श्री वैष्णो देवी चालीसा

śrī vaiṣṇo devī cālīsā

Vaishno Devi Chalisa

समय
7–9 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
नवरात्रि, मंगलवार व शुक्रवार
उद्देश्य:रक्षा (Protection)संकट-मोचन (Relief from Troubles)शुभ आरंभ (Auspicious Start)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री वैष्णो देवी चालीसा एक दोहे से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में चलती है। इसका आरंभ "गरुड़ वाहिनी वैष्णवी, त्रिकुटा पर्वत धाम" से होता है। चौपाइयाँ माता के त्रेता-युग के वरदान से लेकर भैरों-वध और पिंडी रूप में विराजने तक की पूरी कथा कहती हैं।

परिचय

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

स्रोत: परंपरागत वैष्णो देवी चालीसा; अंतिम चौपाई में "कमल" की छाप

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री वैष्णो देवी चालीसा
IASTśrī vaiṣṇo devī cālīsā
देवतामाँ दुर्गा
मूल स्रोतपरंपरागत वैष्णो देवी चालीसा; अंतिम चौपाई में "कमल" की छाप
शुभ दिननवरात्रि, मंगलवार व शुक्रवार
पाठ समय7–9 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा वैष्णो देवी की पूरी कथा क्रम से कहती है, और इसीलिए त्रिकूट की यात्रा पर जाने वाले इसे रास्ते में गाते हैं।

कथा त्रेता युग से शुरू होती है — माता ने राम को पाने के लिए तप किया, और राम ने कहा कि कलियुग में वे मणि पर्वत पर देवी कहलाएँगी; कल्कि रूप में आकर वे उन्हें अपनाएँगे (चौपाई 4–6)। तब तक त्रिकूट की अँधेरी गुफा में निवास का आदेश मिला (7)।

फिर वह प्रसंग आता है जो हर यात्री जानता है — भैरों की कथा। माता कन्या-रूप में नगरोटा आईं, योगी भैरों ने उन्हें देखा और पीछे लग गया (14–15)। भक्त श्रीधर के घर भंडारा हुआ, जहाँ भैरों ने मांस-मदिरा माँगी (19–20)। माता वायु-रूप होकर पर्वत की ओर भागीं; जहाँ चरण पड़े वह चरण-पादुका कहलाया (22), और जिस गुफा में नौ माह रहीं वह अर्धकुँवारी (24–25)। अंत में लांगुर वीर ने भैरों का वध किया, सिर पर्वत के ऊपर जा गिरा — और माता ने उसे क्षमा करके वर दिया कि पहले मेरा दर्शन, फिर तेरा (28–30)। यही कारण है कि यात्रा भैरों घाटी पर पूरी मानी जाती है।

अंत में माता पिंडी रूप में विराजीं, जहाँ चरणों में जल बहता है (31) और अखंड ज्योति जलती है (38)।

अंतिम चौपाई में रचयिता की छाप है — "सेवक कमल शरण तिहारी"। कौन-से कमल, यह किसी प्रामाणिक स्रोत में नहीं मिलता, इसलिए कोई परिचय नहीं गढ़ा गया।

संपूर्ण चालीसा

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गरुड़ वाहिनी वैष्णवी, त्रिकुटा पर्वत धाम। काली, लक्ष्मी, सरस्वती, शक्ति तुम्हें प्रणाम॥

गरुड़ पर सवार होने वाली वैष्णवी, त्रिकूट पर्वत जिनका धाम है; काली, लक्ष्मी और सरस्वती — तीनों शक्तियों के रूप में आपको प्रणाम।

नमो नमो वैष्णो वरदानी। कलि काल में शुभ कल्याणी॥

हे वरदान देने वाली वैष्णो माता, आपको बार-बार नमस्कार; कलियुग में आप शुभ और कल्याण करने वाली हैं।

मणि पर्वत पर ज्योति तुम्हारी। पिंडी रूप में हो अवतारी॥

मणि पर्वत पर आपकी ज्योति जलती है; आपने पिंडी के रूप में अवतार लिया है।

देवी देवता अंश दियो है। रत्नाकर घर जन्म लियो है॥

सभी देवी-देवताओं ने अपना अंश दिया, और आपने रत्नाकर के घर जन्म लिया।

करी तपस्या राम को पाऊँ। त्रेता की शक्ति कहलाऊँ॥

आपने तपस्या की कि राम को प्राप्त करूँ और त्रेता की शक्ति कहलाऊँ।

कहा राम मणि पर्वत जाओ। कलियुग की देवी कहलाओ॥

राम ने कहा — मणि पर्वत पर जाओ और कलियुग की देवी कहलाओ।

विष्णु रूप से कल्कि बनकर। लूँगा शक्ति रूप बदलकर॥

"विष्णु रूप से कल्कि बनकर, रूप बदलकर मैं तुम्हें शक्ति रूप में स्वीकार करूँगा।"

तब तक त्रिकुटा घाटी जाओ। गुफा अंधेरी जाकर पाओ॥

"तब तक त्रिकूट की घाटी में जाओ और वहाँ अँधेरी गुफा में निवास करो।"

काली-लक्ष्मी-सरस्वती माँ। करेंगी पोषण पार्वती माँ॥

काली, लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती — सभी माताएँ वहाँ आपका पोषण करेंगी।

ब्रह्मा, विष्णु, शंकर द्वारे। हनुमत, भैरों प्रहरी प्यारे॥

ब्रह्मा, विष्णु और शंकर द्वार पर हैं; हनुमान और भैरों प्रिय प्रहरी हैं।

रिद्धि, सिद्धि चंवर डुलावें। कलियुग-वासी पूजत आवें॥

रिद्धि और सिद्धि चँवर डुलाती हैं; कलियुग के निवासी पूजा करने आते हैं।

पान सुपारी ध्वजा नारियल। चरणामृत चरणों का निर्मल॥

पान, सुपारी, ध्वजा और नारियल अर्पित होते हैं; चरणों का चरणामृत निर्मल है।

दिया फलित वर माँ मुस्काई। करन तपस्या पर्वत आई॥

माता ने मुस्कुराकर फलदायी वर दिया और तपस्या करने पर्वत पर आ गईं।

कलिकाल की भड़की ज्वाला। इक दिन अपना रूप निकाला॥

कलियुग की ज्वाला भड़क उठी, तब एक दिन आपने अपना रूप प्रकट किया।

कन्या बन नगरोटा आई। योगी भैरों दिया दिखाई॥

कन्या बनकर आप नगरोटा आईं, जहाँ योगी भैरों ने आपको देख लिया।

रूप देख सुंदर ललचाया। पीछे-पीछे भागा आया॥

सुंदर रूप देखकर वह लालायित हो उठा और पीछे-पीछे भागता आया।

कन्याओं के साथ मिली माँ। कौल-कंदौली तभी चली माँ॥

माता कन्याओं के साथ मिल गईं और तभी कौल-कंदौली की ओर चल पड़ीं।

देवा माई दर्शन दीना। पवन रूप हो गई प्रवीणा॥

देवा माई को दर्शन दिए और फिर वायु-रूप धारण करने में प्रवीण हो गईं।

नवरात्रों में लीला रचाई। भक्त श्रीधर के घर आई॥

नवरात्रि में लीला रचाई और भक्त श्रीधर के घर पधारीं।

योगिन को भण्डारा दीनी। सबने रुचिकर भोजन कीना॥

योगियों को भंडारा दिया और सबने रुचि से भोजन किया।

मांस, मदिरा भैरों माँगी। रूप पवन कर इच्छा त्यागी॥

भैरों ने मांस और मदिरा माँगी; तब माता वायु-रूप होकर वहाँ से चली गईं।

बाण मारकर गंगा निकली। पर्वत भागी हो मतवाली॥

बाण मारकर गंगा प्रकट की और मतवाली होकर पर्वत की ओर भागीं।

चरण रखे आ एक शिला जब। चरण-पादुका नाम पड़ा तब॥

जब एक शिला पर चरण रखे, तभी उस स्थान का नाम "चरण-पादुका" पड़ा।

पीछे भैरों था बलकारी। चोटी गुफा में जाय पधारी॥

पीछे बलवान भैरों लगा था; माता चोटी की गुफा में जा पहुँचीं।

नौ माह तक किया निवासा। चली फोड़कर किया प्रकाशा॥

वहाँ नौ माह तक निवास किया, फिर गुफा फोड़कर आगे बढ़ीं और प्रकाश किया।

आद्या शक्ति-ब्रह्म कुमारी। कहलाई माँ आद कुँवारी॥

आद्या शक्ति और ब्रह्मकुमारी — इसी से माता "आदि कुँवारी" कहलाईं।

गुफा द्वार पहुँची मुस्काई। लांगुर वीर ने आज्ञा पाई॥

गुफा-द्वार पर पहुँचकर माता मुस्कुराईं और लांगुर वीर (हनुमान) को आज्ञा मिली।

भागा-भागा भैरों आया। रक्षा हित निज शस्त्र चलाया॥

भैरों भागता हुआ आ पहुँचा; रक्षा के लिए लांगुर वीर ने अपना शस्त्र चलाया।

पड़ा शीश जा पर्वत ऊपर। किया क्षमा जा दिया उसे वर॥

उसका सिर कटकर पर्वत के ऊपर जा गिरा; माता ने उसे क्षमा करके वर दे दिया।

अपने संग में पुजवाऊँगी। भैरों घाटी बनवाऊँगी॥

"मैं तुझे अपने साथ पुजवाऊँगी और भैरों घाटी बनवाऊँगी।"

पहले मेरा दर्शन होगा। पीछे तेरा सुमिरन होगा॥

"पहले मेरा दर्शन होगा, उसके बाद तेरा स्मरण होगा।"

बैठ गई माँ पिंडी होकर। चरणों में बहता जल झर झर॥

माता पिंडी रूप में विराज गईं, और उनके चरणों में झर-झर जल बहता है।

चौंसठ योगिनी-भैरों बरवत। सप्तऋषि आ करते सुमरन॥

चौंसठ योगिनियाँ और भैरों वहाँ रहते हैं; सप्तऋषि आकर स्मरण करते हैं।

घंटा ध्वनि पर्वत पर बाजे। गुफा निराली सुंदर लागे॥

पर्वत पर घंटे की ध्वनि गूँजती है; गुफा निराली और सुंदर लगती है।

भक्त श्रीधर पूजन कीना। भक्ति सेवा का वर लीना॥

भक्त श्रीधर ने पूजन किया और भक्ति-सेवा का वर प्राप्त किया।

सेवक ध्यानूँ तुमको ध्याया। ध्वजा व चोला आन चढ़ाया॥

सेवक ध्यानू ने आपका ध्यान किया और ध्वजा तथा चोला अर्पित किया।

सिंह सदा दर पहरा देता। पंजा शेर का दुःख हर लेता॥

सिंह सदा द्वार पर पहरा देता है; शेर का पंजा दुःख हर लेता है।

जम्बू द्वीप महाराज मनाया। सर सोने का छत्र चढ़ाया॥

जम्बूद्वीप के महाराज ने मनौती मानी और सोने का छत्र चढ़ाया।

हीरे की मूरत संग प्यारी। जगे अखण्ड इक जोत तुम्हारी॥

हीरे की प्यारी मूर्ति साथ है, और आपकी एक अखंड ज्योति जलती रहती है।

आश्विन चैत्र नवरात्रे आऊँ। पिण्डी रानी दर्शन पाऊँ॥

आश्विन और चैत्र के नवरात्र में मैं आऊँ और पिंडी-रानी के दर्शन पाऊँ।

सेवक कमल शरण तिहारी। हरो वैष्णो विपत हमारी॥

सेवक कमल आपकी शरण में है; हे वैष्णो, हमारी विपदा हरिए। (यही रचयिता की छाप है।)

कलियुग में महिमा तेरी, है माँ अपरंपार। धर्म की हानि हो रही, प्रगट हो अवतार॥

फलश्रुति: हे माता, कलियुग में आपकी महिमा अपरंपार है। धर्म की हानि हो रही है — प्रकट होकर अवतार लीजिए।

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शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

गरुड़ वाहिनीगरुड़ पर सवारी करने वाली
त्रिकुटात्रिकूट पर्वत — वैष्णो देवी का धाम
पिंडीतीन प्राकृतिक शिला-रूप, जिनमें माता विराजती हैं
रत्नाकरकथा में माता के पिता का नाम
नगरोटाजम्मू के पास का स्थान
कौल-कंदौलीयात्रा-मार्ग का एक तीर्थ-स्थान
चरण-पादुकावह शिला जहाँ माता के चरण पड़े — यात्रा का पड़ाव
आद कुँवारीअर्धकुँवारी — वह गुफा जहाँ माता नौ माह रहीं
लांगुर वीरहनुमान जी, जो माता के रक्षक रूप में साथ रहे
चौंसठ योगिनीदेवी की चौंसठ सहचरी शक्तियाँ
ध्यानूमाता के प्रसिद्ध भक्त, जिनकी कथा यात्रा-परंपरा में आती है

अर्थ (हिन्दी)

  1. गरुड़ पर सवार होने वाली वैष्णवी, त्रिकूट पर्वत जिनका धाम है; काली, लक्ष्मी और सरस्वती — तीनों शक्तियों के रूप में आपको प्रणाम।
  2. हे वरदान देने वाली वैष्णो माता, आपको बार-बार नमस्कार; कलियुग में आप शुभ और कल्याण करने वाली हैं।
  3. मणि पर्वत पर आपकी ज्योति जलती है; आपने पिंडी के रूप में अवतार लिया है।
  4. सभी देवी-देवताओं ने अपना अंश दिया, और आपने रत्नाकर के घर जन्म लिया।
  5. आपने तपस्या की कि राम को प्राप्त करूँ और त्रेता की शक्ति कहलाऊँ।
  6. राम ने कहा — मणि पर्वत पर जाओ और कलियुग की देवी कहलाओ।
  7. "विष्णु रूप से कल्कि बनकर, रूप बदलकर मैं तुम्हें शक्ति रूप में स्वीकार करूँगा।"
  8. "तब तक त्रिकूट की घाटी में जाओ और वहाँ अँधेरी गुफा में निवास करो।"
  9. काली, लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती — सभी माताएँ वहाँ आपका पोषण करेंगी।
  10. ब्रह्मा, विष्णु और शंकर द्वार पर हैं; हनुमान और भैरों प्रिय प्रहरी हैं।
  11. रिद्धि और सिद्धि चँवर डुलाती हैं; कलियुग के निवासी पूजा करने आते हैं।
  12. पान, सुपारी, ध्वजा और नारियल अर्पित होते हैं; चरणों का चरणामृत निर्मल है।
  13. माता ने मुस्कुराकर फलदायी वर दिया और तपस्या करने पर्वत पर आ गईं।
  14. कलियुग की ज्वाला भड़क उठी, तब एक दिन आपने अपना रूप प्रकट किया।
  15. कन्या बनकर आप नगरोटा आईं, जहाँ योगी भैरों ने आपको देख लिया।
  16. सुंदर रूप देखकर वह लालायित हो उठा और पीछे-पीछे भागता आया।
  17. माता कन्याओं के साथ मिल गईं और तभी कौल-कंदौली की ओर चल पड़ीं।
  18. देवा माई को दर्शन दिए और फिर वायु-रूप धारण करने में प्रवीण हो गईं।
  19. नवरात्रि में लीला रचाई और भक्त श्रीधर के घर पधारीं।
  20. योगियों को भंडारा दिया और सबने रुचि से भोजन किया।
  21. भैरों ने मांस और मदिरा माँगी; तब माता वायु-रूप होकर वहाँ से चली गईं।
  22. बाण मारकर गंगा प्रकट की और मतवाली होकर पर्वत की ओर भागीं।
  23. जब एक शिला पर चरण रखे, तभी उस स्थान का नाम "चरण-पादुका" पड़ा।
  24. पीछे बलवान भैरों लगा था; माता चोटी की गुफा में जा पहुँचीं।
  25. वहाँ नौ माह तक निवास किया, फिर गुफा फोड़कर आगे बढ़ीं और प्रकाश किया।
  26. आद्या शक्ति और ब्रह्मकुमारी — इसी से माता "आदि कुँवारी" कहलाईं।
  27. गुफा-द्वार पर पहुँचकर माता मुस्कुराईं और लांगुर वीर (हनुमान) को आज्ञा मिली।
  28. भैरों भागता हुआ आ पहुँचा; रक्षा के लिए लांगुर वीर ने अपना शस्त्र चलाया।
  29. उसका सिर कटकर पर्वत के ऊपर जा गिरा; माता ने उसे क्षमा करके वर दे दिया।
  30. "मैं तुझे अपने साथ पुजवाऊँगी और भैरों घाटी बनवाऊँगी।"
  31. "पहले मेरा दर्शन होगा, उसके बाद तेरा स्मरण होगा।"
  32. माता पिंडी रूप में विराज गईं, और उनके चरणों में झर-झर जल बहता है।
  33. चौंसठ योगिनियाँ और भैरों वहाँ रहते हैं; सप्तऋषि आकर स्मरण करते हैं।
  34. पर्वत पर घंटे की ध्वनि गूँजती है; गुफा निराली और सुंदर लगती है।
  35. भक्त श्रीधर ने पूजन किया और भक्ति-सेवा का वर प्राप्त किया।
  36. सेवक ध्यानू ने आपका ध्यान किया और ध्वजा तथा चोला अर्पित किया।
  37. सिंह सदा द्वार पर पहरा देता है; शेर का पंजा दुःख हर लेता है।
  38. जम्बूद्वीप के महाराज ने मनौती मानी और सोने का छत्र चढ़ाया।
  39. हीरे की प्यारी मूर्ति साथ है, और आपकी एक अखंड ज्योति जलती रहती है।
  40. आश्विन और चैत्र के नवरात्र में मैं आऊँ और पिंडी-रानी के दर्शन पाऊँ।
  41. सेवक कमल आपकी शरण में है; हे वैष्णो, हमारी विपदा हरिए। (यही रचयिता की छाप है।)
  42. फलश्रुति: हे माता, कलियुग में आपकी महिमा अपरंपार है। धर्म की हानि हो रही है — प्रकट होकर अवतार लीजिए।

लाभ

  • वैष्णो देवी की पूरी कथा क्रम से — त्रेता के वरदान से भैरों-वध और पिंडी-दर्शन तक।
  • त्रिकूट की यात्रा में मार्ग पर गाई जाने वाली चालीसा।
  • नवरात्रि की पूजा का प्रमुख पाठ; मंगलवार व शुक्रवार को भी पढ़ी जाती है।
  • चौपाई 30 बताती है कि भैरों का दर्शन माता के दर्शन के बाद क्यों होता है।

कब करें पाठ

नवरात्रि में — चैत्र तथा आश्विन दोनोंमंगलवार व शुक्रवार कोवैष्णो देवी यात्रा से पहले या मार्ग मेंनित्य संध्या पूजा में

पाठ विधि

माता के चित्र या पिंडी-स्वरूप के समक्ष लाल चुनरी, लाल पुष्प और अखंड दीप रखें। पहले दोहा पढ़ें, फिर चालीस चौपाइयाँ, और अंत में समापन दोहा। नवरात्रि में नौ दिन नियमित पाठ की परंपरा है। पाठ के बाद आरती कर प्रसाद बाँटें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराbhaktimahima.com — श्री वैष्णो देवी चालीसा (आधार-पाठ) · dharmsaar.com — वैष्णो माता चालीसा (शब्द-मिलान 88.5%) · hindipath.com — श्री वैष्णो चालीसा (84.7%; अंतर वर्तनी के, तथा चौपाई 8 का एक पाठ-भेद) · रचयिता की छाप — चौपाई 40 "सेवक कमल शरण तिहारी"
रचयिताअज्ञात (छाप: कमल)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

माँ दुर्गा

Goddess Durga

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

देवता वर्गशक्ति · रक्षा · विजय · साहस
वाहनसिंह
मुख्य मंत्रॐ दुं दुर्गायै नमः
सभी पाठ देखें

श्री वैष्णो देवी चालीसा — सामान्य प्रश्न

संबंधित पर्व व व्रत

माँ दुर्गा भक्ति संग्रह

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