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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री कुबेर आरती

आरती

पाठ

1

जय कुबेर भण्डारी, स्वामी जय धन-दाता। यक्षराज वैश्रवण, तुम हो सुख-दाता॥

2

धन-धान्य के स्वामी, निधियों के रखवारे। नवनिधि के तुम दाता, भक्तन को सुख सारे॥

3

लक्ष्मी संग पूजित हो, धनतेरस के दाता। व्यापार में बरकत देते, धन-वैभव-दाता॥

4

जो नर तुमको ध्याता, दरिद्रता मिटती। घर-घर खुशियाँ आतीं, समृद्धि नित बढ़ती॥

5

कुबेर जी की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। धन-धान्य सुख-सम्पति, घर में सदा पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे कुबेर भण्डारी, धन के दाता, आपकी जय हो! हे यक्षराज वैश्रवण, आप सुख देने वाले हैं।
  2. आप धन-धान्य के स्वामी व निधियों के रक्षक हैं; नवनिधियों के दाता हैं और भक्तों को समस्त सुख प्रदान करते हैं।
  3. आप लक्ष्मी जी के संग पूजित होते हैं और धनतेरस के दाता हैं; आप व्यापार में बरकत तथा धन-वैभव प्रदान करते हैं।
  4. जो मनुष्य आपका ध्यान करता है, उसकी दरिद्रता मिट जाती है; घर-घर में खुशियाँ आती हैं और समृद्धि नित बढ़ती है।
  5. जो भक्त श्रद्धा से कुबेर जी की यह आरती गाता है, वह धन-धान्य व सुख-सम्पत्ति अपने घर में सदा प्राप्त करता है।

लाभ

  • धन, धान्य व समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • व्यापार व आय में वृद्धि तथा आर्थिक स्थिरता आती है।
  • दरिद्रता दूर होकर घर में सुख-शांति आती है।

कब करें पाठ

धनतेरस व दीपावली पर · शुक्रवार को · लक्ष्मी-पूजन के साथ

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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