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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री कामाख्या देवी आरती
आरती · माँ दुर्गा
पाठ
आरती कामाख्या देवी की। जगत् उधारक सुर सेवी की॥
1
गावत वेद पुरान कहानी। योनिरुप तुम हो महारानी॥ सुर ब्रह्मादिक आदि बखानी। लहे दरस सब सुख लेवी की॥
2
दक्ष सुता जगदम्ब भवानी। सदा शंभु अर्धंग विराजिनी॥ सकल जगत् को तारन करनी। जै हो मातु सिद्धि देवी की॥
3
तीन नयन कर डमरु विराजे। टीको गोरोचन को साजे॥ तीनों लोक रुप से लाजे। जै हो मातु ! लोक सेवी की॥
4
रक्त पुष्प कंठन वनमाला। केहरि वाहन खंग विशाला॥ मातु करे भक्तन प्रतिपाला। सकल असुर जीवन लेवी की॥
5
कहैं गोपाल मातु बलिहारी। जाने नहिं महिमा त्रिपुरारी॥ सब सत होय जो कह्यो विचारी। जय जय सबहिं करत देवी की॥
अर्थ (हिन्दी)
- (टेक) जगत का उद्धार करने वाली, देवताओं द्वारा सेवित कामाख्या देवी की आरती।
- वेद और पुराण आपकी कथा गाते हैं; हे महारानी, आप योनि-रूप में हैं; ब्रह्मा आदि देवता आपका बखान करते हैं — आपका दर्शन पाकर सब सुख पाते हैं।
- आप दक्ष की पुत्री, जगदम्बा भवानी हैं, जो सदा शंभु के अर्धांग में विराजती हैं; आप सारे जगत को तारने वाली हैं — सिद्धि देने वाली माता की जय हो।
- तीन नेत्र हैं, हाथ में डमरू विराजता है, माथे पर गोरोचन का टीका सजा है; (आपके) रूप से तीनों लोक लजा जाते हैं — लोकों द्वारा सेवित माता की जय हो।
- गले में लाल फूलों की वनमाला है, सिंह वाहन है और विशाल खड्ग; माता भक्तों का पालन करती हैं और सब असुरों के प्राण हर लेती हैं।
- गोपाल कहते हैं — माँ, मैं आप पर बलिहारी जाता हूँ; आपकी महिमा त्रिपुरारी (शिव) भी नहीं जानते; जो विचारकर कहा है, वह सब सत्य होता है — सब देवी की जय-जयकार करते हैं।
लाभ
- शक्ति-उपासना का पाठ — कामाख्या इक्यावन शक्तिपीठों में गिनी जाती हैं।
- रक्षा और सिद्धि की कामना — "जै हो मातु सिद्धि देवी की"।
कब करें पाठ
नवरात्रि में · अम्बुबाची मेले के समय · मंगलवार और शुक्रवार को
स्रोत
रचयिता: गोपाल (अंतिम पद की छाप). nakshatravichar.com — श्री कामाख्या देवी की आरती (आधार-पाठ) · aartibhajanchalisa.in — माँ कामाख्या देवी आरती
