॥ सुरथवैश्ययोर्वरप्रदानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥
ॐ ऋषिरुवाच ॥1॥
oṃ ṛṣiruvāca ||1||
ऋषि बोले।
एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम् । एवंप्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत् ॥2॥
etatte kathitaṃ bhūpa devīmāhātmyamuttamam | evaṃprabhāvā sā devī yayedaṃ dhāryate jagat ||2||
हे राजा! मैंने तुम्हें यह उत्तम देवी-माहात्म्य सुना दिया। वे देवी ऐसे प्रभाव वाली हैं, जिनसे यह जगत धारण किया जाता है।
विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया । तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिनः ॥3॥
vidyā tathaiva kriyate bhagavadviṣṇumāyayā | tayā tvameṣa vaiśyaśca tathaivānye vivekinaḥ ||3||
भगवान विष्णु की माया-रूपा वही देवी विद्या (ज्ञान) भी देती हैं। उन्हीं से तुम, यह वैश्य और दूसरे विवेकी लोग…
मोह्यन्ते मोहिताश्चैव मोहमेष्यन्ति चापरे । तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम् ॥4॥
mohyante mohitāścaiva mohameṣyanti cāpare | tāmupaihi mahārāja śaraṇaṃ parameśvarīm ||4||
…मोहित होते हैं, मोहित हुए हैं और आगे भी मोहित होंगे। हे महाराज! तुम उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाओ।
आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा ॥5॥
ārādhitā saiva nṛṇāṃ bhogasvargāpavargadā ||5||
आराधना करने पर वही मनुष्यों को भोग, स्वर्ग और मोक्ष देती हैं।
मार्कण्डेय उवाच ॥6॥ — मार्कण्डेय जी बोले।
इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः ॥7॥
iti tasya vacaḥ śrutvā surathaḥ sa narādhipaḥ ||7||
उनकी यह बात सुनकर राजा सुरथ ने…
प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं शंसितव्रतम् । निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च ॥8॥
praṇipatya mahābhāgaṃ tamṛṣiṃ śaṃsitavratam | nirviṇṇo'timamatvena rājyāpaharaṇena ca ||8||
…कठोर व्रत का पालन करने वाले उन महाभाग ऋषि को प्रणाम किया। अत्यंत ममता और राज्य छिन जाने से विरक्त होकर…
जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने । संदर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनसंस्थितः ॥9॥
jagāma sadyastapase sa ca vaiśyo mahāmune | saṃdarśanārthamambāyā nadīpulinasaṃsthitaḥ ||9||
…हे महामुनि! वे तुरंत तपस्या करने चले गए। वह वैश्य भी अम्बा के दर्शन के लिए नदी के तट पर जा बैठा।
स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन् । तौ तस्मिन् पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम् ॥10॥
sa ca vaiśyastapastepe devīsūktaṃ paraṃ japan | tau tasmin puline devyāḥ kṛtvā mūrtiṃ mahīmayīm ||10||
वह वैश्य परम देवी-सूक्त का जप करते हुए तप करने लगा। उस नदी-तट पर दोनों ने देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर…
अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः । निराहारौ यतात्मानौ तन्मनस्कौ समाहितौ ॥11॥
arhaṇāṃ cakratustasyāḥ puṣpadhūpāgnitarpaṇaiḥ | nirāhārau yatātmānau tanmanaskau samāhitau ||11||
…फूल, धूप, अग्नि (हवन) और जल-तर्पण से उनकी पूजा की। वे निराहार रहकर, मन को वश में करके, देवी में चित्त लगाकर एकाग्र रहे। (गीता प्रेस पाठ: "यताहारौ" — संयमित आहार वाले।)
पाठ-भेद — गीता प्रेस / द्रिक पाठ: यताहारौ
ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम् । एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः ॥12॥
dadatustau baliṃ caiva nijagātrāsṛgukṣitam | evaṃ samārādhayatostribhirvarṣairyatātmanoḥ ||12||
उन्होंने अपने शरीर के रक्त से सींची हुई बलि भी दी। इस प्रकार संयमित मन से तीन वर्ष तक आराधना करने पर…
परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका ॥13॥
parituṣṭā jagaddhātrī pratyakṣaṃ prāha caṇḍikā ||13||
…जगत को धारण करने वाली चण्डिका प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष प्रकट हुईं और बोलीं।
देव्युवाच ॥14॥
devyuvāca ||14||
देवी बोलीं।
यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन । मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि तत् ॥15॥
yatprārthyate tvayā bhūpa tvayā ca kulanandana | mattastatprāpyatāṃ sarvaṃ parituṣṭā dadāmi tat ||15||
हे राजा, और हे कुल को आनंद देने वाले (वैश्य)! तुम दोनों जो माँग रहे हो, वह सब मुझसे पा लो। मैं प्रसन्न होकर वह देती हूँ।
मार्कण्डेय उवाच ॥16॥ — मार्कण्डेय जी बोले।
ततो वव्रे नृपो राज्यमविभ्रंश्यन्यजन्मनि । अत्रैव च निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात् ॥17॥
tato vavre nṛpo rājyamavibhraṃśyanyajanmani | atraiva ca nijaṃ rājyaṃ hataśatrubalaṃ balāt ||17||
तब राजा ने अगले जन्म में कभी नष्ट न होने वाला राज्य माँगा, और इसी जन्म में बलपूर्वक शत्रुओं की शक्ति नष्ट करके अपना राज्य।
सोऽपि वैश्यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः । ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्गविच्युतिकारकम् ॥18॥
so'pi vaiśyastato jñānaṃ vavre nirviṇṇamānasaḥ | mametyahamiti prājñaḥ saṅgavicyutikārakam ||18||
विरक्त मन वाले उस बुद्धिमान वैश्य ने वह ज्ञान माँगा, जो "यह मेरा है" और "यह मैं हूँ" — इस आसक्ति को मिटा देता है।
देव्युवाच ॥19॥
devyuvāca ||19||
देवी बोलीं।
स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यते भवान् ॥20॥
svalpairahobhirnṛpate svaṃ rājyaṃ prāpsyate bhavān ||20||
हे राजन्! थोड़े ही दिनों में तुम अपना राज्य प्राप्त कर लोगे।
हत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति ॥21॥
hatvā ripūnaskhalitaṃ tava tatra bhaviṣyati ||21||
शत्रुओं को मारकर वहाँ तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा।
मृतश्च भूयः सम्प्राप्य जन्म देवाद्विवस्वतः ॥22॥
mṛtaśca bhūyaḥ samprāpya janma devādvivasvataḥ ||22||
और मरने के बाद तुम सूर्यदेव से फिर जन्म लेकर…
सावर्णिको नाम मनुर्भवान् भुवि भविष्यति ॥23॥
sāvarṇiko nāma manurbhavān bhuvi bhaviṣyati ||23||
…पृथ्वी पर सावर्णिक नाम के मनु होओगे।
वैश्यवर्य त्वया यश्च वरोऽस्मत्तोऽभिवाञ्छितः ॥24॥
vaiśyavarya tvayā yaśca varo'smatto'bhivāñchitaḥ ||24||
हे श्रेष्ठ वैश्य! तुमने मुझसे जो वर चाहा है…
तं प्रयच्छामि संसिद्ध्यै तव ज्ञानं भविष्यति ॥25॥
taṃ prayacchāmi saṃsiddhyai tava jñānaṃ bhaviṣyati ||25||
…वह मैं तुम्हें देती हूँ — परम सिद्धि (मोक्ष) के लिए तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा।
मार्कण्डेय उवाच ॥26॥ — मार्कण्डेय जी बोले।
इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम् ॥27॥
iti dattvā tayordevī yathābhilaṣitaṃ varam ||27||
इस प्रकार उन दोनों को मनचाहा वर देकर…
बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता । एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः ॥28॥
babhūvāntarhitā sadyo bhaktyā tābhyāmabhiṣṭutā | evaṃ devyā varaṃ labdhvā surathaḥ kṣatriyarṣabhaḥ ||28||
…भक्ति से उनकी स्तुति सुनती हुई देवी तुरंत अंतर्धान हो गईं। इस प्रकार देवी से वर पाकर क्षत्रियश्रेष्ठ सुरथ…
सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः ॥29॥
sūryājjanma samāsādya sāvarṇirbhavitā manuḥ ||29||
…सूर्य से जन्म लेकर सावर्णि मनु होंगे।
