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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री केदारनाथ आरती

आरती · श्री शिव

पाठ

1

जय केदार उदार शंकर, हिमगिरि में राजे। ज्योतिर्लिंग स्वरूप तुम्हारा, त्रिभुवन में साजे॥

2

मन्दाकिनी तट पावन, बर्फीली वादी। पंच केदारों में प्रमुख, महिमा अति न्यारी॥

3

जल-बेलपत्र अर्पित, भक्त करें पूजा। हर-हर महादेव कहकर, ध्यावें नहिं दूजा॥

4

पाप-ताप सब हरते, मोक्ष-पद दिलाते। जो जन तेरे दर आए, भव-पार लगाते॥

5

केदारनाथ की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। पाप-ताप सब मिटते, शिव-कृपा पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे उदार शंकर केदारनाथ, आपकी जय हो! हिमालय में विराजमान आपका ज्योतिर्लिंग स्वरूप तीनों लोकों में सुशोभित है।
  2. पावन मन्दाकिनी का तट व बर्फीली घाटी; पंच केदारों में प्रमुख आपकी महिमा अति अनुपम है।
  3. भक्त जल व बेलपत्र अर्पित कर पूजा करते हैं; "हर-हर महादेव" कहकर वे आप ही का ध्यान करते हैं, किसी अन्य का नहीं।
  4. आप समस्त पाप-ताप हरते हैं और मोक्ष-पद दिलाते हैं; जो भी आपके द्वार आता है, उसे भवसागर से पार लगाते हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से केदारनाथ की यह आरती गाता है, उसके समस्त पाप-ताप मिट जाते हैं और वह शिव-कृपा प्राप्त करता है।

लाभ

  • पापों का नाश होकर मन निर्मल होता है।
  • मोक्ष-मार्ग प्रशस्त होकर आध्यात्मिक उन्नति होती है।
  • भय व संकट से रक्षा होकर शिव-कृपा प्राप्त होती है।

कब करें पाठ

सोमवार व प्रदोष काल में · महाशिवरात्रि व श्रावण मास में · चारधाम यात्रा/दर्शन के समय

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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