श्री पार्वती चालीसा

śrī pārvatī cālīsā

Parvati Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
सोमवार, मंगलवार; नवरात्रि व हरतालिका तीज
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

परिचय

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

स्रोत: पारंपरिक पार्वती चालीसा

संपूर्ण चालीसा

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गणपति-गिरिजा-सुत सुमिर, करूँ मातु गुणगान। पार्वती की वंदना, देहु अभय वरदान॥

गिरिजा-पुत्र गणपति का स्मरण कर मैं माता का गुणगान करता हूँ; हे पार्वती माता, वंदना स्वीकार कर अभय वरदान दीजिए।

जय जय गिरिराज-किशोरी। जय महेश-मुख-चंद्र-चकोरी॥

हे गिरिराज (हिमालय) की पुत्री, आपकी जय हो; आप महेश (शिव) के मुख-चन्द्र की चकोरी हैं।

गौर-वरण शशि-सम मुख सोहे। रूप निरख जग-त्रय मन मोहे॥

गौर वर्ण व चन्द्र-सा मुख सुशोभित है; आपका रूप निरखकर तीनों लोक मोहित हो जाते हैं।

शिव-अर्द्धांगिनी जग-महतारी। सुर-नर-मुनि सब के हितकारी॥

आप शिव की अर्द्धांगिनी व जगत-जननी हैं; देव, मनुष्य व मुनि — सबका हित करने वाली हैं।

गौरी उमा शिवानी नामा। नाम अनेक एक तुम धामा॥

गौरी, उमा, शिवानी आदि आपके अनेक नाम हैं, किन्तु धाम (स्वरूप) एक ही है।

दुर्गा-काली तुम्हीं भवानी। आदिशक्ति तुम परम कल्याणी॥

दुर्गा, काली व भवानी — सब आप ही हैं; आप आदिशक्ति व परम कल्याणी हैं।

तप कर शिव को वर में पाया। जग को सती-धर्म दिखलाया॥

आपने कठोर तप कर शिव को वर रूप में पाया और जगत को पतिव्रता-धर्म दिखाया।

गणपति-कार्तिक मातु तुम्हारी। पुत्र-रूप जग में अति प्यारी॥

गणपति व कार्तिकेय आपके पुत्र हैं; इस रूप में आप जगत में अति प्यारी हैं।

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। सुख-सौभाग्य सहज वह पावै॥

जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही सुख-सौभाग्य पाता है।

सुहागिनि जो तुम्हें मनावैं। अखण्ड सौभाग्य वे सब पावैं॥

जो सुहागिन स्त्रियाँ आपको मनाती हैं, वे अखण्ड सौभाग्य पाती हैं।

हरतालिका तीज जो धारे। सुख-सौभाग्य माँ ता पर वारे॥

जो हरतालिका तीज का व्रत धारण करता है, हे माँ, आप उस पर सुख-सौभाग्य न्योछावर करती हैं।

मंगला गौरी व्रत जो करते। सन्तान-सुख वे सब भरते॥

जो मंगला गौरी का व्रत करते हैं, वे सन्तान-सुख से भर जाते हैं।

संतान-हीन जो तुम्हें ध्यावै। सुयोग्य संतान सहज वह पावै॥

जो संतान-हीन जन आपको ध्याता है, वह सहज ही सुयोग्य संतान पाता है।

रोग-शोक सब दूर भगाती। सुख-समृद्धि घर में लाती॥

आप समस्त रोग-शोक दूर भगाती हैं और घर में सुख-समृद्धि लाती हैं।

जो जन तुमको शीश नवावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करती बेड़ा पारा॥

आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देती हैं।

सिंह-वाहिनी शोभा पावै। भक्त-गण नित दरस को धावै॥

सिंह पर सवार होकर आप शोभा पाती हैं; भक्तगण नित्य दर्शन को दौड़े आते हैं।

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।

काशी विश्वनाथ की रानी। अन्नपूर्णा रूप कल्याणी॥

आप काशी-विश्वनाथ की रानी हैं और अन्नपूर्णा रूप में कल्याणी हैं।

अन्न-धन की कमी न आवै। जहँ तुम्हरी कृपा बरसावै॥

जहाँ आपकी कृपा बरसती है, वहाँ अन्न-धन की कमी नहीं आती।

साहस-बल तुम भक्तन देती। निर्भयता का वर तुम देती॥

आप भक्तों को साहस व बल देती हैं और निर्भयता का वरदान देती हैं।

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। गौरी-कृपा सहज वह पावै॥

जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही गौरी-कृपा प्राप्त करता है।

सोलह शृंगार चढ़ावैं माता। सुहाग-सौभाग्य तुम्हीं से नाता॥

हे माता, भक्त आपको सोलह शृंगार चढ़ाते हैं; सुहाग व सौभाग्य का नाता आप ही से है।

दुष्ट-दलन तुम जग-रखवारी। भक्तन की तुम सदा सहारी॥

आप दुष्टों का दमन कर जगत की रक्षा करती हैं; आप सदा भक्तों की सहारी हैं।

जो श्रद्धा से भोग चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

जो श्रद्धा से भोग चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।

गणगौर पर तुम्हें मनावैं। सुहागिनि सब मंगल पावैं॥

गणगौर पर भक्त आपको मनाते हैं; सुहागिन स्त्रियाँ सब मंगल पाती हैं।

जो यह पार्वती चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥

जो यह पार्वती चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा गौरी की होई॥

जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर माँ गौरी की कृपा होती है।

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। सुख-सौभाग्य घर में लावैं॥

सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-सौभाग्य लाते हैं।

गौरी-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

जिन पर माँ गौरी की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।

नवरात्रि में पूजन कीजै। अष्टमी-नवमी हवन कीजै॥

नवरात्रि में पूजन कीजिए तथा अष्टमी-नवमी को हवन कीजिए।

कन्या-पूजन जो जन करते। माँ की कृपा से सुख वे भरते॥

जो जन कन्या-पूजन करते हैं, वे माँ की कृपा से सुख से भर जाते हैं।

मंगल-कारी विघ्न-विनाशिनि। भय-हारिणि तुम सुख-प्रदायिनि॥

आप मंगलकारी व विघ्नों की विनाशिनी हैं; भय हरकर सुख प्रदान करती हैं।

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत गौरी देवा॥

जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर माँ गौरी तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं।

संकट-मोचनि नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

आपका नाम संकट-मोचनी है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करती हैं।

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।

गौरी-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

जो जन गौरी-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।

जो जन पार्वती गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

जो जन माँ पार्वती के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।

ऋद्धि-सिद्धि घर में आवै। सुख-सौभाग्य-संतोष बढ़ावै॥

घर में ऋद्धि-सिद्धि आती है और सुख, सौभाग्य व संतोष बढ़ता है।

जय जय जय पार्वती माता। सुख-सौभाग्य-मंगल-दाता॥

हे पार्वती माता, आपकी जय हो; आप सुख, सौभाग्य व मंगल देने वाली हैं।

पार्वती चालीसा सरल, पढ़े प्रेम मन लाय। सुख-सौभाग्य-संतान सब, घर में बसैं सदाय॥

जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल पार्वती चालीसा पढ़ता है, उसके घर में सुख, सौभाग्य व संतान-सुख सदा बसता है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. गिरिजा-पुत्र गणपति का स्मरण कर मैं माता का गुणगान करता हूँ; हे पार्वती माता, वंदना स्वीकार कर अभय वरदान दीजिए।
  2. हे गिरिराज (हिमालय) की पुत्री, आपकी जय हो; आप महेश (शिव) के मुख-चन्द्र की चकोरी हैं।
  3. गौर वर्ण व चन्द्र-सा मुख सुशोभित है; आपका रूप निरखकर तीनों लोक मोहित हो जाते हैं।
  4. आप शिव की अर्द्धांगिनी व जगत-जननी हैं; देव, मनुष्य व मुनि — सबका हित करने वाली हैं।
  5. गौरी, उमा, शिवानी आदि आपके अनेक नाम हैं, किन्तु धाम (स्वरूप) एक ही है।
  6. दुर्गा, काली व भवानी — सब आप ही हैं; आप आदिशक्ति व परम कल्याणी हैं।
  7. आपने कठोर तप कर शिव को वर रूप में पाया और जगत को पतिव्रता-धर्म दिखाया।
  8. गणपति व कार्तिकेय आपके पुत्र हैं; इस रूप में आप जगत में अति प्यारी हैं।
  9. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही सुख-सौभाग्य पाता है।
  10. जो सुहागिन स्त्रियाँ आपको मनाती हैं, वे अखण्ड सौभाग्य पाती हैं।
  11. जो हरतालिका तीज का व्रत धारण करता है, हे माँ, आप उस पर सुख-सौभाग्य न्योछावर करती हैं।
  12. जो मंगला गौरी का व्रत करते हैं, वे सन्तान-सुख से भर जाते हैं।
  13. जो संतान-हीन जन आपको ध्याता है, वह सहज ही सुयोग्य संतान पाता है।
  14. आप समस्त रोग-शोक दूर भगाती हैं और घर में सुख-समृद्धि लाती हैं।
  15. जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  16. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देती हैं।
  17. सिंह पर सवार होकर आप शोभा पाती हैं; भक्तगण नित्य दर्शन को दौड़े आते हैं।
  18. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  19. आप काशी-विश्वनाथ की रानी हैं और अन्नपूर्णा रूप में कल्याणी हैं।
  20. जहाँ आपकी कृपा बरसती है, वहाँ अन्न-धन की कमी नहीं आती।
  21. आप भक्तों को साहस व बल देती हैं और निर्भयता का वरदान देती हैं।
  22. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही गौरी-कृपा प्राप्त करता है।
  23. हे माता, भक्त आपको सोलह शृंगार चढ़ाते हैं; सुहाग व सौभाग्य का नाता आप ही से है।
  24. आप दुष्टों का दमन कर जगत की रक्षा करती हैं; आप सदा भक्तों की सहारी हैं।
  25. जो श्रद्धा से भोग चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  26. गणगौर पर भक्त आपको मनाते हैं; सुहागिन स्त्रियाँ सब मंगल पाती हैं।
  27. जो यह पार्वती चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
  28. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर माँ गौरी की कृपा होती है।
  29. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-सौभाग्य लाते हैं।
  30. जिन पर माँ गौरी की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  31. नवरात्रि में पूजन कीजिए तथा अष्टमी-नवमी को हवन कीजिए।
  32. जो जन कन्या-पूजन करते हैं, वे माँ की कृपा से सुख से भर जाते हैं।
  33. आप मंगलकारी व विघ्नों की विनाशिनी हैं; भय हरकर सुख प्रदान करती हैं।
  34. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर माँ गौरी तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं।
  35. आपका नाम संकट-मोचनी है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करती हैं।
  36. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  37. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  38. जो जन गौरी-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  39. जो जन माँ पार्वती के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  40. घर में ऋद्धि-सिद्धि आती है और सुख, सौभाग्य व संतोष बढ़ता है।
  41. हे पार्वती माता, आपकी जय हो; आप सुख, सौभाग्य व मंगल देने वाली हैं।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल पार्वती चालीसा पढ़ता है, उसके घर में सुख, सौभाग्य व संतान-सुख सदा बसता है।

लाभ

  • अखण्ड सौभाग्य व सुखी दाम्पत्य की प्राप्ति होती है।
  • सन्तान-सुख व पति-पुत्र की रक्षा होती है।
  • घर में सुख-शांति व मनोकामना-पूर्ति होती है।
  • भक्ति, धैर्य व आध्यात्मिक उन्नति बढ़ती है।

कब करें पाठ

सोमवार व मंगलवार कोनवरात्रि मेंहरतालिका तीज, गणगौर व मंगला गौरी व्रत पर

पाठ विधि

माँ पार्वती (गौरी) के समक्ष लाल/पीले पुष्प, सिंदूर व सोलह शृंगार-सामग्री अर्पित करें, दीप जलाकर चालीसा का पाठ करें। हरतालिका तीज, गणगौर व नवरात्रि पर पाठ विशेष फलदायी है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपरापारंपरिक पार्वती चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह
रचयितापारंपरिक
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

माँ दुर्गा

Goddess Durga

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

देवता वर्गशक्ति · रक्षा · विजय · साहस
वाहनसिंह
मुख्य मंत्रॐ दुं दुर्गायै नमः
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श्री पार्वती चालीसा — सामान्य प्रश्न

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