नवम अध्याय — निशुम्भवध

श्रीदुर्गासप्तशती · उत्तम चरित्र

41 मंत्र — मूल संस्कृत, IAST और सरल हिंदी अर्थ के साथ।

इस अध्याय में

निशुंभ देवी पर आक्रमण करता है और द्वंद्व युद्ध में पराजित होता है। शुंभ उसकी सहायता को आता है, पर देवी उसे रोककर निशुंभ का वध करती हैं।

॥ निशुम्भवधो नाम नवमोऽध्यायः ॥

ॐ राजोवाच ॥1॥

oṃ rājovāca ||1||

राजा बोले।

विचित्रमिदमाख्यातं भगवन् भवता मम । देव्याश्चरितमाहात्म्यं रक्तबीजवधाश्रितम् ॥2॥

vicitramidamākhyātaṃ bhagavan bhavatā mama | devyāścaritamāhātmyaṃ raktabījavadhāśritam ||2||

भगवन्! आपने रक्तबीज के वध से जुड़ा देवी के चरित्र का यह अद्भुत माहात्म्य मुझे सुनाया।

भूयश्चेच्छाम्यहं श्रोतुं रक्तबीजे निपातिते । चकार शुम्भो यत्कर्म निशुम्भश्चातिकोपनः ॥3॥

bhūyaścecchāmyahaṃ śrotuṃ raktabīje nipātite | cakāra śumbho yatkarma niśumbhaścātikopanaḥ ||3||

अब मैं आगे सुनना चाहता हूँ कि रक्तबीज के मारे जाने पर शुंभ ने और अत्यंत क्रोधी निशुंभ ने क्या किया।

ऋषिरुवाच ॥4॥

ṛṣiruvāca ||4||

ऋषि बोले।

चकार कोपमतुलं रक्तबीजे निपातिते । शुम्भासुरो निशुम्भश्च हतेष्वन्येषु चाहवे ॥5॥

cakāra kopamatulaṃ raktabīje nipātite | śumbhāsuro niśumbhaśca hateṣvanyeṣu cāhave ||5||

रक्तबीज और युद्ध में दूसरे असुरों के मारे जाने पर असुर शुंभ और निशुंभ को अपार क्रोध आया।

हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामर्षमुद्वहन् । अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययासुरसेनया ॥6॥

hanyamānaṃ mahāsainyaṃ vilokyāmarṣamudvahan | abhyadhāvanniśumbho'tha mukhyayāsurasenayā ||6||

अपनी विशाल सेना को मरते देखकर क्रोध से भरा निशुंभ असुरों की मुख्य सेना के साथ आगे दौड़ा।

तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे पार्श्वयोश्च महासुराः । संदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा हन्तुं देवीमुपाययुः ॥7॥

tasyāgratastathā pṛṣṭhe pārśvayośca mahāsurāḥ | saṃdaṣṭauṣṭhapuṭāḥ kruddhā hantuṃ devīmupāyayuḥ ||7||

उसके आगे, पीछे और दोनों ओर होंठ चबाते हुए क्रोधित महान असुर देवी को मारने आगे बढ़े।

आजगाम महावीर्यः शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः । निहन्तुं चण्डिकां कोपात्कृत्वा युद्धं तु मातृभिः ॥8॥

ājagāma mahāvīryaḥ śumbho'pi svabalairvṛtaḥ | nihantuṃ caṇḍikāṃ kopātkṛtvā yuddhaṃ tu mātṛbhiḥ ||8||

महापराक्रमी शुंभ भी अपनी सेना से घिरकर, मातृकाओं से युद्ध करके, क्रोध से चण्डिका को मारने आया।

ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः । शरवर्षमतीवोग्रं मेघयोरिव वर्षतोः ॥9॥

tato yuddhamatīvāsīddevyā śumbhaniśumbhayoḥ | śaravarṣamatīvograṃ meghayoriva varṣatoḥ ||9||

तब देवी का शुंभ और निशुंभ से घोर युद्ध हुआ। दो बरसते बादलों की तरह वे दोनों देवी पर बाणों की अत्यंत भयानक वर्षा करने लगे।

चिच्छेदास्ताञ्छरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः । ताडयामास चाङ्गेषु शस्त्रौघैरसुरेश्वरौ ॥10॥

cicchedāstāñcharāṃstābhyāṃ caṇḍikā svaśarotkaraiḥ | tāḍayāmāsa cāṅgeṣu śastraughairasureśvarau ||10||

चण्डिका ने अपने बाणों के झुंड से उनके चलाए बाण काट डाले, और अपने अस्त्रों की बौछार से दोनों असुरराजों के अंगों पर प्रहार किया।

निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम् । अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम् ॥11॥

niśumbho niśitaṃ khaḍgaṃ carma cādāya suprabham | atāḍayanmūrdhni siṃhaṃ devyā vāhanamuttamam ||11||

निशुंभ ने तेज़ तलवार और चमकती ढाल लेकर देवी के श्रेष्ठ वाहन सिंह के सिर पर प्रहार किया।

ताडिते वाहने देवी क्षुरप्रेणासिमुत्तमम् । निशुम्भस्याशु चिच्छेद चर्म चाप्यष्टचन्द्रकम् ॥12॥

tāḍite vāhane devī kṣurapreṇāsimuttamam | niśumbhasyāśu ciccheda carma cāpyaṣṭacandrakam ||12||

वाहन पर प्रहार होते ही देवी ने क्षुरप्र (छुरे जैसे फल वाले) बाण से निशुंभ की उत्तम तलवार और आठ चंद्रमाओं से सजी ढाल भी तुरंत काट डाली।

छिन्ने चर्मणि खड्गे च शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः । तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम् ॥13॥

chinne carmaṇi khaḍge ca śaktiṃ cikṣepa so'suraḥ | tāmapyasya dvidhā cakre cakreṇābhimukhāgatām ||13||

ढाल और तलवार कट जाने पर उस असुर ने शक्ति फेंकी। सामने आती उस शक्ति के भी देवी ने चक्र से दो टुकड़े कर दिए।

कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः । आयातं मुष्टिपातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत् ॥14॥

kopādhmāto niśumbho'tha śūlaṃ jagrāha dānavaḥ | āyātaṃ muṣṭipātena devī taccāpyacūrṇayat ||14||

तब क्रोध से फूले दानव निशुंभ ने शूल उठाया। आते हुए उस शूल को भी देवी ने मुक्के के प्रहार से चूर कर दिया।

आविध्याथ गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति । सापि देव्या त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता ॥15॥

āvidhyātha gadāṃ so'pi cikṣepa caṇḍikāṃ prati | sāpi devyā triśūlena bhinnā bhasmatvamāgatā ||15||

फिर उसने गदा घुमाकर चण्डिका पर फेंकी। वह भी देवी के त्रिशूल से टूटकर भस्म हो गई।

ततः परशुहस्तं तमायान्तं दैत्यपुङ्गवम् । आहत्य देवी बाणौघैरपातयत भूतले ॥16॥

tataḥ paraśuhastaṃ tamāyāntaṃ daityapuṅgavam | āhatya devī bāṇaughairapātayata bhūtale ||16||

तब हाथ में फरसा लिए आते उस दैत्यश्रेष्ठ को देवी ने बाणों की बौछार से घायल करके धरती पर गिरा दिया।

तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे । भ्रातर्यतीव संक्रुद्धः प्रययौ हन्तुमम्बिकाम् ॥17॥

tasminnipatite bhūmau niśumbhe bhīmavikrame | bhrātaryatīva saṃkruddhaḥ prayayau hantumambikām ||17||

भयानक पराक्रमी भाई निशुंभ के धरती पर गिर जाने पर शुंभ अत्यंत क्रोधित होकर अम्बिका को मारने चला।

स रथस्थस्तथात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः । भुजैरष्टाभिरतुलैर्व्याप्याशेषं बभौ नभः ॥18॥

sa rathasthastathātyuccairgṛhītaparamāyudhaiḥ | bhujairaṣṭābhiratulairvyāpyāśeṣaṃ babhau nabhaḥ ||18||

रथ पर खड़ा वह श्रेष्ठ अस्त्र लिए अपनी आठ अतुलनीय, ऊँची उठी भुजाओं से सारे आकाश को घेरता हुआ शोभित हुआ।

तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत् । ज्याशब्दं चापि धनुषश्चकारातीव दुःसहम् ॥19॥

tamāyāntaṃ samālokya devī śaṅkhamavādayat | jyāśabdaṃ cāpi dhanuṣaścakārātīva duḥsaham ||19||

उसे आते देखकर देवी ने शंख बजाया, और धनुष की डोरी से अत्यंत असहनीय टंकार की।

पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च । समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना ॥20॥

pūrayāmāsa kakubho nijaghaṇṭāsvanena ca | samastadaityasainyānāṃ tejovadhavidhāyinā ||20||

और अपने घंटे की ध्वनि से, जो सारी दैत्य सेनाओं का तेज नष्ट करने वाली थी, दिशाओं को भर दिया।

ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः । पूरयामास गगनं गां तथैव दिशो दश ॥21॥

tataḥ siṃho mahānādaistyājitebhamahāmadaiḥ | pūrayāmāsa gaganaṃ gāṃ tathaiva diśo daśa ||21||

तब सिंह ने अपनी भारी गर्जना से, जिससे हाथियों का मद भी उतर गया, आकाश, पृथ्वी और दसों दिशाएँ भर दीं।

ततः काली समुत्पत्य गगनं क्ष्मामताडयत् । कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः ॥22॥

tataḥ kālī samutpatya gaganaṃ kṣmāmatāḍayat | karābhyāṃ tanninādena prāksvanāste tirohitāḥ ||22||

फिर काली ने उछलकर दोनों हाथों से आकाश और पृथ्वी पर प्रहार किया। उस नाद में पहले की सारी ध्वनियाँ दब गईं।

अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह । तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शुम्भः कोपं परं ययौ ॥23॥

aṭṭāṭṭahāsamaśivaṃ śivadūtī cakāra ha | taiḥ śabdairasurāstresuḥ śumbhaḥ kopaṃ paraṃ yayau ||23||

शिवदूती ने अमंगल अट्टहास किया। उन शब्दों से असुर काँप उठे, और शुंभ को बहुत क्रोध आया।

दुरात्मंस्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा । तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः ॥24॥

durātmaṃstiṣṭha tiṣṭheti vyājahārāmbikā yadā | tadā jayetyabhihitaṃ devairākāśasaṃsthitaiḥ ||24||

जब अम्बिका ने कहा — "अरे दुरात्मा! ठहर, ठहर!" — तब आकाश में स्थित देवताओं ने कहा — "जय हो!"

शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा । आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया ॥25॥

śumbhenāgatya yā śaktirmuktā jvālātibhīṣaṇā | āyāntī vahnikūṭābhā sā nirastā maholkayā ||25||

शुंभ ने पास आकर अत्यंत भयानक ज्वालाओं वाली जो शक्ति छोड़ी, आग के पहाड़ जैसी चमकती वह शक्ति देवी ने एक बड़ी उल्का से दूर हटा दी।

सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम् । निर्घातनिःस्वनो घोरो जितवानवनीपते ॥26॥

siṃhanādena śumbhasya vyāptaṃ lokatrayāntaram | nirghātaniḥsvano ghoro jitavānavanīpate ||26||

हे राजा! शुंभ के सिंहनाद से तीनों लोकों का बीच का भाग भर गया, पर (युद्ध का) भयानक वज्रपात-सा घोष उससे भी बढ़ गया।

शुम्भमुक्ताञ्छरान्देवी शुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान् । चिच्छेद स्वशरैरुग्रैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥27॥

śumbhamuktāñcharāndevī śumbhastatprahitāñcharān | ciccheda svaśarairugraiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ ||27||

शुंभ के छोड़े बाणों को देवी ने, और देवी के छोड़े बाणों को शुंभ ने अपने उग्र बाणों से सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में काट डाला।

ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम् । स तदाभिहतो भूमौ मूर्च्छितो निपपात ह ॥28॥

tataḥ sā caṇḍikā kruddhā śūlenābhijaghāna tam | sa tadābhihato bhūmau mūrcchito nipapāta ha ||28||

तब क्रोधित चण्डिका ने शूल से उस पर प्रहार किया, और घायल होकर वह मूर्च्छित हो धरती पर गिर पड़ा।

ततो निशुम्भः सम्प्राप्य चेतनामात्तकार्मुकः । आजघान शरैर्देवीं कालीं केसरिणं तथा ॥29॥

tato niśumbhaḥ samprāpya cetanāmāttakārmukaḥ | ājaghāna śarairdevīṃ kālīṃ kesariṇaṃ tathā ||29||

तब निशुंभ ने होश में आकर धनुष उठाया और बाणों से देवी, काली और सिंह पर प्रहार किया।

पुनश्च कृत्वा बाहूनामयुतं दनुजेश्वरः । चक्रायुधेन दितिजश्छादयामास चण्डिकाम् ॥30॥

punaśca kṛtvā bāhūnāmayutaṃ danujeśvaraḥ | cakrāyudhena ditijaśchādayāmāsa caṇḍikām ||30||

फिर उस दानवराज, दिति के पुत्र ने दस हज़ार भुजाएँ बनाकर चक्रों से चण्डिका को ढक दिया।

ततो भगवती क्रुद्धा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी । चिच्छेद तानि चक्राणि स्वशरैः सायकांश्च तान् ॥31॥

tato bhagavatī kruddhā durgā durgārtināśinī | ciccheda tāni cakrāṇi svaśaraiḥ sāyakāṃśca tān ||31||

तब कठिन विपत्ति का नाश करने वाली भगवती दुर्गा ने क्रोधित होकर अपने बाणों से उन चक्रों और बाणों को काट डाला।

ततो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चण्डिकाम् । अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसेनासमावृतः ॥32॥

tato niśumbho vegena gadāmādāya caṇḍikām | abhyadhāvata vai hantuṃ daityasenāsamāvṛtaḥ ||32||

तब निशुंभ गदा लेकर, दैत्य-सेना से घिरा हुआ, चण्डिका को मारने के लिए वेग से दौड़ा।

तस्यापतत एवाशु गदां चिच्छेद चण्डिका । खड्गेन शितधारेण स च शूलं समाददे ॥33॥

tasyāpatata evāśu gadāṃ ciccheda caṇḍikā | khaḍgena śitadhāreṇa sa ca śūlaṃ samādade ||33||

उसके झपटते ही चण्डिका ने तेज़ धार वाली तलवार से उसकी गदा तुरंत काट डाली। तब उसने शूल उठा लिया।

शूलहस्तं समायान्तं निशुम्भममरार्दनम् । हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका ॥34॥

śūlahastaṃ samāyāntaṃ niśumbhamamarārdanam | hṛdi vivyādha śūlena vegāviddhena caṇḍikā ||34||

देवताओं को सताने वाले निशुंभ को हाथ में शूल लिए आते देखकर चण्डिका ने वेग से चलाए शूल से उसका हृदय बींध दिया।

भिन्नस्य तस्य शूलेन हृदयान्निःसृतोऽपरः । महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन् ॥35॥

bhinnasya tasya śūlena hṛdayānniḥsṛto'paraḥ | mahābalo mahāvīryastiṣṭheti puruṣo vadan ||35||

शूल से बिंधे उसके हृदय से एक दूसरा महाबली, महापराक्रमी पुरुष "ठहर!" कहता हुआ निकला।

तस्य निष्क्रामतो देवी प्रहस्य स्वनवत्ततः । शिरश्चिच्छेद खड्गेन ततोऽसावपतद्भुवि ॥36॥

tasya niṣkrāmato devī prahasya svanavattataḥ | śiraściccheda khaḍgena tato'sāvapatadbhuvi ||36||

उसके निकलते ही देवी ने ज़ोर से हँसकर तलवार से उसका सिर काट दिया, और वह धरती पर गिर पड़ा।

ततः सिंहश्चखादोग्रं दंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान् । असुरांस्तांस्तथा काली शिवदूती तथापरान् ॥37॥

tataḥ siṃhaścakhādograṃ daṃṣṭrākṣuṇṇaśirodharān | asurāṃstāṃstathā kālī śivadūtī tathāparān ||37||

तब सिंह अपनी उग्र दाढ़ों से गर्दन कुचले हुए असुरों को खाने लगा, और काली तथा शिवदूती दूसरे असुरों को।

कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाः केचिन्नेशुर्महासुराः । ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः ॥38॥

kaumārīśaktinirbhinnāḥ kecinneśurmahāsurāḥ | brahmāṇīmantrapūtena toyenānye nirākṛtāḥ ||38||

कौमारी की शक्ति से बिंधकर कुछ महान असुर मर गए, और ब्रह्माणी के मंत्र-पवित्र जल से दूसरे खदेड़ दिए गए।

माहेश्वरीत्रिशूलेन भिन्नाः पेतुस्तथापरे । वाराहीतुण्डघातेन केचिच्चूर्णीकृता भुवि ॥39॥

māheśvarītriśūlena bhinnāḥ petustathāpare | vārāhītuṇḍaghātena keciccūrṇīkṛtā bhuvi ||39||

माहेश्वरी के त्रिशूल से बिंधकर दूसरे गिर पड़े, और वाराही की थूथन की चोट से कुछ धरती पर चूर-चूर हो गए।

खण्डं खण्डं च चक्रेण वैष्णव्या दानवाः कृताः । वज्रेण चैन्द्रीहस्ताग्रविमुक्तेन तथापरे ॥40॥

khaṇḍaṃ khaṇḍaṃ ca cakreṇa vaiṣṇavyā dānavāḥ kṛtāḥ | vajreṇa caindrīhastāgravimuktena tathāpare ||40||

वैष्णवी के चक्र से दानवों के टुकड़े-टुकड़े हो गए, और ऐन्द्री के हाथ से छूटे वज्र से दूसरे भी।

केचिद्विनेशुरसुराः केचिन्नष्टा महाहवात् । भक्षिताश्चापरे कालीशिवदूतीमृगाधिपैः ॐ ॥41॥

kecidvineśurasurāḥ kecinnaṣṭā mahāhavāt | bhakṣitāścāpare kālīśivadūtīmṛgādhipaiḥ oṃ ||41||

कुछ असुर मारे गए, कुछ उस महासमर से भाग गए, और दूसरों को काली, शिवदूती और सिंह खा गए।

पाठ और अर्थ का स्रोत

मूल पाठ: संस्कृत विकिस्रोत के "मार्कण्डेयपुराणम्" (अध्याय 81–93, CC BY-SA 4.0) के आधार पर, sanskritdocuments.org और द्रिक पंचांग के पाठ से शब्द-दर-शब्द मिलाकर — जहाँ स्रोत अलग थे, वहाँ कम से कम दो स्रोतों वाला पाठ लिया गया है। अर्थ: F. E. Pargiter के अंग्रेज़ी अनुवाद (1904) के आधार पर। CC BY-SA 4.0

एक नज़र में

अध्यायनवम (9/13)
चरित्रउत्तम चरित्र
देवतामहासरस्वती
ऋषिरुद्र
छन्दअनुष्टुप्
मंत्र41

नवम अध्याय — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न