कन्या पूजन क्या है
नवरात्रि में हम नौ दिन देवी के नौ रूपों को पूजते हैं। कन्या पूजन में वही देवी घर की छोटी बच्चियों के रूप में आती मानी जाती हैं।
कई परिवार यह अष्टमी को करते हैं, कई नवमी को। दोनों ही परंपराएँ चलती हैं — अपने घर की परंपरा के अनुसार दिन चुनिए।
किस आयु की कन्या, कौन-सा रूप
देवी भागवत पुराण (तीसरा स्कंध, अध्याय 26) में दो से दस वर्ष की कन्याओं के नौ नाम बताए गए हैं। हर आयु की कन्या एक रूप की मानी जाती है, और उसकी पूजा का अलग फल बताया गया है।
| आयु | नाम | पूजा का फल (मान्यता) |
|---|---|---|
| 2 वर्ष | कुमारी | दरिद्रता और शत्रु से मुक्ति |
| 3 वर्ष | त्रिमूर्ति | धर्म, धन और संतान |
| 4 वर्ष | कल्याणी | मनोकामना की पूर्ति |
| 5 वर्ष | रोहिणी | रोग से मुक्ति |
| 6 वर्ष | कालिका | शत्रु पर जीत |
| 7 वर्ष | चण्डिका | समृद्धि |
| 8 वर्ष | शाम्भवी | विजय |
| 9 वर्ष | दुर्गा | कठिन शत्रु पर जीत, परलोक का सुख |
| 10 वर्ष | सुभद्रा | मनोकामना की पूर्ति |
पुराण के अनुसार एक वर्ष की बच्ची और दस वर्ष से बड़ी कन्या इस पूजा में नहीं ली जातीं। कुछ स्रोत एक वर्ष से गिनती शुरू करते हैं, पर हमने पुराण का नियम लिया है।
कितनी कन्याएँ बुलाएँ
देवी भागवत पुराण कई तरीक़े बताता है। रोज़ एक कन्या की पूजा, या हर दिन एक-एक (या दो-तीन) कन्या बढ़ाकर, या पूरे नवरात्र में कुल नौ।
आजकल ज़्यादातर घरों में अष्टमी या नवमी को एक ही दिन नौ कन्याएँ बुलाई जाती हैं। कई परिवारों में उनके साथ एक बालक को भी बिठाया जाता है। इस बालक वाली बात का शास्त्रीय स्रोत हमें नहीं मिला — यह परिवारों की परंपरा है।
कम कन्याएँ मिलें, तो घबराइए मत। पुराण में रोज़ एक-एक कन्या की पूजा का तरीक़ा भी दिया गया है — संख्या से बड़ा भाव है।
कन्या पूजन की विधि
- कन्याओं को आदर से अपने घर बुलाइए।
- साफ़ जल से — चाहें तो दूध मिले जल से — उनके चरण धोइए।
- उन्हें साफ़ आसन पर बिठाइए।
- माथे पर तिलक लगाइए, हाथ में मौली बाँधिए और फूल अर्पित कीजिए।
- प्रेम से भोजन कराइए — प्रायः हलवा, पूड़ी और काले चने।
- अपनी सामर्थ्य के अनुसार फल, भेंट या दक्षिणा दीजिए — सबको बराबर।
- उनके चरण छूकर आशीर्वाद लीजिए, और आदर से विदा कीजिए।
विधि के ये चरण दो स्रोतों में एक जैसे मिलते हैं। संस्कृत मंत्र हमें केवल एक स्रोत में मिले, इसलिए यहाँ नहीं दिए।
असली बात — भाव
हर कन्या देवी का रूप मानी गई है। इसलिए किसी बच्ची में भेद मत कीजिए — जो आए, उसे उसी आदर से बिठाइए।
बच्चियों पर ज़्यादा खिलाने का दबाव न डालें। उन्हें सहज रखिए, हँसने दीजिए। पूजा का सुख उनकी मुस्कान में है।
