कीलक स्तोत्र

श्रीदुर्गासप्तशती का अंग · पाठ से पहले

14 श्लोक — मूल संस्कृत, IAST और सरल हिंदी अर्थ के साथ।

कीलक स्तोत्र में

कीलक बताता है कि भगवान शिव ने सप्तशती को "कीलित" (बंद) कर दिया था, और उसकी विधि जानकर, निष्कीलित करके पढ़ने से ही पाठ पूरा फल देता है। इसीलिए यह पाठ से पहले पढ़ा जाता है।

पाठ-विधि के अनुसार तेरह अध्यायों से पहले ये अंग इस क्रम में पढ़े जाते हैं: देवी कवच → अर्गला स्तोत्र → कीलक स्तोत्र → वेदोक्त रात्रिसूक्त → तन्त्रोक्त रात्रिसूक्त → देव्यथर्वशीर्ष। कीलक स्तोत्र इनमें तीसरा है।

॥ अथ कीलकम् ॥

विनियोग / ध्यान

ॐ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य शिव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीमहासरस्वती देवता श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः । ॐ नमश्चण्डिकायै

oṃ asya śrīkīlakamantrasya śiva ṛṣiḥ anuṣṭup chandaḥ śrīmahāsarasvatī devatā śrījagadambāprītyarthaṃ saptaśatīpāṭhāṅgatvena jape viniyogaḥ | oṃ namaścaṇḍikāyai

इस श्री कीलक-मन्त्र के ऋषि शिव हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता श्री महासरस्वती हैं। श्री जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए सप्तशती-पाठ के अंग के रूप में इसका जप किया जाता है — यह विनियोग है। ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार।

मार्कण्डेय उवाच

ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे । श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे ॥1॥

oṃ viśuddhajñānadehāya trivedīdivyacakṣuṣe | śreyaḥprāptinimittāya namaḥ somārdhadhāriṇe ||1||

जिनका शरीर विशुद्ध ज्ञान-स्वरूप है, तीनों वेद जिनके दिव्य नेत्र हैं, जो कल्याण-प्राप्ति के कारण हैं और जो मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करते हैं — उन भगवान शिव को नमस्कार।

सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम् । सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ॥2॥

sarvametadvijānīyānmantrāṇāmabhikīlakam | so'pi kṣemamavāpnoti satataṃ jāpyatatparaḥ ||2||

मन्त्रों का जो अभिकीलक है — यानी उनकी सिद्धि में बाधा बनी कील को खोलने वाला — उस (सप्तशती) को पूरी तरह जानना चाहिए। जो निरंतर इसके जप में लगा रहता है, वह भी कल्याण पाता है।

सिद्ध्यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि । एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्यति ॥3॥

siddhyantyuccāṭanādīni vastūni sakalānyapi | etena stuvatāṃ devī stotramātreṇa siddhyati ||3||

उसके उच्चाटन आदि सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं। इस (सप्तशती) से स्तुति करने वालों को देवी केवल स्तोत्र से ही सिद्धि देती हैं।

न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते । विना जाप्येन सिद्ध्येत सर्वमुच्चाटनादिकम् ॥4॥

na mantro nauṣadhaṃ tatra na kiñcidapi vidyate | vinā jāpyena siddhyeta sarvamuccāṭanādikam ||4||

उसके लिए न मन्त्र, न औषधि, न कुछ और आवश्यक रहता है; दूसरे जप के बिना ही उच्चाटन आदि सब सिद्ध हो जाते हैं।

समग्राण्यपि सिद्ध्यन्ति लोकशङ्कामिमां हरः । कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ॥5॥

samagrāṇyapi siddhyanti lokaśaṅkāmimāṃ haraḥ | kṛtvā nimantrayāmāsa sarvamevamidaṃ śubham ||5||

सब साधन समान रूप से सिद्धि देते हैं, तो श्रेष्ठ कौन-सा है — लोगों की इस शंका को सामने रखकर भगवान शिव ने बताया कि यह सम्पूर्ण (सप्तशती) स्तोत्र ही शुभ है।

स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः । समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ॥6॥

stotraṃ vai caṇḍikāyāstu tacca guptaṃ cakāra saḥ | samāptirna ca puṇyasya tāṃ yathāvanniyantraṇām ||6||

फिर उन्होंने चण्डिका के इस स्तोत्र को गुप्त (कीलित) कर दिया। इसके पाठ से होने वाले पुण्य का कभी अंत नहीं होता। उस नियंत्रण को यथावत् जानकर जो पाठ करता है…

सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशयः । कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ॥7॥

so'pi kṣemamavāpnoti sarvamevaṃ na saṃśayaḥ | kṛṣṇāyāṃ vā caturdaśyāmaṣṭamyāṃ vā samāhitaḥ ||7||

…वह भी निःसंदेह सब प्रकार का कल्याण पाता है। जो कृष्णपक्ष की चतुर्दशी या अष्टमी को एकाग्र होकर…

ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति । इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥8॥

dadāti pratigṛhṇāti nānyathaiṣā prasīdati | itthaṃrūpeṇa kīlena mahādevena kīlitam ||8||

…देवी को (अपना सब कुछ) अर्पित करता है और फिर उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करता है, उसी पर देवी प्रसन्न होती हैं, अन्यथा नहीं। इस प्रकार की कील से महादेव ने इस स्तोत्र को कीलित किया है।

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम् । स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः ॥9॥

yo niṣkīlāṃ vidhāyaināṃ nityaṃ japati saṃsphuṭam | sa siddhaḥ sa gaṇaḥ so'pi gandharvo jāyate naraḥ ||9||

जो इस (स्तोत्र) को निष्कीलित करके प्रतिदिन स्पष्ट उच्चारण से इसका जप करता है, वह मनुष्य सिद्ध हो जाता है, देवी का गण बनता है और गंधर्व भी होता है।

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते । नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ॥10॥

na caivāpyaṭatastasya bhayaṃ kvāpīha jāyate | nāpamṛtyuvaśaṃ yāti mṛto mokṣamavāpnuyāt ||10||

कहीं भी विचरते हुए उसे इस संसार में कोई भय नहीं होता। वह अकाल मृत्यु के वश में नहीं जाता, और देह छूटने पर मोक्ष पाता है।

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति । ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ॥11॥

jñātvā prārabhya kurvīta na kurvāṇo vinaśyati | tato jñātvaiva sampannamidaṃ prārabhyate budhaiḥ ||11||

(कीलन और निष्कीलन की विधि) जानकर ही पाठ आरंभ करना चाहिए; ऐसा करने वाला नष्ट नहीं होता। इसीलिए विद्वान लोग जानकर ही इस पूर्ण स्तोत्र का आरंभ करते हैं।

सौभाग्यादि च यत्किञ्चिद् दृश्यते ललनाजने । तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ॥12॥

saubhāgyādi ca yatkiñcid dṛśyate lalanājane | tatsarvaṃ tatprasādena tena jāpyamidaṃ śubham ||12||

स्त्रियों में जो कुछ भी सौभाग्य आदि दिखाई देता है, वह सब उन्हीं देवी की कृपा से है। इसलिए इस शुभ स्तोत्र का जप करना चाहिए।

शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः । भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत् ॥13॥

śanaistu japyamāne'smin stotre sampattiruccakaiḥ | bhavatyeva samagrāpi tataḥ prārabhyameva tat ||13||

इस स्तोत्र का धीरे-धीरे जप करने पर बड़ी और पूरी संपत्ति प्राप्त होती ही है। इसलिए इसका पाठ आरंभ करना ही चाहिए।

ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः । शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः ॥14॥

aiśvaryaṃ yatprasādena saubhāgyārogyasampadaḥ | śatruhāniḥ paro mokṣaḥ stūyate sā na kiṃ janaiḥ ||14||

जिनकी कृपा से ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, संपत्ति, शत्रुओं का नाश और परम मोक्ष मिलता है, उन देवी की स्तुति लोग क्यों न करें?

फलश्रुति (पाठ का फल बताने वाले श्लोक) इस स्तोत्र का अपना कथन है — अर्थ में हमने वही भाव रखा है। यह परंपरा की श्रद्धा है, किसी परिणाम की गारंटी नहीं।

पाठ और अर्थ का स्रोत

मूल पाठ: संस्कृत विकिस्रोत (CC BY-SA 4.0) के आधार पर; श्लोकों का क्रम और विभाजन द्रिक पंचांग के पाठ से (जो गीता प्रेस का क्रम मानता है), और जहाँ उपलब्ध हो वहाँ sanskritdocuments.org से भी शब्द-दर-शब्द मिलाया गया है; तीनों रहस्यों में द्रिक, वाचस्पत्यम् (विकिस्रोत) और स्तोत्रनिधि का बहुमत लिया गया है। स्रोतों में जो भी अंतर मिला, वह हाथ से जाँचा गया है। अर्थ: मूल संस्कृत से; ऋग्वेद के सूक्तों में R. T. H. Griffith (1896) के अनुवाद से मिलाकर। CC BY-SA 4.0

कीलक स्तोत्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न