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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री कामाख्या देवी आरती

आरती · माँ दुर्गा

पाठ

1

जय कामाख्या माता, मैया जय कामाख्या। नीलाचल पर विराजे, शक्तिपीठ विख्याता॥

2

सती-अंग जहँ गिरा, शक्तिपीठ कहलाया। तंत्र-मंत्र की देवी, जग में यश पाया॥

3

अम्बुबाची मेला सजे, भक्त दूर से आते। मनोकामना लेकर, माँ के दर पर शीश नवाते॥

4

इच्छा-पूर्ति करती, भय-संकट हरती। शरण पड़े की रक्षा, हे जग की महतारी॥

5

कामाख्या आरती, जो जन श्रद्धा गावे। मनवांछित फल पावे, शक्ति-कृपा पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे कामाख्या माता, आपकी जय हो! नीलाचल पर्वत पर विराजमान आप विख्यात शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री हैं।
  2. जहाँ सती का अंग गिरा वह शक्तिपीठ कहलाया; आप तंत्र-मंत्र की देवी हैं और जगत में आपका यश है।
  3. अम्बुबाची मेला सजता है, भक्त दूर-दूर से आते हैं; मनोकामना लेकर माँ के द्वार पर शीश झुकाते हैं।
  4. आप इच्छाएँ पूर्ण करती हैं और भय-संकट हरती हैं; हे जगत की माता, शरण में आए जनों की रक्षा करती हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से कामाख्या माता की यह आरती गाता है, वह मनोवांछित फल तथा शक्ति-कृपा प्राप्त करता है।

लाभ

  • इच्छा-पूर्ति व मनोकामना-सिद्धि होती है।
  • भय, शत्रु व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
  • शक्ति-साधना व आध्यात्मिक उन्नति में सहायता मिलती है।

कब करें पाठ

नवरात्रि व अष्टमी को · अम्बुबाची मेला (आषाढ़) पर · मंगलवार व शुक्रवार को

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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