स्वरूप
| वाहन | सिंह |
|---|---|
| भुजाएँ | चार |
| हाथों में | ऊपर के दोनों हाथों में कमल; एक हाथ से गोद में बालक स्कंद को थामे; एक हाथ अभय मुद्रा में |
| आसन | कमल — इसीलिए पद्मासना |
| वर्ण | शुभ्र (उज्ज्वल, श्वेत) |
| प्रिय फूल | लाल रंग के फूल |
माँ स्कंदमाता की कथा
तारकासुर का वरदान। तारकासुर नाम के असुर ने कठोर तप करके ब्रह्मा जी से दो वरदान माँगे। एक, तीनों लोकों में कोई उसकी बराबरी न कर सके। दूसरा, उसकी मृत्यु केवल शिव के पुत्र के हाथों हो।
उसने सोचा था कि शिव तो योगी हैं, उनका पुत्र कभी होगा ही नहीं। वरदान पाकर उसका आतंक बहुत बढ़ गया, और देवता परेशान हो उठे।
कार्तिकेय का जन्म। देवताओं ने शिव का ध्यान तोड़ने के लिए कामदेव को भेजा, जिसे शिव ने भस्म कर दिया। पर शिव का ध्यान पार्वती की ओर गया, जिन्होंने उन्हें पाने के लिए कठोर तप किया था। फिर शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिन्हें स्कंद भी कहते हैं।
कई ग्रंथों के अनुसार बालक को छह कृत्तिकाओं ने पाला, इसीलिए नाम पड़ा कार्तिकेय। तमिल स्कंद पुराण के अनुसार वे छह बालकों के रूप में जन्मे, जिन्हें माँ पार्वती ने एक कर दिया — इसी से वे छह मुख वाले षण्मुख कहलाए।
माँ का आशीर्वाद। बड़े होने पर कार्तिकेय देवताओं की सेना के सेनापति बने। उन्हें दिव्य भाला (वेल) मिला, जिसे माँ पार्वती की शक्ति का रूप माना गया है। माँ के मार्गदर्शन और आशीर्वाद से उन्होंने तारकासुर को हराया, और देवताओं को भय से मुक्त किया।
पुत्र स्कंद को गोद में लिए, उसे जीत की शक्ति देने वाली माँ का यही रूप स्कंदमाता कहलाया।
कार्तिकेय के जन्म के विवरण ग्रंथों में अलग-अलग हैं — महाभारत, कुमारसंभव और स्कंद पुराण की कथाओं में भेद है। ऊपर हमने वही लिखा है जिस पर स्रोत मिलते हैं, और जहाँ भेद है वहाँ ग्रंथ का नाम दिया है।
पाँचवें दिन का महत्व
द्रिक पंचांग एक विशेष बात बताता है। स्कंदमाता की पूजा से भगवान कार्तिकेय की पूजा भी अपने-आप हो जाती है, क्योंकि वे माँ की गोद में ही विराजते हैं। यह विशेषता केवल इसी रूप की है।
यह माँ का वात्सल्य वाला रूप है। आप इस दिन घर के बच्चों के साथ बैठकर पूजा कीजिए — उन्हें यह कथा सुनाइए, जिसमें एक माँ अपने बेटे को जीतने की ताक़त देती है।
माँ स्कंदमाता के मंत्र
प्रार्थना श्लोक
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया । शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ॥
siṃhāsanagatā nityaṃ padmāśritakaradvayā | śubhadāstu sadā devī skandamātā yaśasvinī ||
अर्थ: जो सदा सिंह के आसन पर विराजती हैं और जिनके दोनों हाथ कमलों पर टिके हैं, वे यशस्विनी देवी स्कंदमाता सदा शुभ करने वाली हों।
पाठ-भेद: द्रिक पंचांग "पद्माश्रित" के स्थान पर "पद्माञ्चित" (कमलों से सुशोभित) पढ़ता है। हमने sanskritdocuments और shlokam दोनों में मिलने वाला "पद्माश्रित" लिया है।
नाम मंत्र
ॐ देवी स्कन्दमात्रे नमः॥
oṃ devī skandamātre namaḥ||
यह छोटा मंत्र जप के लिए है — अर्थ है “देवी स्कंदमाता को नमस्कार”। आप इसे अपनी श्रद्धा से 11, 21 या 108 बार जप सकते हैं; संख्या से बड़ा मन का भाव है।
बीज मंत्र (प्रचलित)
ह्रीं क्लीं स्वामिन्यै नमः॥
hrīṃ klīṃ svāminyai namaḥ||
नवदुर्गा के बीज मंत्रों की यह सूची कई हिंदी स्रोतों में शब्दशः एक-सी मिलती है, पर इनमें से किसी ने किसी शास्त्र का हवाला नहीं दिया — इसलिए इसे “प्रचलित” कहा है। परंपरा में बीज मंत्र गुरु से लेकर जपने की बात कही जाती है; बिना दीक्षा के ऊपर दिया नाम मंत्र और प्रार्थना श्लोक सरल और पूर्ण हैं। प्रचलित स्रोतों में "स्वमिन्यै" छपा है; "स्वामिनी" की चतुर्थी का शुद्ध रूप "स्वामिन्यै" है (श्री मंदिर भी यही देता है), वही यहाँ दिया है।
स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
yā devī sarvabhūteṣu mām̐ skandamātā rūpeṇa saṃsthitā| namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ||
अर्थ: जो देवी सब प्राणियों में माँ स्कंदमाता के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
“या देवी सर्वभूतेषु” स्तुति मूल रूप से दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय की है (“…शक्तिरूपेण संस्थिता” आदि)। नौ देवियों के नाम वाला यह रूप भक्ति-परंपरा में उसी से बना है।
माँ स्कंदमाता की पूजा विधि
नवरात्रि में पूजा का क्रम हर दिन एक ही रहता है। बदलते हैं देवी, उनका मंत्र, फूल और भोग।पाँचवें दिन आप ऐसे पूजा कर सकते हैं:
- स्नान करके साफ़ कपड़े पहनिए, और कलश व पूजा-स्थान को प्रणाम कीजिए।
- माँ स्कंदमाता का ध्यान कीजिए और ऊपर दिया प्रार्थना श्लोक पढ़कर उनका आवाहन कीजिए।
- आसन के लिए फूल, फिर जल (पाद्य, अर्घ्य, आचमन) अर्पित कीजिए।
- स्नान के लिए जल, फिर वस्त्र के रूप में मौली, चंदन, कुमकुम और अक्षत चढ़ाइए।
- लाल फूल अर्पित कीजिए, और बिल्वपत्र भी।
- धूप और दीप दिखाइए।
- भोग में केला चढ़ाइए, साथ में फल।
- नाम मंत्र का जप कीजिए, फिर आरती और परिक्रमा।
- अंत में पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँग लीजिए।
यह षोडशोपचार पूजा का सरल क्रम है। समय कम हो, तो पंचोपचार भी पूरा माना गया है — दीप, धूप, फूल, गंध और नैवेद्य। घबराइए मत, भाव सच्चा हो तो छोटी पूजा भी पूरी है।
ग्रह और चक्र — मान्यता
ज्योतिषीय मान्यता में माँ स्कंदमाता का संबंध बुध ग्रह से जोड़ा जाता है।
इनके ध्यान मंत्र में इन्हें विशुद्ध चक्र में स्थित बताया गया है।
ये परंपरा और ज्योतिष की मान्यताएँ हैं, शास्त्र का नियम या भविष्यवाणी नहीं।
