गरुड़ वाहिनी वैष्णवी,
त्रिकुटा पर्वत धाम।
काली, लक्ष्मी, सरस्वती,
शक्ति तुम्हें प्रणाम॥
गरुड़ पर सवार होने वाली वैष्णवी, त्रिकूट पर्वत जिनका धाम है; काली, लक्ष्मी और सरस्वती — तीनों शक्तियों के रूप में आपको प्रणाम।
1नमो नमो वैष्णो वरदानी।
कलि काल में शुभ कल्याणी॥
हे वरदान देने वाली वैष्णो माता, आपको बार-बार नमस्कार; कलियुग में आप शुभ और कल्याण करने वाली हैं।
2मणि पर्वत पर ज्योति तुम्हारी।
पिंडी रूप में हो अवतारी॥
मणि पर्वत पर आपकी ज्योति जलती है; आपने पिंडी के रूप में अवतार लिया है।
3देवी देवता अंश दियो है।
रत्नाकर घर जन्म लियो है॥
सभी देवी-देवताओं ने अपना अंश दिया, और आपने रत्नाकर के घर जन्म लिया।
4करी तपस्या राम को पाऊँ।
त्रेता की शक्ति कहलाऊँ॥
आपने तपस्या की कि राम को प्राप्त करूँ और त्रेता की शक्ति कहलाऊँ।
5कहा राम मणि पर्वत जाओ।
कलियुग की देवी कहलाओ॥
राम ने कहा — मणि पर्वत पर जाओ और कलियुग की देवी कहलाओ।
6विष्णु रूप से कल्कि बनकर।
लूँगा शक्ति रूप बदलकर॥
"विष्णु रूप से कल्कि बनकर, रूप बदलकर मैं तुम्हें शक्ति रूप में स्वीकार करूँगा।"
7तब तक त्रिकुटा घाटी जाओ।
गुफा अंधेरी जाकर पाओ॥
"तब तक त्रिकूट की घाटी में जाओ और वहाँ अँधेरी गुफा में निवास करो।"
8काली-लक्ष्मी-सरस्वती माँ।
करेंगी पोषण पार्वती माँ॥
काली, लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती — सभी माताएँ वहाँ आपका पोषण करेंगी।
9ब्रह्मा, विष्णु, शंकर द्वारे।
हनुमत, भैरों प्रहरी प्यारे॥
ब्रह्मा, विष्णु और शंकर द्वार पर हैं; हनुमान और भैरों प्रिय प्रहरी हैं।
10रिद्धि, सिद्धि चंवर डुलावें।
कलियुग-वासी पूजत आवें॥
रिद्धि और सिद्धि चँवर डुलाती हैं; कलियुग के निवासी पूजा करने आते हैं।
11पान सुपारी ध्वजा नारियल।
चरणामृत चरणों का निर्मल॥
पान, सुपारी, ध्वजा और नारियल अर्पित होते हैं; चरणों का चरणामृत निर्मल है।
12दिया फलित वर माँ मुस्काई।
करन तपस्या पर्वत आई॥
माता ने मुस्कुराकर फलदायी वर दिया और तपस्या करने पर्वत पर आ गईं।
13कलिकाल की भड़की ज्वाला।
इक दिन अपना रूप निकाला॥
कलियुग की ज्वाला भड़क उठी, तब एक दिन आपने अपना रूप प्रकट किया।
14कन्या बन नगरोटा आई।
योगी भैरों दिया दिखाई॥
कन्या बनकर आप नगरोटा आईं, जहाँ योगी भैरों ने आपको देख लिया।
15रूप देख सुंदर ललचाया।
पीछे-पीछे भागा आया॥
सुंदर रूप देखकर वह लालायित हो उठा और पीछे-पीछे भागता आया।
16कन्याओं के साथ मिली माँ।
कौल-कंदौली तभी चली माँ॥
माता कन्याओं के साथ मिल गईं और तभी कौल-कंदौली की ओर चल पड़ीं।
17देवा माई दर्शन दीना।
पवन रूप हो गई प्रवीणा॥
देवा माई को दर्शन दिए और फिर वायु-रूप धारण करने में प्रवीण हो गईं।
18नवरात्रों में लीला रचाई।
भक्त श्रीधर के घर आई॥
नवरात्रि में लीला रचाई और भक्त श्रीधर के घर पधारीं।
19योगिन को भण्डारा दीनी।
सबने रुचिकर भोजन कीना॥
योगियों को भंडारा दिया और सबने रुचि से भोजन किया।
20मांस, मदिरा भैरों माँगी।
रूप पवन कर इच्छा त्यागी॥
भैरों ने मांस और मदिरा माँगी; तब माता वायु-रूप होकर वहाँ से चली गईं।
21बाण मारकर गंगा निकली।
पर्वत भागी हो मतवाली॥
बाण मारकर गंगा प्रकट की और मतवाली होकर पर्वत की ओर भागीं।
22चरण रखे आ एक शिला जब।
चरण-पादुका नाम पड़ा तब॥
जब एक शिला पर चरण रखे, तभी उस स्थान का नाम "चरण-पादुका" पड़ा।
23पीछे भैरों था बलकारी।
चोटी गुफा में जाय पधारी॥
पीछे बलवान भैरों लगा था; माता चोटी की गुफा में जा पहुँचीं।
24नौ माह तक किया निवासा।
चली फोड़कर किया प्रकाशा॥
वहाँ नौ माह तक निवास किया, फिर गुफा फोड़कर आगे बढ़ीं और प्रकाश किया।
25आद्या शक्ति-ब्रह्म कुमारी।
कहलाई माँ आद कुँवारी॥
आद्या शक्ति और ब्रह्मकुमारी — इसी से माता "आदि कुँवारी" कहलाईं।
26गुफा द्वार पहुँची मुस्काई।
लांगुर वीर ने आज्ञा पाई॥
गुफा-द्वार पर पहुँचकर माता मुस्कुराईं और लांगुर वीर (हनुमान) को आज्ञा मिली।
27भागा-भागा भैरों आया।
रक्षा हित निज शस्त्र चलाया॥
भैरों भागता हुआ आ पहुँचा; रक्षा के लिए लांगुर वीर ने अपना शस्त्र चलाया।
28पड़ा शीश जा पर्वत ऊपर।
किया क्षमा जा दिया उसे वर॥
उसका सिर कटकर पर्वत के ऊपर जा गिरा; माता ने उसे क्षमा करके वर दे दिया।
29अपने संग में पुजवाऊँगी।
भैरों घाटी बनवाऊँगी॥
"मैं तुझे अपने साथ पुजवाऊँगी और भैरों घाटी बनवाऊँगी।"
30पहले मेरा दर्शन होगा।
पीछे तेरा सुमिरन होगा॥
"पहले मेरा दर्शन होगा, उसके बाद तेरा स्मरण होगा।"
31बैठ गई माँ पिंडी होकर।
चरणों में बहता जल झर झर॥
माता पिंडी रूप में विराज गईं, और उनके चरणों में झर-झर जल बहता है।
32चौंसठ योगिनी-भैरों बरवत।
सप्तऋषि आ करते सुमरन॥
चौंसठ योगिनियाँ और भैरों वहाँ रहते हैं; सप्तऋषि आकर स्मरण करते हैं।
33घंटा ध्वनि पर्वत पर बाजे।
गुफा निराली सुंदर लागे॥
पर्वत पर घंटे की ध्वनि गूँजती है; गुफा निराली और सुंदर लगती है।
34भक्त श्रीधर पूजन कीना।
भक्ति सेवा का वर लीना॥
भक्त श्रीधर ने पूजन किया और भक्ति-सेवा का वर प्राप्त किया।
35सेवक ध्यानूँ तुमको ध्याया।
ध्वजा व चोला आन चढ़ाया॥
सेवक ध्यानू ने आपका ध्यान किया और ध्वजा तथा चोला अर्पित किया।
36सिंह सदा दर पहरा देता।
पंजा शेर का दुःख हर लेता॥
सिंह सदा द्वार पर पहरा देता है; शेर का पंजा दुःख हर लेता है।
37जम्बू द्वीप महाराज मनाया।
सर सोने का छत्र चढ़ाया॥
जम्बूद्वीप के महाराज ने मनौती मानी और सोने का छत्र चढ़ाया।
38हीरे की मूरत संग प्यारी।
जगे अखण्ड इक जोत तुम्हारी॥
हीरे की प्यारी मूर्ति साथ है, और आपकी एक अखंड ज्योति जलती रहती है।
39आश्विन चैत्र नवरात्रे आऊँ।
पिण्डी रानी दर्शन पाऊँ॥
आश्विन और चैत्र के नवरात्र में मैं आऊँ और पिंडी-रानी के दर्शन पाऊँ।
40सेवक कमल शरण तिहारी।
हरो वैष्णो विपत हमारी॥
सेवक कमल आपकी शरण में है; हे वैष्णो, हमारी विपदा हरिए। (यही रचयिता की छाप है।)
कलियुग में महिमा तेरी,
है माँ अपरंपार।
धर्म की हानि हो रही,
प्रगट हो अवतार॥
फलश्रुति: हे माता, कलियुग में आपकी महिमा अपरंपार है। धर्म की हानि हो रही है — प्रकट होकर अवतार लीजिए।