इस उत्तम कुञ्जिका-स्तोत्र के पाठ मात्र से सिद्ध होते हैं।

॥ अथ मन्त्रः ॥

मूल मन्त्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा

oṃ aiṃ hrīṃ klīṃ cāmuṇḍāyai vicce oṃ glauṃ huṃ klīṃ jūṃ saḥ jvālaya jvālaya jvala jvala prajvala prajvala aiṃ hrīṃ klīṃ cāmuṇḍāyai vicce jvala haṃ saṃ laṃ kṣaṃ phaṭ svāhā

यह कुञ्जिका का मूल मन्त्र है, जो बीजाक्षरों से बना है। इसकी शुरुआत नवार्ण मन्त्र ("ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे") से होती है। "ज्वालय ज्वालय, ज्वल ज्वल, प्रज्वल प्रज्वल" का अर्थ है — प्रज्वलित करो, प्रकाशित करो; अंत में "फट् स्वाहा"। बीज-मन्त्रों का शब्दार्थ नहीं किया जाता।

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि । नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥1॥

namaste rudrarūpiṇyai namaste madhumardini | namaḥ kaiṭabhahāriṇyai namaste mahiṣārdini ||1||

रुद्र-रूपिणी, तुम्हें नमस्कार; मधु का मर्दन करने वाली, तुम्हें नमस्कार। कैटभ का संहार करने वाली, तुम्हें नमस्कार; महिषासुर को मारने वाली, तुम्हें नमस्कार।

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि । जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ॥2॥

namaste śumbhahantryai ca niśumbhāsuraghātini | jāgrataṃ hi mahādevi japaṃ siddhaṃ kuruṣva me ||2||

शुम्भ का हनन करने वाली और निशुम्भासुर का वध करने वाली, तुम्हें नमस्कार। हे महादेवी! मेरे जप को जाग्रत और सिद्ध करो।

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका । क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥3॥

aiṃkārī sṛṣṭirūpāyai hrīṃkārī pratipālikā | klīṃkārī kāmarūpiṇyai bījarūpe namo'stu te ||3||

ऐंकार-रूप में तुम सृष्टि-रूपा हो, ह्रींकार-रूप में पालन करने वाली हो, और क्लींकार-रूप में काम-रूपिणी हो। हे बीज-रूपे, तुम्हें नमस्कार है।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी । विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥4॥

cāmuṇḍā caṇḍaghātī ca yaikārī varadāyinī | vicce cābhayadā nityaṃ namaste mantrarūpiṇi ||4||

चामुण्डा-रूप में तुम चण्ड का वध करने वाली हो, "यै"-कार रूप में वर देने वाली हो, और "विच्चे" रूप में सदा अभय देती हो। हे मन्त्र-रूपिणी, तुम्हें नमस्कार है।

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी । क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥5॥

dhāṃ dhīṃ dhūṃ dhūrjaṭeḥ patnī vāṃ vīṃ vūṃ vāgadhīśvarī | krāṃ krīṃ krūṃ kālikā devi śāṃ śīṃ śūṃ me śubhaṃ kuru ||5||

"धां धीं धूं" — तुम धूर्जटि (शिव) की पत्नी हो; "वां वीं वूं" — वाणी की अधीश्वरी हो; "क्रां क्रीं क्रूं" — कालिका देवी हो; "शां शीं शूं" — मेरा कल्याण करो।

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी । भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥6॥

huṃ huṃ huṃkārarūpiṇyai jaṃ jaṃ jaṃ jambhanādinī | bhrāṃ bhrīṃ bhrūṃ bhairavī bhadre bhavānyai te namo namaḥ ||6||

"हुं हुं हुं" — तुम हुंकार-रूपिणी हो; "जं जं जं" — जम्भ का नाश करने वाली हो; "भ्रां भ्रीं भ्रूं" — हे भैरवी, हे भद्रे, हे भवानी, तुम्हें बार-बार नमस्कार है।

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं । धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥7॥

aṃ kaṃ caṃ ṭaṃ taṃ paṃ yaṃ śaṃ vīṃ duṃ aiṃ vīṃ haṃ kṣaṃ | dhijāgraṃ dhijāgraṃ troṭaya troṭaya dīptaṃ kuru kuru svāhā ||7||

"अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं" — ये बीजाक्षर हैं। "धिजाग्रं धिजाग्रं" — (बंधन को) तोड़ो, तोड़ो; (मन्त्र को) दीप्त करो, दीप्त करो — स्वाहा।

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा । सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे ॥8॥

pāṃ pīṃ pūṃ pārvatī pūrṇā khāṃ khīṃ khūṃ khecarī tathā | sāṃ sīṃ sūṃ saptaśatī devyā mantrasiddhiṃ kuruṣva me ||8||

"पां पीं पूं" — तुम पूर्ण पार्वती हो; "खां खीं खूं" — आकाश में विचरने वाली खेचरी हो; "सां सीं सूं" — हे सप्तशती-देवी, मेरे मन्त्र को सिद्ध करो।

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे । अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥ यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् । न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥ इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

idaṃ tu kuñjikāstotraṃ mantrajāgartihetave | abhakte naiva dātavyaṃ gopitaṃ rakṣa pārvati || yastu kuñjikayā devi hīnāṃ saptaśatīṃ paṭhet | na tasya jāyate siddhiraraṇye rodanaṃ yathā || iti śrīrudrayāmale gaurītantre śivapārvatīsaṃvāde kuñjikāstotraṃ sampūrṇam |

यह कुञ्जिका-स्तोत्र मन्त्रों को जगाने के लिए है। इसे भक्ति न रखने वाले को नहीं देना चाहिए — हे पार्वती, इसे गुप्त रखो। हे देवी! जो कुञ्जिका के बिना सप्तशती का पाठ करता है, उसे सिद्धि नहीं मिलती, जैसे वन में रोना निष्फल होता है। — इस प्रकार रुद्रयामल के गौरीतन्त्र में शिव-पार्वती संवाद में कुञ्जिका-स्तोत्र पूरा हुआ।

यह अंश संस्कृत विकिस्रोत के पाठ में है; द्रिक पंचांग के पाठ में नहीं।

फलश्रुति (पाठ का फल बताने वाले श्लोक) इस स्तोत्र का अपना कथन है — अर्थ में हमने वही भाव रखा है। यह परंपरा की श्रद्धा है, किसी परिणाम की गारंटी नहीं।

पाठ और अर्थ का स्रोत

मूल पाठ: संस्कृत विकिस्रोत (CC BY-SA 4.0) के आधार पर; श्लोकों का क्रम और विभाजन द्रिक पंचांग के पाठ से (जो गीता प्रेस का क्रम मानता है), और जहाँ उपलब्ध हो वहाँ sanskritdocuments.org से भी शब्द-दर-शब्द मिलाया गया है; तीनों रहस्यों में द्रिक, वाचस्पत्यम् (विकिस्रोत) और स्तोत्रनिधि का बहुमत लिया गया है। स्रोतों में जो भी अंतर मिला, वह हाथ से जाँचा गया है। अर्थ: मूल संस्कृत से; ऋग्वेद के सूक्तों में R. T. H. Griffith (1896) के अनुवाद से मिलाकर। CC BY-SA 4.0

सिद्धकुञ्जिका स्तोत्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न